समस्तीपुर के पतैली दुर्गा स्थान में मां दुर्गा की विदाई का दृश्य हर साल कुछ अलग होता है। यहां माता की प्रतिमा को वाहन पर रखकर विसर्जन के लिए नहीं ले जाया जाता, बल्कि श्रद्धालु उसे अपने कंधों पर उठाकर नाचते-गाते हुए नदी तट तक पहुंचाते हैं। 200 साल से अधिक पुरानी यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जा रही है। गुरुवार को मंदिर परिसर में मां दुर्गा की विदाई की तैयारी शुरू हुई। पूजा-अर्चना और आरती के बाद श्रद्धालुओं ने माता के दर्शन किए। इसके बाद मां के जयकारों से पूरा परिसर गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने नम आंखों से माता को प्रणाम किया और अगले वर्ष फिर आने की प्रार्थना करते हुए प्रतिमा को अपने कंधों पर उठा लिया। कंधों पर प्रतिमा… कदमताल करते आगे बढ़े श्रद्धालु प्रतिमा के मंदिर से बाहर निकलते ही विदाई यात्रा का सबसे खास हिस्सा शुरू हुआ। श्रद्धालु माता की प्रतिमा को कंधों पर उठाकर नाचते-गाते हुए आगे बढ़ने लगे। कोई ‘जय माता दी’ के जयकारे लगा रहा था तो कोई भक्ति गीतों पर झूम रहा था। मंदिर के बाहर खाली स्थान पर प्रतिमा को विशेष अंदाज में नचाया गया। प्रतिमा को कंधे पर उठाए श्रद्धालु एक साथ कदमताल करते रहे। इस दौरान आसपास मौजूद लोग इस अनूठे दृश्य को देखने के लिए सड़क किनारे जुटे रहे। पुजारी बैजू साह बताते हैं कि प्रतिमा को कंधे पर उठाकर नचाते हुए नदी तट तक ले जाना ही पतैली दुर्गा स्थान की सबसे बड़ी विशेषता है। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी श्रद्धालु इसे पूरी आस्था के साथ निभाते हैं। 1 किलोमीटर का रास्ता तय करने में लग जाता है डेढ़ घंटे से ज्यादा समय मंदिर से जमुआरी नदी का तट करीब एक किलोमीटर दूर है। सामान्य तौर पर यह दूरी कुछ ही मिनटों में पूरी की जा सकती है, लेकिन माता की प्रतिमा को नचाते और जयकारे लगाते हुए श्रद्धालु धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं। यही वजह है कि करीब एक किलोमीटर की दूरी तय करने में डेढ़ घंटे से अधिक समय लग जाता है। पूरे रास्ते श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। लोग माता की प्रतिमा के दर्शन करने के लिए सड़क के दोनों ओर खड़े रहते हैं। जैसे-जैसे जुलूस आगे बढ़ता है, लोगों की भीड़ भी बढ़ती जाती है। युवाओं से बुजुर्गों तक दिखा उत्साह विदाई यात्रा में गांव के युवाओं से लेकर बुजुर्ग तक शामिल हुए। माता की प्रतिमा को कंधा देना और विसर्जन यात्रा में शामिल होना श्रद्धालु अपने लिए सौभाग्य मानते हैं। प्रतिमा को संभालते हुए आगे बढ़ने के लिए श्रद्धालुओं के बीच आपसी तालमेल भी देखने को मिला। यह यात्रा सिर्फ प्रतिमा विसर्जन की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि पतैली गांव की धार्मिक आस्था और वर्षों पुरानी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। मां की विदाई के दौरान जहां श्रद्धालुओं में उत्साह था, वहीं प्रतिमा विसर्जन के समय माहौल भावुक भी हो गया। जमुआरी नदी में किया गया विसर्जन करीब डेढ़ घंटे की यात्रा के बाद श्रद्धालु मां दुर्गा की प्रतिमा को लेकर जमुआरी नदी के तट पर पहुंचे। यहां विधि-विधान के साथ माता की प्रतिमा का विसर्जन किया गया। माता को विदाई देते समय श्रद्धालुओं ने अगले वर्ष फिर से मां के आगमन की कामना की और जयकारों के साथ विसर्जन की प्रक्रिया पूरी की। समस्तीपुर के पतैली दुर्गा स्थान में मां दुर्गा की विदाई का दृश्य हर साल कुछ अलग होता है। यहां माता की प्रतिमा को वाहन पर रखकर विसर्जन के लिए नहीं ले जाया जाता, बल्कि श्रद्धालु उसे अपने कंधों पर उठाकर नाचते-गाते हुए नदी तट तक पहुंचाते हैं। 