46 साल से मंदिर के कपाट खुलवा रहे फूफून मियां:चैत्र और शारदीय नवरात्र में देवरिया पहुंचते हैं, ढोल-ताशे की थाप से खुलता है कपाट

46 साल से मंदिर के कपाट खुलवा रहे फूफून मियां:चैत्र और शारदीय नवरात्र में देवरिया पहुंचते हैं, ढोल-ताशे की थाप से खुलता है कपाट

शारदीय नवरात्र में शहर के ऐतिहासिक देवरही मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है। सुबह से देर रात तक माता के जयकारे गूंज रहे हैं। हवन-पूजन, आरती और कन्या भोज के बीच मंदिर की एक परंपरा लोगों का ध्यान खींचती है। बिहार के छपरा जिले के रहने वाले फूफून मियां पिछले 46 साल से हर चैत्र और शारदीय नवरात्र में यहां पहुंचते हैं। वह ढोल-ताशा बजाकर, मां के कपाट खुलने के समय अपनी सेवा देते हैं। सुबह 3:30 बजे से शुरू हो जाती है सेवा नवरात्र के दौरान, फूफून मियां रोज सुबह करीब 3:30 बजे मंदिर के सामने पहुंच जाते हैं। ढोल-ताशे की थाप के साथ मंदिर परिसर में दिन की शुरुआत होती है। उनकी यह परंपरा कई दशकों से चली आ रही है। नवरात्र के दिनों में, देर रात तक ढोल बजाकर वह मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं के उत्साह में शामिल रहते हैं। फूफून मियां के अनुसार, मां देवरही के दरबार में सेवा करना उनके लिए केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि आस्था का विषय है। उनका कहना है कि जब से उन्होंने यहां आना शुरू किया, तब से उनके परिवार ने जीवन में प्रगति की है। मंदिर से उनका जुड़ाव लगातार बना हुआ है और वह हर साल नवरात्र में यहां आने की पूरी कोशिश करते हैं। आस्था के साथ सौहार्द्र का संदेश फूफून मियां की सेवा हिंदू-मुस्लिम एकता और आपसी सद्भाव की मिसाल के रूप में देखी जाती है। अलग-अलग समुदायों के श्रद्धालु उनके योगदान को सम्मान की नजर से देखते हैं। उनका मानना है कि धर्म का संदेश इंसानियत, आपसी प्रेम और सबकी भलाई है। मंदिर में उनकी मौजूदगी यह संदेश देती है कि आस्था और सेवा लोगों को जोड़ने का सशक्त माध्यम बन सकती हैं। नवरात्र में उमड़ते हैं श्रद्धालु देवरही मंदिर में नवरात्र के नौ दिनों तक विशेष पूजा-अर्चना होती है। श्रद्धालु दर्शन-पूजन के साथ हवन में शामिल होते हैं। नवमी पर कन्या पूजन और भोज का आयोजन भी किया जाता है। मंदिर परिसर में भजन-कीर्तन और प्रसाद वितरण के बीच मेले जैसा माहौल रहता है। सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन और पुलिस भी पूरी तरह सक्रिय रहती है। देवरही मंदिर की पहचान उसकी धार्मिक परंपराओं के साथ-साथ ऐसे लोगों से भी जुड़ी है, जो वर्षों से निःस्वार्थ भाव से सेवा कर रहे हैं। फूफून मियां की 46 साल पुरानी परंपरा इसी साझा सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक सौहार्द्र की कहानी कहती है।

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