सेंगोल बनाने वाले कारीगर का निधन, 99 साल के थे:परिवार ने 1947 में नेहरू को सौंपा, मोदी ने 2023 में नई संसद में स्थापित किया

सेंगोल बनाने वाले कारीगर का निधन, 99 साल के थे:परिवार ने 1947 में नेहरू को सौंपा, मोदी ने 2023 में नई संसद में स्थापित किया

नए संसद भवन में स्थापित सेंगोल को बनाने वाले ज्वैलर्स थिरु वुम्मिडी एथिराज का बुधवार को निधन हो गया। वे 99 साल के थे। एथिराज ने ऐतिहासिक ‘सेंगोल’ बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। यह सेंगोल 1947 में देश की आजादी के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को सौंपा गया था। आजादी के बाद सेंगोल प्रयागराज के इलाहाबाद म्यूजियम की नेहरू गैलरी में रखा गया था। वहां इसकी पहचान नेहरू को उपहार में मिली सुनहरी छड़ी के रूप में दर्ज थी। पीएम मोदी ने 28 मई 2023 को नए संसद भवन के उद्घाटन के दौरान सेंगोल को लोकसभा अध्यक्ष के आसन के पास स्थापित किया। सेंगोले को बनाने वाले थिरु एथिराज 125 साल पुराने वुम्मिडी बंगारू ज्वैलर्स परिवार के मुखिया थे। उनके परिवार ने साल 1900 में वुम्मिडी बंगारू ज्वेलर्स (VBJ) की शुरुआत की। परिवार की चार से पांच पीढ़ियां इस कारोबार से जुड़ चुकी हैं। आज यह दक्षिण भारत के पुराने ज्वेलरी ब्रांडों में गिना जाता है। 1. सेंगोल बनाने का ऑर्डर किसने दिया था? 1947 में तमिलनाडु के तिरुवावदुथुरै अधीनम मठ ने चेन्नई के वुम्मिडी बंगारू चेट्टी ज्वेलर्स को सेंगोल बनाने का काम सौंपा था। तत्कालीन मठ प्रमुख ने राजदंड का डिजाइन और उसमें इस्तेमाल होने वाले धार्मिक प्रतीकों की जानकारी दी थी। इस काम में वुम्मिडी एथिराज और वुम्मिडी सुधाकर की महत्वपूर्ण भूमिका थी। उस समय एथिराज की उम्र करीब 22 साल थी। सरकारी विवरण के मुताबिक, लगभग 10 कारीगरों ने 10 से 15 दिनों में सेंगोल तैयार किया था। यह करीब 5 फीट लंबा था और सोने की परत चढ़ी चांदी से बनाया गया था। सेंगोल के ऊपर नंदी की आकृति बनाई गई, जिसे न्याय और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है। इसमें देवी लक्ष्मी और अनाज की बालियों जैसे प्रतीक भी उकेरे गए थे। 2. 1947 में सेंगोल नेहरू तक कैसे पहुंचा? सरकार के 2023 के विवरण के अनुसार, आजादी के समय सी. राजगोपालाचारी की पहल पर तमिल मठ से सेंगोल तैयार करवाया गया था। मठ के प्रतिनिधि इसे लेकर दिल्ली पहुंचे। 14 अगस्त 1947 की रात जवाहरलाल नेहरू के आवास पर एक धार्मिक समारोह हुआ। तमिलनाडु से आए संतों ने नेहरू को पवित्र जल से आशीर्वाद दिया और सेंगोल सौंपा। इस समारोह का उल्लेख 25 अगस्त 1947 की टाइम्स पत्रिका और फ्रीडम एट मिडनाइट बुक में भी मिलता है। हालांकि, माउंटबेटन द्वारा सेंगोल सौंपने और वापस लेने की कहानी तथा इसे सत्ता हस्तांतरण का आधिकारिक प्रतीक बनाने के दावे का पुख्ता सबूत नहीं है। 3. आजादी के बाद सेंगोल कहां रखा गया और दोबारा कैसे मिला? आजादी के बाद सेंगोल प्रयागराज के इलाहाबाद म्यूजियम की नेहरू गैलरी में रखा गया था। वहां इसकी पहचान नेहरू को उपहार में मिली सुनहरी छड़ी के रूप में दर्ज थी। 2018 में एक तमिल पत्रिका में सेंगोल के बारे में लेख प्रकाशित हुआ। इसे पढ़कर वुम्मिडी परिवार की नई पीढ़ी को पता चला कि उनके पूर्वजों ने इस ऐतिहासिक राजदंड को बनाया था। परिवार ने खोज शुरू की। 2019 के आसपास उन्हें पता चला कि इससे मिलता-जुलता राजदंड इलाहाबाद म्यूजियम में है। परिवार के प्रतिनिधि अरुण कुमार ने म्यूजियम जाकर इसकी जांच की। राजदंड पर तमिल अक्षर और नंदी की आकृति देखकर परिवार ने इसकी पहचान की पुष्टि की। एथिराज को भी नंदी का डिजाइन देखकर इसकी कारीगरी से जुड़ी कुछ पुरानी बातें याद आईं। उनके बेटे के मुताबिक, नंदी का सही आकार तय करने के लिए कारीगरों को कुंभकोणम तक जाना पड़ा था। 4. 2023 में नए संसद भवन में क्यों स्थापित हुआ? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 28 मई 2023 को नए संसद भवन के उद्घाटन के दौरान सेंगोल को लोकसभा अध्यक्ष के आसन के पास स्थापित किया। केंद्र सरकार ने इसे भारत की स्वतंत्रता, न्यायपूर्ण शासन और भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़े प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया। इस दौरान सेंगोल बनाने वाले वुम्मिडी परिवार के सदस्यों को भी सम्मानित किया गया। एथिराज भी 2023 के समारोह में शामिल हुए थे। प्रधानमंत्री मोदी ने उनसे मुलाकात कर उनके योगदान के लिए आभार व्यक्त किया था।

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