समस्तीपुर के डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि यूनिवर्सिटी(RPCAU) की बटरफ्लाई पार्क की आबोहवा तितलियों को खूब रास आ रही है। जैव विविधता पार्क(Biodiversity Park) के अंदर स्थित बटरफ्लाई पार्क में तितलियों की 57 प्रजातियां देखने को मिल रही हैं। जिसके चलते यहां ‘मड पडलिंग’ की जगह तैयार किया गया है। किसानों के लिए तितलियां वरदान से कम नहीं हैं। वह जहां जाती हैं, अपने साथ मित्र कीट लेकर जाती हैं। मित्र कीट मिट्टी में होने वाले हानिकारण कीट को खत्म कर देती है। जिससे किसानों के पैदावार नुकसान नहीं होता और उपज बढ़ जाती है। होस्ट प्लांट्स के साथ मड पडलिंग की जगह यूनिवर्सिटी में तितलियों के संरक्षण पर काम कर रहे वैज्ञानिक डॉ. एमएसआई रेड्डी ने बताया कि इस पार्क में नेक्टर प्लांट्स और होस्ट प्लांट्स के साथ मड पडलिंग की जगह भी तैयार की गई है। नेक्टर प्लांट्स यानी वह पौधे जिनका रस तितलियां चूसती हैं और होस्ट प्लांट पर वे अंडे देती हैं। मड पडलिंग कुछ प्रजाति के कीट विशेषकर तितलियों द्वारा की जानी वाली क्रिया है। इसमें नर तितलियां कीचड़, नम रेत, नम मिट्टी और सड़ते हुए पौधों के तरल पदार्थों में पोषक तत्वों की तलाश कर उन्हें चूसती हैं। इससे उन्हें सोडियम और अमीनो एसिड्स मिल जाते हैं। तितलियों के बनाए गए अमृत और पोखर क्षेत्र डॉ. एमएसआई रेड्डी बताते हैं कि यह उद्यान कीटों के संपूर्ण जीवन चक्र को सहारा देने के साथ-साथ पारिस्थितिक संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया है। उद्यान की संरचना को तीन प्रमुख, अत्यंत विशिष्ट क्षेत्रों में बांटा गया है। अमृत और पोखर क्षेत्र। वयस्क तितलियों को भोजन खोजने में सहायता प्रदान करने के लिए डिजाइन किए गए इस क्षेत्र में एक कृत्रिम फव्वारा और बजरी वाले पोखर क्षेत्र हैं। जो आवश्यक खनिज और पानी प्रदान करते हैं। इसमें लैंटाना, बोगनविलिया और कुफिया जैसे लगातार खिलने वाले पौधों की घनी रोपण की गई है । इस क्षेत्र में कई प्रकार के पौधे पाए जाते हैं, जिनमें पॉलीएल्थिया लोंगिफोलिया (अशोका), मिमोसा पुडिका (टच-मी-नॉट) और कैलोट्रोपिस शामिल है। जो कैटरपिलर के पोषण के लिए उपयुक्त है। साथ ही, यहां क्रोटालारिया और हेलियोट्रोपियम जैसे एल्कलॉइड से भरपूर पौधे भी पाए जाते हैं, जो तितलियों को आकर्षित करते हैं। इस भीषण गर्मी में भी कैंपस में बने इस पार्क में तितलियों की बहार देखने को मिल रही है। किसानों को किया जा रहा है जागरूक डॉ एमएसआईं रेड्डी ने आगे बताया कि तितलियां प्रदूषण की जैव सूचक(बायो इंडिकेटर) भी हैं। जहां की हवा प्रदूषित होगी, वहां उनकी संख्या कम या न के बराबर होगी। अगर किसी स्थान पर तितलियां हैं तो समझ लीजिए वहां की आबोहवा स्वच्छ है। पूसा और आसपास के इलाके में तितलियों की संख्या बढ़े, इसके लिए किसानों को भी जानकारी दी जा रही है। जिस इलाके में तितलियां अधिक हैं, तो वह अपने साथ मित्र कीट को लेकरी आती हैं। मित्र कीट जमीन में मौजूद फसलों को नुकसान करने वाली कीटों को खत्म कर देती है। जिससे जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ जाती है। उर्वरा शक्ति बढ़ने से उपज अच्छी होगी। तितलियों की लाइफ साइकिल अलग-अलग पौधे पर होता