पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजों को लेकर एग्जिट पोल सामने आ गए हैं। तमाम एग्जिट पोल में भाजपा को बढ़त मिल रही है। वहीं, ममता बनर्जी की टीएमसी को पीछे दिखाया गया है। हालांकि, कुछ एग्जिट पोल में भाजपा और टीएमसी के बीच कांटे की टक्कर भी देखी जा रही है।
भले ही एग्जिट पोल में भाजपा को मिल रही है, लेकिन टीएमसी का दावा है कि मुख्यमंत्री इस बार भी ममता बनर्जी ही बनेंगी। खैर, कौन बाजी मारेगा, यह 4 मई को स्पष्ट हो जाएगा।
बार-बार क्यों फ्लॉप साबित होता है एग्जिट पोल?
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि बंगाल में एग्जिट पोल बार-बार फ्लॉप साबित होता है। इसके बाद हर चुनाव के बाद एक ही सवाल जोर से उठता है, आखिर एग्जिट पोल्स इतनी बड़ी गलती क्यों करते हैं?
2021 के विधानसभा चुनाव में तो ये पोल्स पूरी तरह बेधड़क गलत साबित हुए। ज्यादातर एजेंसियों ने कांटे की टक्कर बताई थी। कुछ ने कहा- TMC 152-164 सीटें जीतेगी, तो कुछ ने 169 तक का अनुमान लगाया।
बेजीपी के बारे में क्या कहा गया?
वहीं, BJP+ को 109 से लेकर 192 सीटों तक का रेंज दिया गया। पोल ऑफ पोल्स में भी TMC+ को 135-154 और BJP+ को 125-143 के आसपास बताया गया। लेकिन जब असली नतीजे आए तो सब चौंक गए।
ममता बनर्जी की पार्टी ने 216 सीटों का भारी बहुमत हासिल कर लिया। BJP सिर्फ 77 सीटों पर सिमट कर रह गई। ये फर्क इतना बड़ा था कि लोग हैरान थे।
2024 में भी वही कहानी दोहराई गई
तीन साल बाद 2024 लोकसभा चुनाव आया। इस बार एग्जिट पोल्स थोड़े सावधानी से बनाए गए लग रहे थे। TMC+ को 13 से 21 सीटों के बीच दिखाया जा रहा था।
BJP+ के लिए 21-31 तक का अनुमान था। पोल ऑफ पोल्स ने TMC को 16-19 और BJP को 22-25 सीटें दी थीं। फिर भी नतीजे उलटे निकले।
TMC ने 29 सीटें जीत लीं जबकि BJP मात्र 12 पर अटक गई। दोनों चुनावों में एक बात साफ नजर आई – एग्जिट पोल्स भाजपा को ज्यादा सीटें दिखा रहे थे, लेकिन जमीन पर जनता ने कुछ और फैसला किया।
क्यों बार-बार फेल हो जाते हैं ये पोल्स?
पश्चिम बंगाल की राजनीति बाकी राज्यों से काफी अलग है। यहां जाति, धर्म, स्थानीय मुद्दे और ममता बनर्जी की छवि का ऐसा गहरा मेल है कि सामान्य सर्वेक्षण आसानी से सही तस्वीर नहीं पकड़ पाते। खासकर मुस्लिम बहुल इलाकों और दूर-दराज के गांवों में वोटिंग पैटर्न को सही-सही समझना मुश्किल हो जाता है।
बहुत से लोग सर्वे करने वालों से अपनी असली पसंद छुपा लेते हैं। इसे ‘shy voter’ कहते हैं। मतलब वोटर चुप रहता है, लेकिन वोटिंग के दिन अपना मन बना लेता है। दूसरी बड़ी समस्या पोलिंग एजेंसियों की कार्यशैली है।
कई एजेंसियां शहरों और आसानी से पहुंच वाले इलाकों पर ज्यादा भरोसा करती हैं। लेकिन बंगाल के ग्रामीण इलाके और छोटी बस्तियां अलग कहानी बताती हैं।


