इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने बीफार्मा पाठ्यक्रम संचालित करने वाले संस्थानों के लिए राज्य सरकार से अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) की अनिवार्यता पर फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई) से स्पष्टीकरण मांगा है। न्यायालय ने पूछा है कि जब पीसीआई स्वयं संस्थानों की आधारभूत सुविधाओं और निर्धारित मानकों की जांच करती है, तो राज्य सरकार की एनओसी की आवश्यकता क्यों है। न्यायमूर्ति राजन राय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने बीफार्मा कोर्स रेग्युलेशंस-2014 का हवाला दिया। इन प्रावधानों के अनुसार, संस्थानों के पास भवन, प्रयोगशालाएं, उपकरण, शिक्षण और गैर-शिक्षण स्टाफ सहित सभी निर्धारित सुविधाएं होनी चाहिए। न्यायालय ने राज्य सरकार से एनओसी जारी करने के लिए निर्धारित प्रारूप और स्पष्ट मानकों के बारे में भी पूछा। न्यायालय ने इस बात पर भी गौर किया कि बीफार्मा पाठ्यक्रम के लिए एनओसी अनिवार्य है, जबकि डीफार्मा के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। पीसीआई को रेग्युलेशन-9 में उल्लिखित ‘स्कीम’ का अर्थ और उसकी प्रक्रिया स्पष्ट करने का निर्देश दिया गया है। खंडपीठ ने एनओसी और ‘कंसेंट फॉर एफिलिएशन’ के बीच के अंतर पर भी सवाल उठाए। न्यायालय ने प्रथम दृष्टया टिप्पणी की कि किसी संस्थान को संबद्धता देने का विषय संबंधित विश्वविद्यालय या संबद्धता प्रदान करने वाली संस्था से जुड़ा है। पीसीआई की मंजूरी के बाद ही संबद्धता पर विचार किया जा सकता है। न्यायालय ने यह भी कहा कि पीसीआई स्वयं निरीक्षण के जरिए संस्थान में निर्धारित मानकों की जांच कर सकती है, इसलिए राज्य सरकार की एनओसी की भूमिका स्पष्ट होनी चाहिए। न्यायालय ने बीफार्मा और डीफार्मा संस्थानों या पाठ्यक्रमों के संबंध में राज्य सरकार द्वारा ‘जीरो सेशन’ या मोरेटोरियम लागू करने के अधिकार क्षेत्र पर भी विचार करने की बात कही। पीसीआई को जवाब और आवश्यक दस्तावेज दाखिल करने का निर्देश देते हुए, न्यायालय ने मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद निर्धारित की है।

