हयहट्ट देवी सिद्धपीठ में प्रतिमा नहीं,सिंहासन की होती है पूजा:अष्टमी की रात निशा पूजा, 56 प्रकार के व्यंजनों का भोग लगता है; दूर-दूर से पहुंचते हैं भक्त

हयहट्ट देवी सिद्धपीठ में प्रतिमा नहीं,सिंहासन की होती है पूजा:अष्टमी की रात निशा पूजा, 56 प्रकार के व्यंजनों का भोग लगता है; दूर-दूर से पहुंचते हैं भक्त

दरभंगा जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर बेनीपुर अनुमंडल के नवादा गांव में स्थित हयहट्ट भगवती मंदिर मिथिला की आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का अनुपम उदाहरण है। इस सिद्धपीठ की सबसे खास विशेषता यह है कि यहां देवी की प्रतिमा के बजाय उनके सिंहासन की पूजा-अर्चना की जाती है। मान्यता है कि सच्चे मन से मां के दरबार में आने वाला कोई भी भक्त निराश होकर नहीं लौटता। यही वजह है कि शारदीय नवरात्र के दौरान यहां हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में दिनभर भक्ति गीतों और जयकारों की गूंज सुनाई देती है। करीब तीन एकड़ में फैले कैंपस में हयहट्ट देवी के मुख्य मंदिर के अलावा तीन शिव मंदिर, हनुमान मंदिर, राम-जानकी मंदिर और नाग मंदिर भी हैं। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए धर्मशालाएं और आश्रम बने हुए हैं, जहां दूर-दराज से आने वाले भक्त ठहरकर पूजा-अर्चना करते हैं। कमला नदी पार कर पूजा करने आते थे पुजारी हयहट्ट देवी मंदिर के इतिहास को लेकर कई जनश्रुतियां प्रचलित हैं। एक प्रचलित कथा के अनुसार, बहेड़ी प्रखंड के हावीडीह गांव के एक पुजारी भगवती के भक्त थे। वे प्रतिदिन कमला नदी तैरकर देवी की पूजा करने आते थे। उम्र बढ़ने के साथ जब उनके लिए नदी पार करना कठिन हो गया तो उन्होंने मां भगवती से अपने गांव में ही विराजमान होने की प्रार्थना की। जनश्रुति है कि भक्त की पुकार से प्रसन्न होकर भगवती ने उनकी इच्छा स्वीकार कर ली। अगले दिन पुजारी देवी की प्रतिमा लेकर हावीडीह गांव पहुंच गए। खबर फैलते ही दोनों गांवों के लोगों के बीच तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई। इसी दौरान मान्यता के अनुसार, नवादा मंदिर के प्रथम पुजारी घोंघिया निवासी स्वर्गीय दामोदर ठाकुर को भगवती ने स्वप्न दिया। देवी ने बताया कि वह अपनी इच्छा से हावीडीह गई हैं और अब उनके सिंहासन की पूजा से ही भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होंगी। तभी से नवादा में देवी के सिंहासन की पूजा-अर्चना की परंपरा चली आ रही है। दरभंगा महाराज भी प्रतिमा ले जाने में रहे असफल मंदिर से जुड़ी एक अन्य जनश्रुति दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह से संबंधित है। कहा जाता है कि देवी की महिमा से प्रभावित होकर महाराज ने हावीडीह से प्रतिमा अपने यहां ले जाने का निर्णय लिया। इसके लिए ग्रामीणों को दूसरी प्रतिमा देने की बात कही गई। हालांकि, जब दरभंगा राज के कर्मचारी मूल प्रतिमा ले जाने पहुंचे तो वे उसे उखाड़ने में सफल नहीं हुए। इसके बाद दूसरी प्रतिमा भी मंदिर में स्थापित कर दी गई, जो आज भी वहां मौजूद है। एक अन्य मान्यता के अनुसार, हयहट्ट देवी की प्रतिमा सदियों पहले नवादा के घने जंगल में मिली थी। इसके बाद से ही यहां पूजा-अर्चना शुरू हुई। स्थानीय बुजुर्गों के बीच यह जनश्रुति भी प्रचलित है कि विक्रमादित्य के शासनकाल में 212 ईस्वी में ऋषि लक्ष्मणानंद ने स्वाति नक्षत्र की अष्टमी तिथि को