15,836 प्राचीन अवशेषों से समझा इंसानी विकास का सफर:10 हजार साल से थमा नहीं विकास, हमारे डीएनए में आज भी जारी है ‘लाइव कोडिंग’

विज्ञान की दुनिया में अब तक यह माना जाता था कि पिछले 10 हजार वर्षों में इंसानी शरीर लगभग स्थिर हो गया है। तर्क यह था कि हमारी ‘सांस्कृतिक प्रगति’… यानी खेती, तकनीक और चिकित्सा ने हमारी ‘जैविक प्रगति’ की रफ्तार को धीमा कर दिया है। पर जर्नल नेचर में प्रकाशित हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के एक ताजा और विशाल अध्ययन ने इस धारणा को पूरी तरह पलट दिया है। वैज्ञानिकों ने 15,836 प्राचीन मानव अवशेषों के डीएनए की जांच कर यह साबित कर दिया है कि इंसानी वजूद का ‘सॉफ्टवेयर’ आज भी अपडेट हो रहा है। इस शोध का सबसे रोचक पहलू यह है कि कई आनुवंशिक बदलाव हाल ही में हुए हैं। उदाहरण के लिए, सीलिएक रोग से जुड़ा म्यूटेशन सिर्फ 4 हजार साल पहले उभरा, यानी मिस्र के महान पिरामिडों से भी नया है। आश्चर्यजनक रूप से ‘नेचुरल सिलेक्शन’ ने इस बीमारी को बढ़ावा दिया। वैज्ञानिकों का मानना है कि प्राचीन काल में यह म्यूटेशन किसी महामारी या आंतों के संक्रमण से बचाव में मददगार रहा होगा। पर आज यह ऑटोइम्यून समस्या बन गया है। स्टडी में पता चला कि मानव जीन में कम से कम 479 वैरिएंट हैं जिन्हें पिछले 10 हजार वर्षों में प्रकृति ने बढ़ावा दिया। यूरोप में ‘टाइप बी’ ब्लड ग्रुप 6 हजार साल पहले दुर्लभ था, लेकिन अचानक फैलकर आज 10% आबादी में मौजूद है। जब इंसानों ने पशुपालन शुरू किया, तो एक खास म्यूटेशन फैला जिसने वयस्कों को दूध पचाने की क्षमता दी। कांस्य युग के अकाल में यह बदलाव जीवनरक्षक साबित हुआ। ये उदाहरण दिखाते हैं कि हालिया आनुवंशिक बदलाव इंसान की अनुकूलन की शक्ति को उजागर करते हैं। कुछ नतीजे वैज्ञानिकों को भी हैरान कर रहे हैं। स्टडी के अनुसार यूरोप में 10 हजार वर्ष से ऐसे जीन वेरिएंट लगातार घट रहे हैं जो धूम्रपान की आदत को बढ़ावा देते हैं, जबकि तंबाकू वहां 460 साल पहले आई। यह रहस्य अनसुलझा है। इसी तरह,‘नेचुरल सिलेक्शन’ ने उन जीन वैरिएंट्स को बढ़ावा दिया है जो लंबे समय तक पढ़ाई करने की क्षमता या रुचि से जुड़े हैं। चूंकि स्कूल व औपचारिक शिक्षा हाल की चीजें हैं, इसलिए अतीत में ये जीन बेहतर याददाश्त व तेज सीखने की क्षमता से जुड़े रहे होंगे। भविष्य की चुनौतियों के लिए आज भी खुद को तराश रहे हैं जीन यूसीएलए में भारतीय मूल की आनुवांशिकी वैज्ञानिक नंदिता गरुड़ कहती हैं,‘यह शोध साबित करता है कि खेती और बदलती जीवनशैली के साथ हमारा शरीर लगातार खुद को ढाल रहा है। हम कोई ऐसी मूर्ति नहीं हैं जो बनकर तैयार हो गई हो, बल्कि हम अनवरत चलने वाली प्रक्रिया हैं। हमारी ‘सांस्कृतिक प्रगति’ ने ‘जैविक प्रगति’ को रोका नहीं है, बल्कि उसे नए रास्ते दे दिए हैं। खान-पान से लेकर बीमारियों से लड़ने की क्षमता तक, हमारे जीन आज भी भविष्य की चुनौतियों के लिए खुद को तराश रहे हैं।’

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