1 नंबर से रह गया था, अबकी वर्दी पक्की है:9 चक्कर लगाकर मैदान में गिरा फिर नहीं उठा, शामली में शव से लिपटकर रोए पिता

1 नंबर से रह गया था, अबकी वर्दी पक्की है:9 चक्कर लगाकर मैदान में गिरा फिर नहीं उठा, शामली में शव से लिपटकर रोए पिता

गाजियाबाद में PAC की भर्ती दौड़ में शामली के 23 साल के विवेक कुमार को अचानक सीने में दर्द हुआ। वह ग्रााउंड में पोल पकड़कर कुछ देर सीना दबाए खड़ा रहा, फिर गिर गया। आनन-फानन में उसे हॉस्पिटल ले जाया गया, लेकिन रास्ते में ही मौत हो गई। घटना मंगलवार (6 अक्टूबर) दोपहर 1 बजे की है। 7 अक्टूबर की सुबह विवेक का शव शामली जिला मुख्यालय से करीब 20 किमी दूर पुरमाफी गांव पहुंचा। अंतिम यात्रा में शामिल हर शख्स की आंखें नम थीं। पिता शव से लिपटकर रो पड़े। गांव के बड़े-बुजुर्गों की जुबान पर बस यही था- विवेक कहता था कि पिछली बार एक नंबर से रह गया था। अबकी तो वर्दी पहनकर ही आऊंगा। दैनिक भास्कर टीम ऊन तहसील में विवेक के गांव पहुंची। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… बोलने से पहले फफककर रो पड़े पिता गांव में अजीब-सा सन्नाटा पसरा था। बड़े-बुजुर्ग तख्त-चारपाई पर बैठे बस विवेक की बात कर रहे थे। इस बीच हमारी टीम को देखकर एक बुजुर्ग ने पास में खाली जगह पर बैठने का इशारा किया। गमगमीन माहौल में किसी तरह हिम्मत जुटाकर हमने विवेक के बारे में पूछा। विवेक के पिता बालेंद्र सिंह कुछ बोलते, उससे पहले ही वह फफक पड़े। किसी तरह गांव के लोगों ने उन्हें संभाला। सामने बैठे एक युवक ने उनकी ओर पानी बढ़ाया। दो घूंट पानी पीने के बाद थोड़ी देर तक उनकी निगाहें दूर सड़क पर आ-जा रहे लोगों को एकटक देखती रहीं। सामान्य होने पर उन्होंने अपनी बात शुरू की। ‘पापा, इस बार नंबर जरूर आएगा…’ खेती-बाड़ी करने वाले बालेंद्र कहते हैं- विवेक मेरा इकलौता बेटा था। हमेशा कहता था कि वर्दी जरूर पहनूंगा। बस एक नंबर से रह गया था पिछली बार। इस बार तो खाकी पहनकर ही लौटूंगा। किसान पिता ने खेतों में पसीना बहाकर अपने इकलौते बेटे के सपनों को सींचा था। मां हर दिन यही दुआ मांगती थी कि बेटे के कंधे पर सितारे चमकें। गाजियाबाद के गोविंदपुरी मैदान पर हुई घटना 6 अक्टूबर को 47वीं वाहिनी पीएसी गोविंदपुरम (गाजियाबाद) का वो रेसिंग ट्रैक, विवेक की जिंदगी का आखिरी मैदान बन जाएगा, किसी ने सोचा नहीं था। दौड़ शुरू हुई, पैर तेजी से मंजिल की तरफ बढ़ रहे थे। लेकिन, अचानक चाल थमी और विवेक अचेत होकर गिर पड़े। कोच ने प्रतिभा पहचानकर एडमिशन दिलाया विवेक की कहानी सिर्फ एक अभ्यर्थी की नहीं, एक होनहार खिलाड़ी के संघर्ष की भी थी। गांव के प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाई के दौरान पास के मैदान में वॉलीबॉल खेलते-खेलते विवेक की प्रतिभा निखरी। कोच भारत वीर (बबला) ने उसकी प्रतिभा