श्रावणी उपाकर्म में बटुकों और संतों ने किया प्रायश्चित:प्रयागराज में बटुकों-संतों ने किया ऋषि तर्पण, गंगा स्नान के बाद धारण किया नया यज्ञोपवीत

श्रावणी उपाकर्म में बटुकों और संतों ने किया प्रायश्चित:प्रयागराज में बटुकों-संतों ने किया ऋषि तर्पण, गंगा स्नान के बाद धारण किया नया यज्ञोपवीत

तीर्थराज प्रयागराज के अरैल स्थित सच्चा बाबा घाट पर शुक्रवार को श्रावणी उपाकर्म संस्कार का आयोजन किया गया। इस दौरान बड़ी संख्या में बटुक ब्रह्मचारी, संत-महात्मा और आचार्य शामिल हुए। उन्होंने सनातन वैदिक परंपरा के अनुसार विभिन्न अनुष्ठान संपन्न किए। संत संघ श्री सच्चा बाबा आश्रम के महंत एवं संरक्षक स्वामी डॉ. चन्द्रदेव महाराज की अध्यक्षता में हुए इस आयोजन में गंगा तट पर बटुकों और संतों ने सामूहिक रूप से गंगा स्नान किया। इसके बाद हेमाद्रि संकल्प, भस्म-मृत्तिका मार्जन, पंचगव्य प्राशन और ऋषि तर्पण सहित कई वैदिक अनुष्ठान किए गए। पूजन और हवन के दौरान जाने-अनजाने में हुई भूलों के लिए प्रायश्चित किया गया। विधि-विधान से पुराने यज्ञोपवीत का त्याग कर सभी ने नवीन यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण किया। वैदिक मंत्रोच्चार से सच्चा बाबा घाट का वातावरण भक्तिमय हो उठा। श्रावणी उपाकर्म को सनातन धर्म में आत्मशुद्धि, प्रायश्चित और ज्ञान के प्रति पुनः संकल्प लेने का पर्व माना जाता है। स्वामी चन्द्रदेव महाराज ने बताया कि ‘उपाकर्म’ का अर्थ नई शुरुआत करना है। इस दिन वेदाध्ययन के नए सत्र का शुभारंभ करने की परंपरा है। उन्होंने यह भी बताया कि यज्ञोपवीत बदलना केवल बाहरी धार्मिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के लिए अपने आचार-विचार को शुद्ध करने और धार्मिक अनुशासन को दोहराने का प्रतीक है। जगद्गुरु नारायणाचार्य ने कहा कि इस पर्व में ऋषियों, देवताओं और पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। ऋषि तर्पण के माध्यम से ज्ञान और वैदिक परंपरा को आगे बढ़ाने वाले ऋषियों का स्मरण किया जाता है। साथ ही वेदों के अध्ययन, सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया जाता है। उन्होंने बताया कि श्रावणी उपाकर्म का एक महत्वपूर्ण पक्ष प्रायश्चित और आत्मशुद्धि है। विशेष स्नान और वैदिक कर्मकांड के माध्यम से व्यक्ति अपने जाने-अनजाने दोषों के लिए प्रायश्चित करता है। दक्षिण भारत में इसी परंपरा को ‘अवनी अवित्तम’ के नाम से जाना जाता है। इस कार्यक्रम में आश्रम अध्यक्ष स्वामी दिव्यानंद महाराज, डॉ. शत्रुघ्न ब्रह्मचारी, प्रवेश ब्रह्मचारी, संत सौरभ और आचार्य गंगाधर सहित कई अन्य संत मौजूद रहे। मुख्य वैदिक कर्मकांड आचार्य श्यामसुंदर ने संपन्न कराया।

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