है। समस्तीपुर के डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि यूनिवर्सिटी(RPCAU) की बटरफ्लाई पार्क की आबोहवा तितलियों को खूब रास आ रही है। जैव विविधता पार्क(Biodiversity Park) के अंदर स्थित बटरफ्लाई पार्क में तितलियों की 57 प्रजातियां देखने को मिल रही हैं। जिसके चलते यहां ‘मड पडलिंग’ की जगह तैयार किया गया है। किसानों के लिए तितलियां वरदान से कम नहीं हैं। वह जहां जाती हैं, अपने साथ मित्र कीट लेकर जाती हैं। मित्र कीट मिट्टी में होने वाले हानिकारण कीट को खत्म कर देती है। जिससे किसानों के पैदावार नुकसान नहीं होता और उपज बढ़ जाती है। होस्ट प्लांट्स के साथ मड पडलिंग की जगह यूनिवर्सिटी में तितलियों के संरक्षण पर काम कर रहे वैज्ञानिक डॉ. एमएसआई रेड्डी ने बताया कि इस पार्क में नेक्टर प्लांट्स और होस्ट प्लांट्स के साथ मड पडलिंग की जगह भी तैयार की गई है। नेक्टर प्लांट्स यानी वह पौधे जिनका रस तितलियां चूसती हैं और होस्ट प्लांट पर वे अंडे देती हैं। मड पडलिंग कुछ प्रजाति के कीट विशेषकर तितलियों द्वारा की जानी वाली क्रिया है। इसमें नर तितलियां कीचड़, नम रेत, नम मिट्टी और सड़ते हुए पौधों के तरल पदार्थों में पोषक तत्वों की तलाश कर उन्हें चूसती हैं। इससे उन्हें सोडियम और अमीनो एसिड्स मिल जाते हैं। तितलियों के बनाए गए अमृत और पोखर क्षेत्र डॉ. एमएसआई रेड्डी बताते हैं कि यह उद्यान कीटों के संपूर्ण जीवन चक्र को सहारा देने के साथ-साथ पारिस्थितिक संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया है। उद्यान की संरचना को तीन प्रमुख, अत्यंत विशिष्ट क्षेत्रों में बांटा गया है। अमृत और पोखर क्षेत्र। वयस्क तितलियों को भोजन खोजने में सहायता प्रदान करने के लिए डिजाइन किए गए इस क्षेत्र में एक कृत्रिम फव्वारा और बजरी वाले पोखर क्षेत्र हैं। जो आवश्यक खनिज और पानी प्रदान करते हैं। इसमें लैंटाना, बोगनविलिया और कुफिया जैसे लगातार खिलने वाले पौधों की घनी रोपण की गई है । इस क्षेत्र में कई प्रकार के पौधे पाए जाते हैं, जिनमें पॉलीएल्थिया लोंगिफोलिया (अशोका), मिमोसा पुडिका (टच-मी-नॉट) और कैलोट्रोपिस शामिल है। जो कैटरपिलर के पोषण के लिए उपयुक्त है। साथ ही, यहां क्रोटालारिया और हेलियोट्रोपियम जैसे एल्कलॉइड से भरपूर पौधे भी पाए जाते हैं, जो तितलियों को आकर्षित करते हैं। इस भीषण गर्मी में भी कैंपस में बने इस पार्क में तितलियों की बहार देखने को मिल रही है। किसानों को किया जा रहा है जागरूक डॉ एमएसआईं रेड्डी ने आगे बताया कि तितलियां प्रदूषण की जैव सूचक(बायो इंडिकेटर) भी हैं। जहां की हवा प्रदूषित होगी, वहां उनकी संख्या कम या न के बराबर होगी। अगर किसी स्थान पर तितलियां हैं तो समझ लीजिए वहां की आबोहवा स्वच्छ है। पूसा और आसपास के इलाके में तितलियों की संख्या बढ़े, इसके लिए किसानों को भी जानकारी दी जा रही है। जिस इलाके में तितलियां अधिक हैं, तो वह अपने साथ मित्र कीट को लेकरी आती हैं। मित्र कीट जमीन में मौजूद फसलों को नुकसान करने वाली कीटों को खत्म कर देती है। जिससे जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ जाती है। उर्वरा शक्ति बढ़ने से उपज अच्छी होगी। तितलियों की लाइफ साइकिल अलग-अलग पौधे पर होता है।


