शोले के ‘वीरू’ से भी आगे प्रयागराज:कूद जाऊंगा, फांद जाऊंगा… टंकी-टाॅवर 9 महीने में 16 बार बने विरोध का मंच, अब पहली FIR

शोले के ‘वीरू’ से भी आगे प्रयागराज:कूद जाऊंगा, फांद जाऊंगा… टंकी-टाॅवर 9 महीने में 16 बार बने विरोध का मंच, अब पहली FIR

प्रयागराज में अपनी बात मनवाने का नया तरीका मानो टंकी और टॉवर पर चढ़ना बन गया है। ‘कूद जाऊंगा’, ‘फांद जाऊंगा’… जैसी धमकियों के साथ पिछले करीब 10 महीने में 16 प्रमुख घटनाएं सामने आईं। कभी प्रेमिका से शादी की जिद, कभी जमीन का विवाद, कभी पुलिस से कार्रवाई की मांग तो कभी नौकरी में निलंबन का विरोध। मुद्दा कोई भी हो, तरीका एक रहा। ऊंचाई पर चढ़ो, नीचे भीड़ जुटाओ और पुलिस-प्रशासन को मौके पर बुलाकर अपनी मांग मनवाने का दबाव बनाओ। ज्यादातर मामलों में पुलिस ने घंटों समझाकर लोगों को सुरक्षित नीचे उतारा। लेकिन अब इस सिलसिले पर सख्ती शुरू हो गई है। शुक्रवार को पानी की टंकी पर चढ़कर 17 घंटे तक हंगामा करने वाली महिला और उसके समर्थकों के खिलाफ शनिवार को पहली बार FIR दर्ज की गई। शोले के वीरू वाला सीन, लेकिन यहां फिल्म नहीं हकीकत
फिल्म ‘शोले’ में वीरू पानी की टंकी पर चढ़कर बसंती से शादी की जिद करता है। प्रयागराज में पिछले महीनों के दौरान कई घटनाओं में कुछ ऐसा ही दृश्य हकीकत में दिखाई दिया। फर्क सिर्फ इतना रहा कि यहां नीचे पुलिस, फायर ब्रिगेड और प्रशासनिक अफसर खड़े रहे और ऊपर चढ़े लोगों को सुरक्षित उतारने के लिए घंटों मान-मनौव्वल करनी पड़ी। पहले ऐसे मामले इक्का-दुक्का दिखाई देते थे, लेकिन 2026 में घटनाओं का सिलसिला बढ़ता गया। इस साल जनवरी से एक अक्टूबर तक प्रयागराज में 16 ऐसी घटनाएं सामने आईं। प्रेम से लेकर जमीन और नौकरी तक…मुद्दे अलग, तरीका एक इन घटनाओं को देखें तो कोई एक वजह सामने नहीं आती। जनवरी में प्रेम और शादी का मामला था। 30 अप्रैल को बिजली विभाग के निलंबित जेई ने बहाली की मांग को लेकर टॉवर पर चढ़ने का रास्ता चुना। फाफामऊ में महिला ने FIR दर्ज कराने की मांग की। नवाबगंज में जमीन विवाद था। जून में शादी और पति की दूसरी शादी का विवाद सामने आया। जुलाई में किशोरी को छुड़ाने, प्रेमिका से शादी और फिर एक बुजुर्ग के टंकी पर चढ़ने का मामला आया। अगस्त में जमीन, पुलिस और फसल मुआवजे से जुड़े मामले सामने आए। सितंबर में गिरफ्तारी और शादी की मांग को लेकर टॉवर पर चढ़ने की घटनाएं हुईं। यानी मुद्दा बदलता रहा, लेकिन विरोध का तरीका नहीं बदला। कई घंटे तक पूरा अमला रहता है तैनात ऐसी घटनाओं में पुलिस के सामने सबसे पहले व्यक्ति की जान बचाने की चुनौती होती है। इसके बाद भीड़ को नियंत्रित करना, फायर ब्रिगेड या एसडीआरएफ को बुलाना और यातायात सामान्य रखना पड़ता है। फाफामऊ में पानी की टंकी पर चढ़ी महिला के मामले में करीब आठ घंटे तक पुलिस को मशक्कत करनी पड़ी। उसकी मांग पर FIR दर्ज होने के बाद वह नीचे उतरी। मऊआइमा में जुलाई में एक किशोर करीब सात घंटे तक टॉवर पर रहा। पुलिस और फायर ब्रिगेड की टीम ने बारिश के बीच उसे नीचे उतारा। सोरांव में 29 जुलाई को युवक करीब 12 घंटे तक मोबाइल टॉवर पर रहा। वह जेल में बंद भाई की रिहाई, मुकदमे खत्म करने और तालाब से कब्जा हटाने की मांग कर रहा था। सितंबर में भी गदाईपुर फ्लाईओवर पर युवक करीब आठ घंटे टॉवर पर रहा। वह दर्ज मुकदमे के आरोपियों की गिरफ्तारी चाहता था। मनोवैज्ञानिक बोले, धमकी कई बार दबाव बनाने का हथियार
