बिहार में राष्ट्रीय औसत से अधिक एनीमिया:बिहार में 63% महिलाएं, 69.4% बच्चे एनीमिक

बिहार में राष्ट्रीय औसत से अधिक एनीमिया:बिहार में 63% महिलाएं, 69.4% बच्चे एनीमिक

राष्ट्रीय एनीमिया दिवस के अवसर पर एम्स पटना के सामुदायिक एवं पारिवारिक चिकित्सा विभाग के प्रोफेसर डॉ. संजय पांडेय ने महिलाओं और बच्चों में एनीमिया को एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि खराब खानपान, आयरन की कमी, बार-बार गर्भधारण और जागरूकता का अभाव इसके मुख्य कारण हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं अक्सर कमजोरी, थकान और चक्कर आने जैसे लक्षणों को सामान्य मानकर नजरअंदाज कर देती हैं, जिससे स्थिति और बिगड़ जाती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि एनीमिया केवल एक बीमारी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाली एक गंभीर समस्या है। आंकड़ों के अनुसार, बिहार में 63.5% महिलाएं और 69.4% बच्चे एनीमिया से पीड़ित हैं, जो राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है। एम्स पटना के डॉ. संतोष कुमार निराला के नेतृत्व में हाल ही में किए गए एक अंतरराष्ट्रीय शोध में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। ‘यूरोपियन जर्नल ऑफ क्लिनिकल एंड एक्सपेरिमेंटल मेडिसिन’ में प्रकाशित इस अध्ययन में डॉ. रजत राव, डॉ. विजय नंदा नायक, डॉ. श्रेयस पाटिल, डॉ. मनीषा वर्मा, डॉ. सीएम सिंह और डॉ. संजय पांडेय भी शामिल हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि केवल आयरन की गोलियां बांटने से इस समस्या का पूर्ण समाधान नहीं होगा। इसके पीछे सामाजिक असमानता, भोजन में विविधता की कमी, पेट के कीड़े और भूजल में आर्सेनिक व फ्लोराइड का प्रदूषण जैसे गहरे कारण जिम्मेदार हैं। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि ठोस नीतिगत बदलाव नहीं किए गए, तो यह आने वाली पीढ़ी की मानसिक और शारीरिक क्षमता को स्थायी नुकसान पहुंचा सकता है। यह है गंभीर तस्वीर: 6-59 माह के 69.4% बच्चे एनीमिया से पीड़ित हैं। 15-49 वर्ष की 63.5% महिलाएं इससे प्रभावित हैं। 65-70% किशोरियों व महिलाओं को नियमित रूप से आयरन की गोलियां नहीं मिल पा रही हैं। सामाजिक कारण: कई क्षेत्रों में महिलाओं को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता। परिवार में महिलाओं के सबसे अंत में भोजन करने की परंपरा। भूजल में आर्सेनिक और फ्लोराइड की मौजूदगी। बच्चों में हुकवर्म संक्रमण की उच्च दर। क्या है समाधान? संतुलित आहार और फोर्टिफाइड (पोषक तत्वों से युक्त) खाद्य पदार्थों का सेवन। आयरन-फोलिक एसिड की नियमित खुराक। स्वच्छ पेयजल और स्वच्छता का ध्यान रखना। नियमित स्वास्थ्य जांच और कृमि मुक्ति (कीड़े मारने की) दवा का सेवन। राष्ट्रीय एनीमिया दिवस के अवसर पर एम्स पटना के सामुदायिक एवं पारिवारिक चिकित्सा विभाग के प्रोफेसर डॉ. संजय पांडेय ने महिलाओं और बच्चों में एनीमिया को एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि खराब खानपान, आयरन की कमी, बार-बार गर्भधारण और जागरूकता का अभाव इसके मुख्य कारण हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं अक्सर कमजोरी, थकान और चक्कर आने जैसे लक्षणों को सामान्य मानकर नजरअंदाज कर देती हैं, जिससे स्थिति और बिगड़ जाती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि एनीमिया केवल एक बीमारी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाली एक गंभीर समस्या है। आंकड़ों के अनुसार, बिहार में 63.5% महिलाएं और 69.4% बच्चे एनीमिया से पीड़ित हैं, जो राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है। एम्स पटना के डॉ. संतोष कुमार निराला के नेतृत्व में हाल ही में किए गए एक अंतरराष्ट्रीय शोध में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। ‘यूरोपियन जर्नल ऑफ क्लिनिकल एंड एक्सपेरिमेंटल मेडिसिन’ में प्रकाशित इस अध्ययन में डॉ. रजत राव, डॉ. विजय नंदा नायक, डॉ. श्रेयस पाटिल, डॉ. मनीषा वर्मा, डॉ. सीएम सिंह और डॉ. संजय पांडेय भी शामिल हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि केवल आयरन की गोलियां बांटने से इस समस्या का पूर्ण समाधान नहीं होगा। इसके पीछे सामाजिक असमानता, भोजन में विविधता की कमी, पेट के कीड़े और भूजल में आर्सेनिक व फ्लोराइड का प्रदूषण जैसे गहरे कारण जिम्मेदार हैं। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि ठोस नीतिगत बदलाव नहीं किए गए, तो यह आने वाली पीढ़ी की मानसिक और शारीरिक क्षमता को स्थायी नुकसान पहुंचा सकता है। यह है गंभीर तस्वीर: 6-59 माह के 69.4% बच्चे एनीमिया से पीड़ित हैं। 15-49 वर्ष की 63.5% महिलाएं इससे प्रभावित हैं। 65-70% किशोरियों व महिलाओं को नियमित रूप से आयरन की गोलियां नहीं मिल पा रही हैं। सामाजिक कारण: कई क्षेत्रों में महिलाओं को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता। परिवार में महिलाओं के सबसे अंत में भोजन करने की परंपरा। भूजल में आर्सेनिक और फ्लोराइड की मौजूदगी। बच्चों में हुकवर्म संक्रमण की उच्च दर। क्या है समाधान? संतुलित आहार और फोर्टिफाइड (पोषक तत्वों से युक्त) खाद्य पदार्थों का सेवन। आयरन-फोलिक एसिड की नियमित खुराक। स्वच्छ पेयजल और स्वच्छता का ध्यान रखना। नियमित स्वास्थ्य जांच और कृमि मुक्ति (कीड़े मारने की) दवा का सेवन।  

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