पीने के पानी को तरसे गिरिडीह के 40 आदिवासी परिवार:गांव में न चापाकल, न बोरिंग, 3 किमी दूर नदी से ला रहे पानी, प्रशासन मौन

पीने के पानी को तरसे गिरिडीह के 40 आदिवासी परिवार:गांव में न चापाकल, न बोरिंग, 3 किमी दूर नदी से ला रहे पानी, प्रशासन मौन

गिरिडीह जिले के डुमरी प्रखंड अंतर्गत आदिवासी बहुल झरना गांव इन दिनों भीषण गर्मी और पेयजल संकट की दोहरी मार झेल रहा है। सूरज की तपिश जैसे-जैसे बढ़ रही है, गांव के लोगों की मुश्किलें और गहरी होती जा रही हैं। आजादी के सात दशक बीत जाने के बाद भी यह गांव बुनियादी सुविधाओं से वंचित है। करीब 40 घरों में रहने वाले 250 से 300 ग्रामीणों के लिए पानी अब सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। हालत यह है कि लोगों को अपनी प्यास बुझाने के लिए रोजाना तीन किलोमीटर दूर जंगल और पहाड़ी रास्तों से पानी ढोकर लाना पड़ता है। खबर से जुड़ी तस्वीरें देखें… जंगल के डाडी पर टिकी लोगों की जिंदगी गांव के चारों ओर घने जंगल हैं। इन्हीं जंगलों के बीच एक डाडी (पेयजल के बीच छोटा कुआंनुमा) में जमा पानी ही ग्रामीणों का सहारा बना हुआ है। स्थानीय महिलाओं हेमंती हांसदा, शांति मुर्मू और बिनीता बताती हैं कि तपती धूप में सिर पर मटके रखकर पहाड़ी रास्तों से पानी लाना किसी सजा से कम नहीं है। कई बार फिसलन भरे रास्ते पर गिरने का खतरा भी बना रहता है। इसके बावजूद प्यास बुझाने के लिए यही एकमात्र विकल्प है। रात में पानी खत्म हो जाए तो जंगल जाने का डर अलग सताता है, लेकिन मजबूरी के आगे हर डर छोटा पड़ जाता है। नल-जल योजना अधूरी, चापाकल भी बेकार ग्रामीणों के अनुसार गांव तक पहुंचने के लिए भी लंबा और कठिन रास्ता तय करना पड़ता है। यहां एक भी चालू चापाकल नहीं है। करीब पांच वर्ष पहले एक बोरिंग कराई गई थी, लेकिन तीन सौ फीट खुदाई के बाद भी पानी नहीं निकला। इसके बाद से न तो कोई नई पहल हुई और न ही कोई स्थायी समाधान निकला। पंचायत प्रतिनिधियों द्वारा कई बार विभाग को अवगत कराया गया, लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है। गांव वालों की माने तो पेयजल संकट का असर अब गांव के सामाजिक जीवन पर भी पड़ने लगा है। ग्रामीणों का कहना है कि शादी-विवाह जैसे शुभ कार्य भी इस समस्या से प्रभावित हो रहे हैं। बाहर से रिश्तेदार जब गांव देखने आते हैं। पानी की स्थिति देखते हैं तो रिश्ता करने से इनकार कर देते हैं। सरकार से आस, समाधान की दरकार ग्रामीण अर्जुन मांझी और रामु मुर्मू बताते हैं कि महिलाओं को स्नान और पानी भरने के लिए जंगल जाना पड़ता है, जिससे सुरक्षा का खतरा बना रहता है। पंचायत समिति सदस्य सत्यनारायण महतो का कहना है कि पास के डाडी से पाइपलाइन के जरिए पानी की आपूर्ति की जा सकती है, लेकिन इसके लिए विभाग को पहल करनी होगी। पीएचडी विभाग के जेई जयप्रकाश यादव ने भी माना कि पहले की बोरिंग विफल रही थी। अब इस समस्या से उच्च अधिकारियों को अवगत कराया गया है। ग्रामीणों की मांग है कि भीषण गर्मी के इस दौर