मंदिर की स्थापना की थी। अष्टमी की रात निशा पूजा, 56 प्रकार के व्यंजनों का भोग शारदीय नवरात्र में हयहट्ट देवी मंदिर में विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। अष्टमी की रात होने वाली निशा पूजा यहां की प्रमुख धार्मिक परंपराओं में शामिल है। इस अवसर पर देवी के सिंहासन को अरहुल के फूलों से सजाया जाता है और 56 प्रकार के व्यंजनों का भोग अर्पित किया जाता है। नवमी के दिन परंपरागत रूप से छागर की बलि दी जाती है। इस अनुष्ठान से जुड़ी एक विशेष मान्यता भी प्रचलित है। कहा जाता है कि पड़ोसी भगवतपुर गांव के किसी सदस्य की इसमें अनिवार्य भागीदारी होती है। मान्यता के अनुसार, यदि ऐसा नहीं होता है तो देवी के सिंहासन से फूल नहीं गिरते। श्रद्धालु इसे मां की अप्रसन्नता का संकेत मानते हैं। नवरात्र में बहेड़ा-झंझारपुर मार्ग तक दिखता है श्रद्धालुओं का उत्साह नवरात्र के दिनों में भगवती मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटती है। भक्तों के पहुंचने से मंदिर परिसर के साथ बहेड़ा-झंझारपुर मार्ग पर भी आवागमन प्रभावित होता है। दूर-दराज के गांवों से लोग परिवार के साथ मां के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। मंदिर के पुजारी अमरनाथ ठाकुर के अनुसार, हयहट्ट भगवती के प्रति लोगों की गहरी आस्था है। श्रद्धालु यहां अपनी मनोकामनाएं लेकर आते हैं और मां से सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। नवादा का हयहट्ट भगवती सिद्धपीठ केवल पूजा-अर्चना का केंद्र नहीं, बल्कि मिथिला की लोकआस्थाओं, पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान का भी प्रतीक है। सिंहासन पूजा की अनूठी परंपरा और नवरात्र के विशेष अनुष्ठान इसे क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक स्थलों में विशिष्ट स्थान दिलाते हैं। दरभंगा जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर बेनीपुर अनुमंडल के नवादा गांव में स्थित हयहट्ट भगवती मंदिर मिथिला की आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का अनुपम उदाहरण है। इस सिद्धपीठ की सबसे खास विशेषता यह है कि यहां देवी की प्रतिमा के बजाय उनके सिंहासन की पूजा-अर्चना की जाती है। मान्यता है कि सच्चे मन से मां के दरबार में आने वाला कोई भी भक्त निराश होकर नहीं लौटता। यही वजह है कि शारदीय नवरात्र के दौरान यहां हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में दिनभर भक्ति गीतों और जयकारों की गूंज सुनाई देती है। करीब तीन एकड़ में फैले कैंपस में हयहट्ट देवी के मुख्य मंदिर के अलावा तीन शिव मंदिर, हनुमान मंदिर, राम-जानकी मंदिर और नाग मंदिर भी हैं। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए धर्मशालाएं और आश्रम बने हुए हैं, जहां दूर-दराज से आने वाले भक्त ठहरकर पूजा-अर्चना करते हैं। कमला नदी पार कर पूजा करने आते थे पुजारी हयहट्ट देवी मंदिर के इतिहास को लेकर कई जनश्रुतियां प्रचलित हैं। एक प्रचलित कथा के अनुसार, बहेड़ी प्रखंड के हावीडीह गांव के एक पुजारी भगवती के भक्त थे। वे प्रतिदिन कमला नदी तैरकर देवी की पूजा करने आते थे। उम्र बढ़ने के साथ जब उनके लिए नदी पार करना कठिन हो गया तो उन्होंने मां भगवती से अपने गांव में ही विराजमान होने की प्रार्थना की। जनश्रुति है कि भक्त की पुकार से प्रसन्न होकर भगवती ने उनकी इच्छा स्वीकार कर ली। अगले दिन पुजारी