488-साल पुरानी नाटी इमली की भरत मिलाप लीला की तारीख:विजयादशमी के दो दिन बाद भाइयों का मिलन,5 मिनट की लीला देखने जुटेंगे लाखों श्रद्धालु

488-साल पुरानी नाटी इमली की भरत मिलाप लीला की तारीख:विजयादशमी के दो दिन बाद भाइयों का मिलन,5 मिनट की लीला देखने जुटेंगे लाखों श्रद्धालु

काशी की 488 साल पुरानी और विश्वप्रसिद्ध नाटी इमली की भरत मिलाप लीला इस बार बदली हुई तारीख पर आयोजित होगी। पंचांगों में तिथियों की गणना के अंतर के कारण विजयादशमी के अगले दिन होने वाली यह ऐतिहासिक लीला अब 22 अक्तूबर को होगी। खास बात यह है कि आयोजकों के अनुसार, पहली बार विजयादशमी के दो दिन बाद एकादशी तिथि पर भरत मिलाप का आयोजन किया जाएगा। वहीं, 19 अक्तूबर को अष्टमी और नवमी की पूजा होगी। तिथियों में बदलाव से काशी के प्रमुख धार्मिक आयोजनों का कैलेंडर भी प्रभावित हुआ है। श्रीचित्रकूट रामलीला समिति के व्यवस्थापक मुकुंद उपाध्याय ने बताया कि आश्विन शुक्ल पक्ष की एकादशी यानी पापांकुशा एकादशी पर नाटी इमली की भरत मिलाप लीला आयोजित होती है। काशी के पंचांगों के अनुसार, इस बार एकादशी 22 अक्तूबर को पड़ रही है। इसी वजह से लीला की तारीख निर्धारित की गई है। परंपरागत रूप से विजयादशमी के अगले दिन होने वाली इस लीला के लिए इस बार श्रद्धालुओं को एक दिन अतिरिक्त इंतजार करना होगा। यदुवंशियों के कंधों पर सवार होकर आते हैं रघुकुल के राम नाटी इमली का भरत मिलाप केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि काशी की सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक समरसता का भी प्रतीक है। इस लीला में यदुवंशी समाज के लोग भगवान श्रीराम के पुष्पक विमान को अपने कंधों पर उठाकर लीला स्थल तक लाते हैं। करीब पांच टन वजनी पुष्पक विमान को फूलों की तरह उठाकर ले जाने का दृश्य श्रद्धालुओं के लिए खास आकर्षण होता है। इसके बाद राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के मिलन का अद्भुत दृश्य देखने को मिलता है। धोती-बनियान पहने, सिर पर पगड़ी बांधे और आंखों में सुरमा लगाए यादव बंधुओं की टोली इस परंपरा को जीवंत करती है। सदियों से चली आ रही यह परंपरा काशी की गंगा-जमुनी तहजीब और आपसी भाईचारे की अनूठी मिसाल पेश करती है। पांच मिनट के लिए थम जाती है काशी की सांसें भरत मिलाप का सबसे भावुक क्षण शाम करीब 4:40 बजे आता है। उस समय अस्ताचलगामी सूर्य की किरणें भरत मिलाप मैदान के निर्धारित स्थान पर पड़ती हैं। इसी दौरान भरत और शत्रुघ्न अपने भाइयों के स्वागत में जमीन पर लेट जाते हैं। दूसरी ओर, वनवास समाप्त होने के बाद भगवान श्रीराम और लक्ष्मण अपने भाइयों से मिलने के लिए दौड़ पड़ते हैं। चारों भाइयों का मिलन होते ही पूरा मैदान जय श्रीराम के उद्घोष से गूंज उठता है। करीब पांच मिनट का यह दृश्य श्रद्धालुओं को भावविभोर कर देता है। इसी क्षण को देखने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु और पर्यटक काशी पहुंचते हैं। काशी नरेश की मौजूदगी बढ़ाती है आयोजन की भव्यता नाटी इमली की भरत मिलाप लीला में काशी राजपरिवार की मौजूदगी भी परंपरा का अहम हिस्सा है। पूर्व काशी नरेश महाराज उदित नारायण सिंह ने वर्ष 1796 में पहली बार इस लीला में भाग लिया था। इसके बाद राजपरिवार की पीढ़ियां इस परंपरा का निर्वहन करती रही हैं। काशी नरेश की शाही मौजूदगी और यदुवंशियों की सहभागिता इस आयोजन को विशिष्ट बनाती है।

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