विजयादशमी पर मां दुर्गा की विदाई के दौरान शहर के विभिन्न विसर्जन घाटों पर श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। प्रतिमाओं के विसर्जन के बाद धीरे-धीरे घाटों पर भीड़ कम होने लगी और उत्सव का माहौल शांत हो गया। इसी बीच घाटों पर एक ऐसी तस्वीर सामने आई, जिसने लोगों को भावुक कर दिया। विसर्जन के बाद कुछ जरूरतमंद लोग प्रतिमाओं में बचे अपने काम की चीजें तलाशते नजर आए। बांस और बल्लियों को ले जा रहे कोई मलबे से उपयोगी सामग्री चुन रहा था, तो कोई प्रतिमा निर्माण में इस्तेमाल किए गए बांस और बल्लियों को सावधानी से निकालकर किनारे जमा कर रहा था। इन लोगों के लिए विसर्जन के बाद बची सामग्री महज कचरा नहीं, बल्कि रोजी-रोटी और जरूरत का साधन है। बांस-बल्लियां समेट रहे लोगों ने बताया कि बरसात के दौरान उनकी झोपड़ियों को काफी नुकसान पहुंचा था। घर की मरम्मत के लिए नए बांस खरीदने की आर्थिक स्थिति नहीं है। ऐसे में दुर्गा प्रतिमाओं के निर्माण में इस्तेमाल बांस और बल्लियां उनके टूटे आशियाने को फिर से खड़ा करने में मदद करेंगी। कल तक जिन बांसों के सहारे मां दुर्गा की भव्य प्रतिमाएं खड़ी थीं, आज वही किसी गरीब परिवार की छत और दीवारों को सहारा देंगे। जिला प्रशासन और नगर निकाय की ओर से विसर्जन के बाद घाटों की सफाई की व्यवस्था की गई है। हालांकि सफाई शुरू होने से पहले ही जरूरतमंद लोग अपनी जरूरत की सामग्री जुटाने में लगे दिखाई दिए। उत्सव के बाद संघर्ष की कहानी
जमशेदपुर के घाटों पर दिखाई दिया यह दृश्य बताता है कि किसी के लिए अनुपयोगी हो चुकी वस्तु, दूसरे के लिए कितनी कीमती हो सकती है। मां दुर्गा की विदाई के बाद शांत हुए घाटों पर बिखरे बांस-बल्लियों में किसी गरीब परिवार को अपने टूटे घर की छत दिखाई दे रही थी। विजयादशमी पर मां दुर्गा की विदाई के दौरान शहर के विभिन्न विसर्जन घाटों पर श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। प्रतिमाओं के विसर्जन के बाद धीरे-धीरे घाटों पर भीड़ कम होने लगी और उत्सव का माहौल शांत हो गया। इसी बीच घाटों पर एक ऐसी तस्वीर सामने आई, जिसने लोगों को भावुक कर दिया। विसर्जन के बाद कुछ जरूरतमंद लोग प्रतिमाओं में बचे अपने काम की चीजें तलाशते नजर आए। बांस और बल्लियों को ले जा रहे कोई मलबे से उपयोगी सामग्री चुन रहा था, तो कोई प्रतिमा निर्माण में इस्तेमाल किए गए बांस और बल्लियों को सावधानी से निकालकर किनारे जमा कर रहा था। इन लोगों के लिए विसर्जन के बाद बची सामग्री महज कचरा नहीं, बल्कि रोजी-रोटी और जरूरत का साधन है। बांस-बल्लियां समेट रहे लोगों ने बताया कि बरसात के दौरान उनकी झोपड़ियों को काफी नुकसान पहुंचा था। घर की मरम्मत के लिए नए बांस खरीदने की आर्थिक स्थिति नहीं है। ऐसे में दुर्गा प्रतिमाओं के निर्माण में इस्तेमाल बांस और बल्लियां उनके टूटे आशियाने को फिर से खड़ा करने में मदद करेंगी। कल तक जिन बांसों के सहारे मां दुर्गा की भव्य प्रतिमाएं खड़ी थीं, आज वही किसी गरीब परिवार की छत और दीवारों को सहारा देंगे। जिला प्रशासन और नगर निकाय की ओर से विसर्जन के बाद घाटों की सफाई की व्यवस्था की गई है। हालांकि सफाई शुरू होने से पहले ही जरूरतमंद लोग अपनी जरूरत की सामग्री जुटाने में लगे दिखाई दिए। उत्सव के बाद संघर्ष की कहानी
जमशेदपुर के घाटों पर दिखाई दिया यह दृश्य बताता है कि किसी के लिए अनुपयोगी हो चुकी वस्तु, दूसरे के लिए कितनी कीमती हो सकती है। मां दुर्गा की विदाई के बाद शांत हुए घाटों पर बिखरे बांस-बल्लियों में किसी गरीब परिवार को अपने टूटे घर की छत दिखाई दे रही थी।