200 साल से अधिक पुरानी यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जा रही है। गुरुवार को मंदिर परिसर में मां दुर्गा की विदाई की तैयारी शुरू हुई। पूजा-अर्चना और आरती के बाद श्रद्धालुओं ने माता के दर्शन किए। इसके बाद मां के जयकारों से पूरा परिसर गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने नम आंखों से माता को प्रणाम किया और अगले वर्ष फिर आने की प्रार्थना करते हुए प्रतिमा को अपने कंधों पर उठा लिया। कंधों पर प्रतिमा… कदमताल करते आगे बढ़े श्रद्धालु प्रतिमा के मंदिर से बाहर निकलते ही विदाई यात्रा का सबसे खास हिस्सा शुरू हुआ। श्रद्धालु माता की प्रतिमा को कंधों पर उठाकर नाचते-गाते हुए आगे बढ़ने लगे। कोई ‘जय माता दी’ के जयकारे लगा रहा था तो कोई भक्ति गीतों पर झूम रहा था। मंदिर के बाहर खाली स्थान पर प्रतिमा को विशेष अंदाज में नचाया गया। प्रतिमा को कंधे पर उठाए श्रद्धालु एक साथ कदमताल करते रहे। इस दौरान आसपास मौजूद लोग इस अनूठे दृश्य को देखने के लिए सड़क किनारे जुटे रहे। पुजारी बैजू साह बताते हैं कि प्रतिमा को कंधे पर उठाकर नचाते हुए नदी तट तक ले जाना ही पतैली दुर्गा स्थान की सबसे बड़ी विशेषता है। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी श्रद्धालु इसे पूरी आस्था के साथ निभाते हैं। 1 किलोमीटर का रास्ता तय करने में लग जाता है डेढ़ घंटे से ज्यादा समय मंदिर से जमुआरी नदी का तट करीब एक किलोमीटर दूर है। सामान्य तौर पर यह दूरी कुछ ही मिनटों में पूरी की जा सकती है, लेकिन माता की प्रतिमा को नचाते और जयकारे लगाते हुए श्रद्धालु धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं। यही वजह है कि करीब एक किलोमीटर की दूरी तय करने में डेढ़ घंटे से अधिक समय लग जाता है। पूरे रास्ते श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। लोग माता की प्रतिमा के दर्शन करने के लिए सड़क के दोनों ओर खड़े रहते हैं। जैसे-जैसे जुलूस आगे बढ़ता है, लोगों की भीड़ भी बढ़ती जाती है। युवाओं से बुजुर्गों तक दिखा उत्साह विदाई यात्रा में गांव के युवाओं से लेकर बुजुर्ग तक शामिल हुए। माता की प्रतिमा को कंधा देना और विसर्जन यात्रा में शामिल होना श्रद्धालु अपने लिए सौभाग्य मानते हैं। प्रतिमा को संभालते हुए आगे बढ़ने के लिए श्रद्धालुओं के बीच आपसी तालमेल भी देखने को मिला। यह यात्रा सिर्फ प्रतिमा विसर्जन की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि पतैली गांव की धार्मिक आस्था और वर्षों पुरानी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। मां की विदाई के दौरान जहां श्रद्धालुओं में उत्साह था, वहीं प्रतिमा विसर्जन के समय माहौल भावुक भी हो गया। जमुआरी नदी में किया गया विसर्जन करीब डेढ़ घंटे की यात्रा के बाद श्रद्धालु मां दुर्गा की प्रतिमा को लेकर जमुआरी नदी के तट पर पहुंचे। यहां विधि-विधान के साथ माता की प्रतिमा का विसर्जन किया गया। माता को विदाई देते समय श्रद्धालुओं ने अगले वर्ष फिर से मां के आगमन की कामना की और जयकारों के साथ विसर्जन की प्रक्रिया पूरी की।

