सरकारी दफ्तरों में सुनवाई नहीं होती और फरियादियों को एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर टरकाया जाता है। बड़े अफसर तो फिर भी पब्लिक की बात गंभीरता से सुनकर उसका समाधान देने की कोशिश करते हैं लेकिन निचले स्तर पर तो फरियादियों से सलीके का सुलूक तक नहीं होता। पब्लिक के बीच एक धारणा बन चुकी है कि बगैर पैसे के सरकारी दफ्तरों में काम नहीं होता। पब्लिक के इसी परसेप्शन पर दैनिक भास्कर ने मुरादाबाद के कमिश्नर आईएएस आन्जनेय सिंह से बात की। उन्होंने बेबाकी से इस इशु पर अपनी राय रखी। आन्जनेय सिंह ने कहा- बड़े अधिकारी रेगुलर अपने दफ्तरों में बैठकर समय से फरियादियों की समस्याएं सुन रहे हैं। निचले स्तर पर जरूर ऐसी शिकायतें हैं। लेकिन ऐसे लोगों के खिलाफ लगतार कड़ी कार्रवाई की जा रही हैं। लेकिन पब्लिक सिर्फ निलंबन को ही सजा मानती है। जबकि अधिकारियों, कर्मचारियों की सीमित संख्या की वजह से सभी को निलंबित कर पाना मुमकिन नहीं है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि संबंधित अधिकारी को सजा नहीं मिली, उसे सजा मिलती है। ऐसी सजा मिलती है कि उसके करियर में उसे आगे जाकर बहुत दिक्कतें होती हैं। कमिश्नर कहते हैं- सरकार की इतनी सख्ती है कि ये मुमकिन ही नहीं है कि किसी भी स्तर पर पब्लिक की सुनवाई ही न हो। देखिए VIDEO…


