सवाल– मैं 34 साल की शादीशुदा महिला हूं और स्कूल टीचर हूं। मेरी सबसे बड़ी समस्या यह है कि मैं किसी को ‘ना’ नहीं कह पाती। घर हो या ऑफिस, मैं हमेशा दूसरों की जरूरतों को अपनी जरूरतों से पहले रखती हूं। ऑफिस में सहकर्मी अक्सर अपना काम भी मुझसे करवा लेते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि मैं मना नहीं करूंगी। ससुराल वालों की भी हर बात मान लेती हूं। भले ही उससे मुझे मानसिक-शारीरिक थकान हो रही हो। मैं जानती हूं, लोग मुझे यूज करते हैं, लेकिन फिर भी मना करने में गिल्ट होता है। मैं खुद को बदलना चाहती हूं। इस आदत से बाहर कैसे निकलूं? एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर। सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। मदद करना अच्छी बात है, लेकिन जब दूसरों को खुश रखने के लिए आप अपनी जरूरतों और मानसिक शांति को नजरअंदाज करने लगें, तो यह आदत बोझ बन सकती है। “ना” कहना गलत नहीं, बल्कि इमोशनल हेल्थ के लिए जरूरी है। समस्या की असली जड़ कहां हैं? क्या आप हर बात पर “हां” कहती हैं। जब दिल “ना” कहना चाहता है, तब भी आपके मुंह से “हां” निकल जाता है। अगर आप ऐसा महसूस करती हैं, तो यह समझना जरूरी है कि समस्या सिर्फ आपकी “अच्छाई” नहीं है। असली समस्या यह है कि आप भीतर से तो मना करना चाहती हैं, लेकिन कर नहीं पाती हैं। इसलिए हर बार “हां” कह देती हैं। धीरे-धीरे इसका असर दिखाई देने लगता है और आप– मानसिक और शारीरिक थकान के साथ कई बार खुद पर भी नाराजगी होने लगती है। फिर भी अगली बार आप दोबारा “हां” कह देती हैं। यही चक्र बार-बार चलता रहता है। इसके पीछे अक्सर कुछ गहरे डर काम करते हैं, जैसेकि- यानी बाहर से तो आप लोगों की मदद कर रही हैं, लेकिन अंदर से आपके कारण कुछ और हैं। आपके मन में डर और गिल्ट है और आपको सबके अप्रूवल की जरूरत है। यानी की आपकी “हां” मदद के लिए कही गई “हां” नहीं, बल्कि गिल्ट और डर से कही गई “हां” है। इमोशनल पैटर्न आप सोचती हैं, “मैं तो बस सबका भला चाहती हूं।” लेकिन कई बार इसके पीछे सिर्फ मदद करने की भावना नहीं होती, बल्कि कुछ गहरे इमोशनल पैटर्न भी काम कर रहे होते हैं। ऐसे में धीरे-धीरे यह सिर्फ एक आदत नहीं रहती, बल्कि आपकी पहचान का हिस्सा बन जाती है। फिर आप अपनी जरूरतों से पहले दूसरों की उम्मीदों को पूरा करने लगती हैं, चाहे इसके बदले आपको मानसिक थकान और भीतर ही भीतर नाराजगी क्यों न महसूस हो। अपने मनोविज्ञान को समझें करें एक जरूरी सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट यहां हम आपको एक सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट दे रहे हैं। इसमें 10 ब्लैंक कॉलम हैं। यहां आपको पिछले 7 दिनों की वो 10 सिचुएशंस लिखनी हैं, जब आपने ‘हां’ कहा। जैसकि– पूजा ने बाजार जाने को कहा तो मैं उसके साथ चली गई। प्रभा ने स्कूल में अपनी क्लास लेने के लिए कहा तो मैंने हां कर दी। सभी सिचुएशंस से जुड़े 5 सवाल हैं, जैसेकि– 1. क्या मैं सचमुच यह करना चाहती थी? 