देवी की प्रतिमा लेकर हावीडीह गांव पहुंच गए। खबर फैलते ही दोनों गांवों के लोगों के बीच तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई। इसी दौरान मान्यता के अनुसार, नवादा मंदिर के प्रथम पुजारी घोंघिया निवासी स्वर्गीय दामोदर ठाकुर को भगवती ने स्वप्न दिया। देवी ने बताया कि वह अपनी इच्छा से हावीडीह गई हैं और अब उनके सिंहासन की पूजा से ही भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होंगी। तभी से नवादा में देवी के सिंहासन की पूजा-अर्चना की परंपरा चली आ रही है। दरभंगा महाराज भी प्रतिमा ले जाने में रहे असफल मंदिर से जुड़ी एक अन्य जनश्रुति दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह से संबंधित है। कहा जाता है कि देवी की महिमा से प्रभावित होकर महाराज ने हावीडीह से प्रतिमा अपने यहां ले जाने का निर्णय लिया। इसके लिए ग्रामीणों को दूसरी प्रतिमा देने की बात कही गई। हालांकि, जब दरभंगा राज के कर्मचारी मूल प्रतिमा ले जाने पहुंचे तो वे उसे उखाड़ने में सफल नहीं हुए। इसके बाद दूसरी प्रतिमा भी मंदिर में स्थापित कर दी गई, जो आज भी वहां मौजूद है। एक अन्य मान्यता के अनुसार, हयहट्ट देवी की प्रतिमा सदियों पहले नवादा के घने जंगल में मिली थी। इसके बाद से ही यहां पूजा-अर्चना शुरू हुई। स्थानीय बुजुर्गों के बीच यह जनश्रुति भी प्रचलित है कि विक्रमादित्य के शासनकाल में 212 ईस्वी में ऋषि लक्ष्मणानंद ने स्वाति नक्षत्र की अष्टमी तिथि को मंदिर की स्थापना की थी। अष्टमी की रात निशा पूजा, 56 प्रकार के व्यंजनों का भोग शारदीय नवरात्र में हयहट्ट देवी मंदिर में विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। अष्टमी की रात होने वाली निशा पूजा यहां की प्रमुख धार्मिक परंपराओं में शामिल है। इस अवसर पर देवी के सिंहासन को अरहुल के फूलों से सजाया जाता है और 56 प्रकार के व्यंजनों का भोग अर्पित किया जाता है। नवमी के दिन परंपरागत रूप से छागर की बलि दी जाती है। इस अनुष्ठान से जुड़ी एक विशेष मान्यता भी प्रचलित है। कहा जाता है कि पड़ोसी भगवतपुर गांव के किसी सदस्य की इसमें अनिवार्य भागीदारी होती है। मान्यता के अनुसार, यदि ऐसा नहीं होता है तो देवी के सिंहासन से फूल नहीं गिरते। श्रद्धालु इसे मां की अप्रसन्नता का संकेत मानते हैं। नवरात्र में बहेड़ा-झंझारपुर मार्ग तक दिखता है श्रद्धालुओं का उत्साह नवरात्र के दिनों में भगवती मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटती है। भक्तों के पहुंचने से मंदिर परिसर के साथ बहेड़ा-झंझारपुर मार्ग पर भी आवागमन प्रभावित होता है। दूर-दराज के गांवों से लोग परिवार के साथ मां के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। मंदिर के पुजारी अमरनाथ ठाकुर के अनुसार, हयहट्ट भगवती के प्रति लोगों की गहरी आस्था है। श्रद्धालु यहां अपनी मनोकामनाएं लेकर आते हैं और मां से सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। नवादा का हयहट्ट भगवती सिद्धपीठ केवल पूजा-अर्चना का केंद्र नहीं, बल्कि मिथिला की लोकआस्थाओं, पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान का भी प्रतीक है। सिंहासन पूजा की अनूठी परंपरा और नवरात्र के विशेष अनुष्ठान इसे क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक स्थलों में विशिष्ट स्थान दिलाते हैं।  

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