पहचानकर गोरखपुर की वीर बहादुर स्पोट्‌र्स अकादमी में दाखिला कराया। घर का इकलौता बेटा होने के नाते परिवार की जिम्मेदारियों का अहसास हुआ। खेल बीच में छोड़कर गांव लौटा। फिर बीए की पढ़ाई के साथ पुलिस भर्ती की तैयारी में जुट गया। गांववाले बताते हैं कि विवेक के पिता भी अच्छे खिलाड़ी रहे थे। वह क्रिकेट खेलते थे। कोच बोले- 35 खिलाड़ियों में सबसे अच्छा विवेक था विवेक के कोच भारत वीर कहते हैं- गांव में करीब 35 खिलाड़ी वॉलीबॉल खेलते हैं। विवेक उनमें सबसे उम्दा और मेहनती था। परिवार की वजह से उसे खेल छोड़ना पड़ा, लेकिन उसने कभी हिम्मत नहीं हारी। पुलिस भर्ती ही उसका एकमात्र जुनून बन गया था। गाजियाबाद से पहले 2 अन्य भर्तियों में भी विवेक शामिल हो चुका था। इससे पहले वाली भर्ती पीलीभीत में थी। उसमें वह एक नंबर से रह गया था। दोस्त बोला- 4 अक्टूबर को स्टेशन पर मिला था, बहुत खुश था विवेक के करीबी दोस्त विवेक तोमर ने बताया- 4 अक्टूबर को हिंद रेलवे स्टेशन पर विवेक से मुलाकात हुई थी। वह भर्ती को लेकर बेहद उत्साहित था। बार-बार कह रहा था कि इस बार तैयारी पूरी है, खाकी मेरी होगी। 6 अक्टूबर की रात जब विवेक की मौत की खबर गांव पहुंची, तो परिवारवालों को भी यकीन नहीं हुआ। घबराए पिता ने बेटे के नंबर पर बार-बार फोन मिलाया, लेकिन दूसरी तरफ सिर्फ घंटी बजती रही। जब झिंझाना (शामली) पुलिस ने अधिकारिक पुष्टि की, तो घर में चीख-पुकार मच गई। गमगीन माहौल में अंतिम संस्कार 7 अक्टूबर को जब विवेक का पार्थिव शरीर पुरमाफी गांव पहुंचा, तो माहौल इतना गमगीन हो गया कि ढांढस बंधाने आए लोगों की आंखें भी छलक आईं। रोती-बिलखती मां और बड़ी बहन सविता का बुरा हाल था। दोपहर में ही उनका अंतिम संस्कार किया गया। थानाभवन विधायक अशरफ अली और पूर्व विधायक राव वारिस ने विवेक के घर पहुंचकर परिवार से मुलाकात की और शोक जताया। जिस बेटे को एक किसान पिता खाकी वर्दी में देखने की आस लगाए बैठा था, वह जिंदगी की दौड़ में हमेशा के लिए पीछे छूट गया। अब पुरमाफी गांव की गलियों में सिर्फ विवेक के खेल के किस्से और उसका अधूरा सपना ही बाकी रह गया है। —————————- यह खबर भी पढ़ें… अमिताभ ने प्रतापगढ़ के लोगों से माफी मांगी:लाइब्रेरी का 2006 में उद्घाटन, किताबें अब तक नहीं; लोग बोले- उन्हें KBC में ही गांव याद आता है यूपी के प्रतापगढ़ में हरिवंश राय बच्चन के नाम पर बनी लाइब्रेरी में उद्घाटन के 20 साल बाद भी किताबें नहीं हैं। हाल ही में कौन बनेगा करोड़पति (KBC) के मंच पर अमिताभ बच्चन ने इस बात को लेकर माफी मांगी। कहा- आप लोग घबराइए नहीं, जल्द ही लाइब्रेरी शुरू होगी। दैनिक भास्कर की टीम प्रतापगढ़ जिला मुख्यालय से 30 किमी दूर बाबूपट्‌टी पहुंची। अमिताभ बच्चन के पैतृक गांव से रिपोर्ट पढ़िए…

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