सहरसा के पंचवटी चौक पर मां दुर्गा की पूजा और मेले का आयोजन बिना घर-घर चंदा मांगे होता है। यहां लोग स्वेच्छा से सहयोग राशि देते हैं, जिससे 10 दिनों तक चलने वाला यह भव्य मेला संभव हो पाता है। संस्थापक रमेश चंद्र यादव ने बताया कि वर्ष 1981 में कमल नारायण झा, महानारायण लाल दास, प्रकाश चंद्र सहाय, प्रोफेसर सुशील झा, प्रमोद झा, दूरबिल मिश्र और अन्य समाजसेवियों ने इसकी शुरुआत की। महिलाओं को पूजा के लिए दूर न जाना पड़े, इसलिए पंचवटी चौक पर मूर्ति स्थापित कर मेला लगाने का फैसला हुआ। खुद आकर सहयोग राशि देते हैं लोग पिछले 5 सालों से कमेटी ने घर-घर चंदा मांगना बंद कर दिया है, लोग खुद आकर सहयोग राशि देते हैं। सुपौल के मूर्तिकार श्रीलाल 60,000 रुपये में प्रतिमा बनाते हैं, जबकि टेंट और सजावट पर लगभग 2 लाख रुपये खर्च होते हैं। यह सहरसा शहर का एकमात्र पूजा स्थल है, जहां छागर (बकरा) बलि देने की परंपरा है। सहरसा के पंचवटी चौक पर मां दुर्गा की पूजा और मेले का आयोजन बिना घर-घर चंदा मांगे होता है। यहां लोग स्वेच्छा से सहयोग राशि देते हैं, जिससे 10 दिनों तक चलने वाला यह भव्य मेला संभव हो पाता है। संस्थापक रमेश चंद्र यादव ने बताया कि वर्ष 1981 में कमल नारायण झा, महानारायण लाल दास, प्रकाश चंद्र सहाय, प्रोफेसर सुशील झा, प्रमोद झा, दूरबिल मिश्र और अन्य समाजसेवियों ने इसकी शुरुआत की। महिलाओं को पूजा के लिए दूर न जाना पड़े, इसलिए पंचवटी चौक पर मूर्ति स्थापित कर मेला लगाने का फैसला हुआ। खुद आकर सहयोग राशि देते हैं लोग पिछले 5 सालों से कमेटी ने घर-घर चंदा मांगना बंद कर दिया है, लोग खुद आकर सहयोग राशि देते हैं। सुपौल के मूर्तिकार श्रीलाल 60,000 रुपये में प्रतिमा बनाते हैं, जबकि टेंट और सजावट पर लगभग 2 लाख रुपये खर्च होते हैं। यह सहरसा शहर का एकमात्र पूजा स्थल है, जहां छागर (बकरा) बलि देने की परंपरा है।

