इंदौर में रोजाना बोरिंग करवाने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) की चेतावनियों के बावजूद शहर में प्रतिदिन 20 से 25 नए बोरिंग किए जा रहे हैं। नर्मदा जल की गुणवत्ता को लेकर घटते भरोसे और भागीरथपुरा जैसी घटनाओं के बाद लोग अब अपने निजी जल स्रोत पर निर्भर होना चाहते हैं। वहीं प्रशासन ने अप्रैल बीतने के बावजूद अवैध बोरिंग और मशीनों के रजिस्ट्रेशन को लेकर कोई सख्त दिशा-निर्देश जारी नहीं किए हैं। 73% क्षेत्र ‘अति-दोहन’ की श्रेणी में रिपोर्ट के अनुसार, इंदौर जिले में भूजल दोहन का स्तर 117% तक पहुंच गया है, यानी जितना पानी जमीन में रिचार्ज हो रहा है, उससे कहीं अधिक निकाला जा रहा है। जिले का 73 फीसदी हिस्सा ‘अति-दोहन’ (Over-Exploited) की श्रेणी में आ चुका है और विशेषज्ञों का कहना है कि अब एक वर्ग किलोमीटर क्षेत्र भी सुरक्षित नहीं बचा है। शहरी क्षेत्र की स्थिति भी ‘क्रिटिकल’ हो चुकी है। जनवरी में भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई मौतों के बाद लोगों में सुरक्षित पानी को लेकर चिंता बढ़ी है। यही कारण है कि शहर में बोरिंग की मांग तेजी से बढ़ रही है। बोरिंग एजेंसियों के अनुसार, आउटर एरिया—बायपास, सुपर कॉरिडोर और MR-12 जैसे क्षेत्रों में लगातार बुकिंग मिल रही है, जबकि शहर के अंदर इंतजार और ज्यादा करना पड़ रहा है। वर्तमान में घरेलू बोरिंग की दर 140 से 150 रुपये प्रति फीट है, जबकि अनुमति के नाम पर अतिरिक्त राशि भी ली जा रही है। जलस्तर लगातार गिर रहा विशेषज्ञों के अनुसार, जिले में भूजल का रिचार्ज मुख्यतः बारिश पर निर्भर है, लेकिन रिचार्ज के साधन बेहद सीमित हैं। पहले नवंबर तक 8–15 फीट पर पानी मिल जाता था, जो अब 18–35 फीट या उससे अधिक गहराई पर पहुंच गया है। अनियंत्रित बोरिंग के कारण जल भंडार तेजी से घट रहा है, जिससे भविष्य में गंभीर संकट की आशंका है। प्रदेश में सबसे नीचे पहुंचा जलस्तर CGWB की 2024-25 रिपोर्ट के मुताबिक, मध्य प्रदेश के 51 जिलों में इंदौर का भूजल स्तर सबसे अधिक नीचे चला गया है। प्री-मानसून (मई 2024) में यहां जलस्तर 49.43 मीटर (करीब 162-164 फीट) दर्ज किया गया, जो पूरे प्रदेश में सबसे गहरा है। तुलना करें तो राजधानी भोपाल में यह स्तर करीब 1.2 मीटर (4 फीट) है, यानी इंदौर का जलस्तर लगभग 40 गुना ज्यादा गहराई पर है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह आंकड़े निगरानी कुओं के औसत हैं, जबकि निजी बोरिंग 500 से 700 फीट तक पहुंच चुके हैं, जिससे वास्तविक स्थिति और भी गंभीर हो सकती है। नियंत्रण जरूरी, नहीं तो संकट तय विशेषज्ञों का कहना है कि प्रशासन यदि बोरिंग मशीनों के रजिस्ट्रेशन और अनुमति प्रक्रिया को सख्ती से लागू करे तो इस पर नियंत्रण संभव है। फिलहाल इंदौर (ग्रामीण), देपालपुर और सांवेर ब्लॉक ‘अति-दोहन’ की श्रेणी में हैं, जबकि शहरी क्षेत्र ‘क्रिटिकल’ और महू ‘सेमी-क्रिटिकल’ स्थिति में है। यदि अनियंत्रित दोहन जारी रहा, तो आने वाले समय में इंदौर को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है।


