जंग से तबाही के बीच फ्रांस की अचानक एंट्री! क्या उजड़ा हुआ लेबनान दुबारा बसेगा,जानें मैक्रों का ‘मास्टरप्लान’!

जंग से तबाही के बीच फ्रांस की अचानक एंट्री! क्या उजड़ा हुआ लेबनान दुबारा बसेगा,जानें मैक्रों का ‘मास्टरप्लान’!

Emmanuel Macron: तबाही और लगातार हमलों का सामना कर रहे लेबनान के लिए एक बड़ी राहत की खबर सामने आई है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने लेबनान की सेना को मजबूत करने और जंग की वजह से तबाह हो चुके देश के दक्षिणी हिस्से को फिर से बसाने के लिए एक अहम कदम उठाया है। मैक्रों ने इस संकट से निपटने के लिए एक बड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की मेजबानी करने का प्रस्ताव रखा है। यह ऐतिहासिक कदम ऐसे नाजुक समय में उठाया गया है, जब लेबनान अपने इतिहास के सबसे गहरे राजनीतिक, सैन्य और आर्थिक संकट से गुजर रहा है।

सम्मेलन का मकसद आर्थिक और रणनीतिक मदद जुटाने की पुख्ता तैयारी

साइप्रस में हुई उच्च स्तरीय वार्ता में फ्रांस ने लेबनान को संकट से उबारने की अपनी इस बड़ी योजना का खाका पेश किया। इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का मकसद महज कूटनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से यूरोपीय संघ के फंड और अन्य वैश्विक मंचों से भारी आर्थिक और रणनीतिक मदद जुटाने की पुख्ता तैयारी है। इस समय लेबनान का दक्षिणी इलाका सैन्य संघर्षों के कारण पूरी तरह से उजड़ चुका है, बुनियादी ढांचा नष्ट हो गया है और हजारों लोग बेघर हो चुके हैं। ऐसे में इस क्षेत्र का पुनर्निर्माण मैक्रों के इस मास्टरप्लान का मुख्य हिस्सा है। इस मौके पर साइप्रस के राष्ट्रपति निकोस क्रिस्टोडौलाइड्स भी मौजूद थे।

फ्रांस की नजर में राष्ट्रीय सेना का मजबूत होना बेहद जरूरी

कूटनीतिक और रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, फ्रांस का स्पष्ट मानना है कि लेबनान में स्थायी शांति और स्थिरता बहाल करने के लिए वहां की राष्ट्रीय सेना का मजबूत होना बेहद जरूरी है। लेबनानी सेना को इस समय आधुनिक हथियारों, बेहतर साजो-सामान और तकनीकी प्रशिक्षण की दरकार है ताकि वह देश की सीमाओं की मुस्तैदी से सुरक्षा कर सके और आंतरिक कानून-व्यवस्था को मजबूती से कायम रख सके। प्रस्तावित सम्मेलन के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की जाएगी कि वे लेबनानी सेना को सीधा और प्रभावी समर्थन माध्यम से, ताकि वह देश में सुरक्षा का मुख्य स्तंभ बन सके।

फ्रांस और लेबनान के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध बहुत मजबूत

गौरतलब है कि है कि फ्रांस और लेबनान के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध बहुत मजबूत रहे हैं। लेबनान पर एक समय में फ्रांस का ही जनादेश था, और इसी वजह से फ्रांसीसी नेतृत्व लगातार लेबनान के मामलों में अपनी दिलचस्पी और जिम्मेदारी दिखाता रहा है। 2020 में हुए भयानक बेरूत बंदरगाह धमाके के बाद भी मैक्रों लेबनान पहुंच कर जमीनी हालात का जायजा लेने वाले और मदद का हाथ बढ़ाने वाले पहले विदेशी नेताओं में से एक थे। अब जब मध्य पूर्व में तनाव अपने चरम पर है और जंग के साए मंडरा रहे हैं, तो फ्रांस की यह कूटनीतिक एंट्री लेबनान के आम नागरिकों के लिए एक बड़ी ‘संजीवनी’ साबित हो सकती है।

फ्रांस ने एहसास कराया,लेबनान अकेला नहीं है

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का यह भी कहना है कि अगर मैक्रों का यह प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन सफल होता है, तो इससे न केवल लेबनान की चरमराती अर्थव्यवस्था को एक बड़ा आर्थिक सहारा मिलेगा, बल्कि मध्य पूर्व के इस बेहद खूबसूरत देश में फिर से अमन और खुशहाली लौट सकेगी। हालांकि, इस बड़ी कामयाबी के लिए यूरोपीय संघ के अलावा अन्य वैश्विक शक्तियों और क्षेत्रीय देशों का एक मंच पर आना भी लाजिमी होगा। जाहिर है कि फ्रांस की इस ताजा पहल से एक नई और मजबूत उम्मीद जरूर जगाई है कि तबाही के इस मुश्किल दौर में लेबनान अकेला नहीं है।

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