मनोवैज्ञानिक ऐसी घटनाओं को सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारकों से जोड़ते हैं। उनके मुताबिक बढ़ती अधीरता, संवाद की कमी और भावनात्मक दबाव से निपटने की कमजोर क्षमता व्यक्ति को अपनी बात मनवाने के लिए चरम तरीका अपनाने की ओर ले जा सकती है। हालांकि कई मामलों में धमकी का उद्देश्य आत्महत्या करना नहीं, बल्कि ध्यान खींचना और दबाव बनाना होता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि टंकी या टॉवर पर चढ़ने वाले हर व्यक्ति की मंशा एक जैसी होती है। पुलिस के लिए हर मामले में वास्तविक खतरे को गंभीरता से लेना जरूरी है, क्योंकि ऊंचाई से गिरने या बिजली के टॉवर पर करंट की चपेट में आने का जोखिम वास्तविक है। समाजशास्त्रीय नजरिया: असामान्य तरीका तुरंत ध्यान खींचता है समाजशास्त्री विवेक तिवारी कहते हैं, इन घटनाओं का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सामान्य शिकायत प्रक्रिया के मुकाबले टंकी या टॉवर पर चढ़ते ही पूरा प्रशासन सक्रिय हो जाता है। मौके पर पुलिस, फायर ब्रिगेड, अधिकारी, परिवार और बड़ी संख्या में लोग जुट जाते हैं। कई बार यातायात तक रुक जाता है। यही तत्काल सार्वजनिक ध्यान ऐसे विरोध को अलग तरह की दृश्यता देता है। किसी टॉवर पर चढ़ने की घटना का वीडियो तेजी से फैलने से उस तरीके की जानकारी दूसरे लोगों तक पहुंचती है। इस लिहाज से यह सिर्फ व्यक्तिगत विवाद नहीं रह जाता। एक व्यक्ति का कदम कुछ ही देर में पुलिस, प्रशासन, यातायात और सार्वजनिक सुरक्षा का मामला बन जाता है। 16 घटनाओं के बाद पुलिस का रुख बदला अब तक ज्यादातर मामलों में पुलिस का फोकस व्यक्ति को सुरक्षित नीचे उतारने और तत्काल विवाद को शांत कराने पर रहा। लेकिन 2 अक्टूबर की घटना के बाद तस्वीर बदलती दिखी। भगवतपुर निवासी पूनम दुबे करीब 100 फीट ऊंची पानी की टंकी पर चढ़ गईं। उनका विवाद मंदिर की जमीन और फोरलेन निर्माण से जुड़े मुद्दे को लेकर था। उन्होंने नीचे आने से इनकार किया और कूदकर जान देने की धमकी दी। पुलिस और प्रशासन की टीमों ने घंटों मान-मनौव्वल की। वह करीब 17 घंटे तक टंकी पर रहीं। इस दौरान समर्थक भी जुटे और सड़क पर जाम की स्थिति बनी। पुलिस के मुताबिक एंबुलेंस समेत कई वाहन प्रभावित हुए। पहली बार पानी की टंकी वाले मामले में FIR शनिवार को सिविल लाइंस पुलिस ने पूनम दुबे, उनके तीन बेटों और करीब 50 अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। चौकी प्रभारी की तहरीर पर हुई इस कार्रवाई में सड़क जाम करने, आवागमन बाधित करने और माहौल खराब करने के आरोप शामिल हैं। पुलिस के अनुसार प्रयागराज में टंकी या टॉवर पर चढ़कर इस तरह विरोध करने के मामले में यह पहली ऐसी FIR है। यानी अब तक जहां ऐसे मामलों का अंत समझाइश और सुरक्षित रेस्क्यू से होता था, वहां पुलिस ने पहली बार यह संदेश दिया है कि अगर टंकी-टॉवर पर चढ़ने के साथ सार्वजनिक व्यवस्था बाधित हुई तो कानूनी कार्रवाई भी होगी। जानबूझकर शांति व्यवस्था बिगाड़ने वालों से सख्ती डीसीपी सिटी सागर जैन ने पहले ही ऐसे मामलों में सख्त रुख के संकेत दिए थे। उन्होंने कहा था कि टॉवर या पानी की टंकी पर चढ़ने से शांति व्यवस्था में खलल पड़ता है और पुलिस व फायर सर्विस को लंबे समय तक मौके पर लगाना पड़ता है। पुलिस का कहना है कि वास्तविक संकट में फंसे व्यक्ति को पहले सुरक्षित नीचे उतारना प्राथमिकता रहेगी, लेकिन जानबूझकर शांति व्यवस्था में व्यवधान उत्पन्न करने वालों से सख्ती से निपटा जाएगा।

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