में सरकार जल्द से जल्द स्थायी समाधान निकालकर उन्हें राहत दे, ताकि झरना गांव की प्यास बुझ सके। गिरिडीह जिले के डुमरी प्रखंड अंतर्गत आदिवासी बहुल झरना गांव इन दिनों भीषण गर्मी और पेयजल संकट की दोहरी मार झेल रहा है। सूरज की तपिश जैसे-जैसे बढ़ रही है, गांव के लोगों की मुश्किलें और गहरी होती जा रही हैं। आजादी के सात दशक बीत जाने के बाद भी यह गांव बुनियादी सुविधाओं से वंचित है। करीब 40 घरों में रहने वाले 250 से 300 ग्रामीणों के लिए पानी अब सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। हालत यह है कि लोगों को अपनी प्यास बुझाने के लिए रोजाना तीन किलोमीटर दूर जंगल और पहाड़ी रास्तों से पानी ढोकर लाना पड़ता है। खबर से जुड़ी तस्वीरें देखें… जंगल के डाडी पर टिकी लोगों की जिंदगी गांव के चारों ओर घने जंगल हैं। इन्हीं जंगलों के बीच एक डाडी (पेयजल के बीच छोटा कुआंनुमा) में जमा पानी ही ग्रामीणों का सहारा बना हुआ है। स्थानीय महिलाओं हेमंती हांसदा, शांति मुर्मू और बिनीता बताती हैं कि तपती धूप में सिर पर मटके रखकर पहाड़ी रास्तों से पानी लाना किसी सजा से कम नहीं है। कई बार फिसलन भरे रास्ते पर गिरने का खतरा भी बना रहता है। इसके बावजूद प्यास बुझाने के लिए यही एकमात्र विकल्प है। रात में पानी खत्म हो जाए तो जंगल जाने का डर अलग सताता है, लेकिन मजबूरी के आगे हर डर छोटा पड़ जाता है। नल-जल योजना अधूरी, चापाकल भी बेकार ग्रामीणों के अनुसार गांव तक पहुंचने के लिए भी लंबा और कठिन रास्ता तय करना पड़ता है। यहां एक भी चालू चापाकल नहीं है। करीब पांच वर्ष पहले एक बोरिंग कराई गई थी, लेकिन तीन सौ फीट खुदाई के बाद भी पानी नहीं निकला। इसके बाद से न तो कोई नई पहल हुई और न ही कोई स्थायी समाधान निकला। पंचायत प्रतिनिधियों द्वारा कई बार विभाग को अवगत कराया गया, लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है। गांव वालों की माने तो पेयजल संकट का असर अब गांव के सामाजिक जीवन पर भी पड़ने लगा है। ग्रामीणों का कहना है कि शादी-विवाह जैसे शुभ कार्य भी इस समस्या से प्रभावित हो रहे हैं। बाहर से रिश्तेदार जब गांव देखने आते हैं। पानी की स्थिति देखते हैं तो रिश्ता करने से इनकार कर देते हैं। सरकार से आस, समाधान की दरकार ग्रामीण अर्जुन मांझी और रामु मुर्मू बताते हैं कि महिलाओं को स्नान और पानी भरने के लिए जंगल जाना पड़ता है, जिससे सुरक्षा का खतरा बना रहता है। पंचायत समिति सदस्य सत्यनारायण महतो का कहना है कि पास के डाडी से पाइपलाइन के जरिए पानी की आपूर्ति की जा सकती है, लेकिन इसके लिए विभाग को पहल करनी होगी। पीएचडी विभाग के जेई जयप्रकाश यादव ने भी माना कि पहले की बोरिंग विफल रही थी। अब इस समस्या से उच्च अधिकारियों को अवगत कराया गया है। ग्रामीणों की मांग है कि भीषण गर्मी के इस दौर में सरकार जल्द से जल्द स्थायी समाधान निकालकर उन्हें राहत दे, ताकि झरना गांव की प्यास बुझ सके।  

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