Dollar के मुकाबले Rupee बेहाल, Middle East तनाव के बीच RBI उठा सकता है 2013 जैसे बड़े कदम।

Dollar के मुकाबले Rupee बेहाल, Middle East तनाव के बीच RBI उठा सकता है 2013 जैसे बड़े कदम।
वैश्विक बाजारों में जारी अस्थिरता के बीच भारतीय रुपया लगातार दबाव में बना हुआ है। मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का असर अब भारतीय मुद्रा पर साफ दिखाई देने लगा है। डॉलर के मुकाबले रुपया 97 के स्तर के करीब पहुंच चुका है, जिससे सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक की चिंता बढ़ गई है।
मौजूद जानकारी के अनुसार फरवरी के आखिर में मध्य पूर्व संघर्ष शुरू होने के बाद से रुपया करीब 6 प्रतिशत तक कमजोर हो चुका है। इस दौरान भारतीय मुद्रा ने डॉलर के मुकाबले कई बार नया रिकॉर्ड निचला स्तर भी छुआ।
बताया जा रहा है कि भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा समेत वरिष्ठ अधिकारियों ने पिछले कुछ दिनों में कई अहम बैठकें की हैं। इन बैठकों में रुपये की गिरावट रोकने और विदेशी मुद्रा बाजार को स्थिर रखने के उपायों पर चर्चा हुई।
गौरतलब है कि रिजर्व बैंक जिन बड़े विकल्पों पर विचार कर रहा है, उनमें ब्याज दर बढ़ाना भी शामिल है। हालांकि अगली मौद्रिक नीति बैठक 3 जून से 5 जून के बीच प्रस्तावित है, लेकिन जरूरत पड़ने पर रिजर्व बैंक पहले भी अचानक फैसले ले चुका है। वर्ष 2022 में भी केंद्रीय बैंक ने तय समय से पहले ब्याज दरों में बदलाव किया था।
इसके अलावा विदेशी निवेश बढ़ाने के लिए अनिवासी भारतीयों के लिए विशेष विदेशी मुद्रा जमा योजना लाने पर भी विचार किया जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक सरकार संप्रभु डॉलर बॉन्ड जारी करने जैसे विकल्पों पर भी चर्चा कर सकती है। हालांकि इस तरह के किसी भी फैसले के लिए केंद्र सरकार की मंजूरी जरूरी होगी।
बता दें कि वर्ष 2013 में जब वैश्विक बाजारों में भारी उथल-पुथल हुई थी, तब भी भारत ने अनिवासी भारतीयों से विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए विशेष योजना शुरू की थी। उस समय करीब 30 अरब डॉलर जुटाए गए थे। अब उम्मीद जताई जा रही है कि नई योजना के जरिए लगभग 50 अरब डॉलर तक जुटाए जा सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और विदेशी निवेशकों की लगातार निकासी ने रुपये पर अतिरिक्त दबाव डाला है। वर्ष 2026 में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से रिकॉर्ड स्तर पर पैसा निकाला है। आंकड़ों के मुताबिक विदेशी निवेशकों की निकासी 19 अरब डॉलर से ज्यादा पहुंच चुकी हैं।
वहीं दूसरी ओर अमेरिका में ब्याज दरें ऊंची रहने से भारत और अमेरिका के बॉन्ड प्रतिफल के बीच का अंतर भी काफी कम हो गया है। इससे विदेशी निवेशकों का रुझान भारतीय बाजार से कम होता दिखाई दे रहा हैं।
गौरतलब है कि भारतीय रिजर्व बैंक ने हाल ही में 5 अरब डॉलर का स्वैप नीलामी कार्यक्रम भी घोषित किया था ताकि बैंकिंग प्रणाली में तरलता बनी रहे और डॉलर भंडार मजबूत हो सके। सूत्रों के अनुसार आने वाले दिनों में इस तरह की और नीलामियां भी हो सकती हैं।
आर्थिक जानकारों का कहना है कि भारत की बैंकिंग व्यवस्था और आर्थिक बुनियाद अभी भी मजबूत हैं, लेकिन वैश्विक तनाव और तेल कीमतों के दबाव ने फिलहाल रुपये की स्थिति को कमजोर कर दिया है।

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