क्या Income Tax खत्म होगा? Monzo के फाउंडर का बड़ा दावा, इंसान नहीं AI देगा सरकार को पैसा

क्या Income Tax खत्म होगा? Monzo के फाउंडर का बड़ा दावा, इंसान नहीं AI देगा सरकार को पैसा

दुनियाभर में AI के कारण नौकरियों पर छाए संकट को लेकर बहस तेज हो रही है। लेकिन क्या आपने ऐसा सोचा है कि जब नौकरियां कम होंगी तो सरकार को टैक्स कौन देगा? या सरकार के इनकम टैक्स में होने वाले घाटे को कैसे रिकवर किया जाएगा? दरअसल यह सवाल ऐसे समय में आया है, जब ब्रिटेन के मशहूर ऑनलाइन बैंक Monzo के संस्थापक Tom Blomfield ने हाल ही में एक पॉडकास्ट में अपने विचार रखें। पॉडकास्ट में उन्होंने कहा कि अगले पांच से छह साल में सरकारें इंसान की कमाई पर टैक्स लगाने के बजाय AI इन्फ्रास्ट्रक्चर यानी डेटा सेंटर जैसी कंप्यूटिंग व्यवस्था पर लेवी (शुल्क) लगाने जैसे कदम उठा सकती है।

टैक्स सिस्टम पर क्यों उठा सवाल?

The Rest is Money पॉडकास्ट में Tom Blomfield ने कहा, “मुझे नहीं लगता कि हम इनसान की मेहनत पर टैक्स लगाते रहेंगे। हम कंप्यूट पर यानी डेटा सेंटर जैसी व्यवस्थाओं पर टैक्स लगाएंगे और उस राजस्व से सरकार चलाएंगे।” यह बयान महज एक अटकल नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक ठोस तर्क है। जैसे-जैसे कंपनियां अपने कामकाज में AI को शामिल करती जा रही हैं, वैसे-वैसे मानव श्रम पर निर्भरता घट रही है। ऐसे में सरकारी राजस्व का सोर्स यानी इनकम टैक्स खतरे में पड़ सकता है।

Blomfield की चिंता सिर्फ टैक्स सिस्टम तक नहीं है। उन्होंने साफ कहा कि टैक्स अकाउंटिंग जैसे कई व्हाइट-कॉलर पेशों में जल्द ही बहुत कम लोगों की जरूरत रह जाएगी। यह चेतावनी तब और गंभीर हो जाती है जब जॉब्स साइट Adzuna की रिपोर्ट देखी जाए। इसके अनुसार एंट्री-लेवल नौकरियों के विज्ञापन नवंबर 2022 यानी ChatGPT के लॉन्च के समय की तुलना में 35 फीसदी घट चुके हैं।

OpenAI का प्रस्ताव

Tom Blomfield के बयान से एक हफ्ते पहले ही OpenAI ने एक सुझाव दिया था कि नीति निर्माताओं को कैपिटल, कॉर्पोरेट मुनाफे और AI से होने वाले दीर्घकालिक रिटर्न पर टैक्स लगाने पर विचार करना चाहिए। इसमें एक “रोबोट टैक्स” का जिक्र भी था, जो स्वचालित श्रम पर लगाया जा सके। यानी AI टैक्सेशन का विचार अब सिर्फ चर्चाओं तक सीमित नहीं रहा, यह नीतिगत दायरे में भी दाखिल हो रहा है।

AI टैक्स लगाना आसान नहीं

रिपोर्ट के अनुसार AI सर्विसेज पर टैक्स लगाना राजनीतिक और व्यावहारिक दोनों नजरिए से बेहद कठिन काम है। इससे पहले भी जब बड़ी अमेरिकी टेक कंपनियों पर लेवी लगाने की कोशिश हुई तो उसे कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। फिर भी यह बहस अब दुनिया के सबसे बड़े नीति निर्माताओं के दरवाजे पर दस्तक दे रही है और आने वाले वक्त में यह और तेज होगी।

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