2. मना करने पर कितना गिल्ट होता? 3. कितना डर था कि सामने वाला नाराज होगा? 4. हां कहने के बाद कितनी थकान या पछतावा हुआ? 5. इससे मेरे काम, आराम या स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ा? इन पांचों सवालों को आपको 0 से 4 के स्केल पर रेट करना है, अपना टोटल स्कोर निकालना है और अंत में अपने स्कोर की एनालिसिस करनी है। डिटेल्स नीचे ग्राफिक में देखिए– 4 हफ्ते का CBT आधारित सेल्फ हेल्प प्लान सप्ताह 1 अपनी आदत को समझें लक्ष्य: इस हफ्ते का लक्ष्य खुद को बदलना नहीं, बल्कि अपनी आदत को समझना है। ध्यान दें कि आप किन परिस्थितियों में बिना मन के “हां” कह देती हैं। हर बार “हां” कहने के बाद ये बातें नोट करें: यानी सामने कौन था और क्या कहा गया? जैसे— “अगर मना किया तो बुरा मान जाएंगे।” जैसे— डर, guilt, घबराहट या दबाव। आप वास्तव में क्या कहना चाहती थीं? इस हफ्ते की छोटी प्रैक्टिस तुरंत जवाब देने की बजाय यह वाक्य बोलने की आदत डालें: यह छोटा-सा पॉज आपको बिना सोचे “हां” कहने से रोकने में मदद करेगा। सप्ताह 2: अपने विचारों को चुनौती दें लक्ष्य: हरेक गिल्ट को पहचानना और उसे परखना। कई बार हमारा डर सच नहीं, सिर्फ एक आदत होता है। एक उदाहरण: विचार: “अगर मैंने मना किया तो लोग मुझे बुरा समझेंगे।” अब खुद से ये सवाल पूछिए: अब एक नया बैलेंस्ड थॉट बनाइए। पुरानी सोच की जगह ज्यादा रियलिस्टिक और हेल्दी सोच विकसित करिए: सप्ताह 3: छोटे-छोटे ‘ना’ का अभ्यास करें लक्ष्य: छोटी–छोटी स्थितियों से ना बोलने की प्रैक्टिस करना। अब तक आपने अपने विचारों और पैटर्न को समझा। इस हफ्ते लो रिस्क वाली सिचुएशंस में “ना” बोलने की प्रैक्टिस शुरू करें। शुरुआत छोटी बातों से करें, ताकि धीरे-धीरे आपका कॉन्फिडेंस बढ़े। यहां मैं आपको कुछ वाक्यों के उदाहरण दे रहा हूं– “ना” कहते समय इन बातों का ध्यान रखें- ब्रोकेन रिकॉर्ड टेक्नीक के कुछ उदाहरण: इस टेक्नीक का मकसद बहस करना नहीं, बल्कि अपनी बाउंड्री को स्पष्ट करना है। सप्ताह 4 बाउंड्रीज मजबूत करें लक्ष्य: स्पष्ट और मजबूत बाउंड्रीज बनाना। अब तक आपने अपने पैटर्न समझे, विचारों को चैलेंज किया और छोटे-छोटे “ना” बोलने का अभ्यास किया। इस हफ्ते फोकस है— अपनी बाउंड्रीज को स्पष्ट और मजबूत बनाना। इस हफ्ते कम-से-कम दो जगह बाउंड्रीज बनाएं: कुछ उदाहरण: अब खुद से ये सवाल पूछें: ये 5 हेल्दी रिमाइंडर खुद को याद दिलाएं- याद रखिए: प्रोफेशनल हेल्प कब जरूरी नीचे ग्राफिक में दी स्थितियां पैदा हों तो प्रोफेशनल हेल्प जरूर लें– अंतिम बात स्वस्थ रिश्तों की शुरुआत अपनी सीमाएं तय करने से होती है। “ना” कहना स्वार्थ नहीं, सेल्फ रिस्पेक्ट है। जब आप गिल्ट के बावजूद शांत होकर अपनी जरूरतों को महत्व देना सीखते हैं, तभी असली इमोशनल हीलिंग शुरू होती है। ………………
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