क्या 25 घंटे का हो जाएगा दिन? चांद के दूर जाने से बदल जाएगा दिन-रात का गणित

क्या 25 घंटे का हो जाएगा दिन? चांद के दूर जाने से बदल जाएगा दिन-रात का गणित

क्या आपने कभी सोचा है कि अगर दिन में एक घंटा और मिल जाए तो कितना अच्छा होता?  वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसा होगा जरूर, लेकिन आपको इसके लिए करीब 20 करोड़ साल इंतजार करना पड़ेगा।

जी हां, पृथ्वी का एक दिन धीरे-धीरे बड़ा होता जा रहा है। अभी 24 घंटे का दिन है, आगे चलकर यह 25 घंटे का हो जाएगा। लेकिन यह बदलाव इतना धीमा है कि हम इसे अपनी पूरी जिंदगी में महसूस तक नहीं कर सकते।

आखिर क्यों धीमी हो रही पृथ्वी की घूमने की रफ्तार?

इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है हमारा चांद। चांद की गुरुत्वाकर्षण शक्ति समुद्र में ज्वार-भाटा पैदा करती है, यानी समुद्र का पानी ऊपर-नीचे होता रहता है। यह ज्वार-भाटा पृथ्वी के घूमने पर एक तरह का ब्रेक लगाता है।

इसे ऐसे समझिए जैसे कोई कुर्सी घूम रही हो और आप उस पर हल्के से पैर रख दें। कुर्सी घूमती रहेगी, लेकिन धीरे-धीरे उसकी रफ्तार कम होती जाएगी। बिल्कुल यही पृथ्वी के साथ हो रहा है।

नासा के वैज्ञानिकों ने भी इस बात की पुष्टि की है कि ज्वार-भाटे की वजह से पृथ्वी की घूमने की ऊर्जा धीरे-धीरे कम होती जा रही है। साथ ही चांद भी हर साल पृथ्वी से थोड़ा-थोड़ा दूर होता जा रहा है।

24 घंटे का दिन हमेशा से नहीं था

यह जानकर हैरानी होगी कि पृथ्वी पर हमेशा 24 घंटे का दिन नहीं रहा। अरबों साल पहले दिन बहुत छोटे हुआ करते थे। वैज्ञानिक पुराने सूर्यग्रहण के रिकॉर्ड और बेहद सटीक घड़ियों की मदद से यह हिसाब लगाते हैं कि पृथ्वी की रफ्तार कितनी बदली है।

टोरंटो विश्वविद्यालय के खगोलशास्त्री नॉर्मन मरे और उनकी टीम ने इस विषय पर गहरी रिसर्च की है। उनका कहना है कि पृथ्वी के दिन की लंबाई करोड़ों सालों में बदलती रही है और यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा।

सिर्फ चांद ही नहीं, और भी हैं कारण

चांद तो मुख्य कारण है, लेकिन अकेला नहीं। जब पहाड़ों पर जमी बर्फ पिघलती है या बड़े बांधों में पानी इकट्ठा होता है तो पृथ्वी का द्रव्यमान यानी वजन का बंटवारा बदलता है।

इससे भी पृथ्वी की घूमने की रफ्तार पर असर पड़ता है। नासा की एक रिपोर्ट बताती है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से बर्फ पिघलने से भी दिन की लंबाई में बेहद मामूली बदलाव आता है।

लीप सेकंड क्या होता है?

आपने लीप ईयर का नाम सुना होगा, लेकिन लीप सेकंड भी होता है। जब पृथ्वी की घड़ी और हमारी असली घड़ी में फर्क आ जाता है तो वैज्ञानिक एक सेकंड जोड़ते या घटाते हैं। यह इस बात का सबूत है कि वैज्ञानिक पृथ्वी की रफ्तार पर कितनी बारीकी से नजर रखते हैं।

तो क्या हमें चिंता करनी चाहिए?

वैज्ञानिकों ने चिंता जैसी कोई बात नहीं बताई है। 20 करोड़ साल बाद की बात आज की हमारी जिंदगी पर कोई असर नहीं डालती। यह एक दिलचस्प वैज्ञानिक तथ्य जरूर है, लेकिन घबराने की कोई वजह नहीं।

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