मध्यप्रदेश सरकार ने 13 अक्टूबर की देर रात 23 IAS अधिकारियों की तबादला सूची जारी की। इसमें तीन ऐसे अफसरों को फिर से मैदानी जिम्मेदारी दी गई है, जिन्हें गंभीर हादसों, लापरवाही या भ्रष्टाचार संबंधी शिकायतों के बाद पदों से हटाया गया था। इनकी नई पोस्टिंग के बाद सवाल उठ रहे हैं कि क्या इनके खिलाफ जांच पूरी हो चुकी है या विभागीय कार्रवाई के बिना ही इन्हें दोबारा महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंप दी गई? दैनिक भास्कर ने इन तीनों अफसरों के पुराने मामलों और जांच की मौजूदा स्थिति की पड़ताल की। पढ़िए उन तीन IAS अफसरों की रिपोर्ट, जिनकी नई पोस्टिंग ने प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में सवाल खड़े किए हैं। 1. रोहित सिसोनिया (2017 बैच): 72 दिन अटकी रही टेंडर फाइल, अब रायसेन के कलेक्टर इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पेयजल से हुई मौतों के बाद प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठे थे। हाईकोर्ट के निर्देश पर गठित एक सदस्यीय न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट 30 सितंबर 2026 को सार्वजनिक हुई। रिपोर्ट के मुताबिक, त्रासदी के पीछे प्रशासनिक चूक और रखरखाव में गंभीर कमियां थीं। जांच में क्या मिला? इंदौर नगर निगम के तत्कालीन अपर आयुक्त रोहित सिसोनिया के पास पाइपलाइन बदलने के टेंडर पर मंजूरी संबंधी अधिकार थे। उन्होंने 15 अक्टूबर 2025 को संबंधित इंजीनियर को चर्चा के लिए लिखा, लेकिन फाइल पर 26 दिसंबर को चर्चा हो सकी। यानी प्रक्रिया में 72 दिन लगे। आयोग ने इसे सिसोनिया की निगरानी में गंभीर लापरवाही माना। अब तक क्या कार्रवाई हुई? 2 जनवरी 2026 को सिसोनिया को इंदौर नगर निगम से हटाकर मंत्रालय में कृषि विभाग का उप सचिव बनाया गया था। न्यायिक आयोग की प्रतिकूल टिप्पणियों के बावजूद, उनके खिलाफ अब तक विभागीय जांच शुरू नहीं हुई है। इसके बाद 13 अक्टूबर के तबादला आदेश में उन्हें रायसेन का कलेक्टर नियुक्त किया गया। 2. दिनेश मौर्य (2012 बैच): बच्चों की मौत के बाद ड्रग कंट्रोलर पद से हटे, अब अपर आयुक्त सितंबर 2025 में छिंदवाड़ा के परासिया में ‘कोल्ड्रिफ’ कफ सिरप में डायएथिलीन ग्लाइकोल नाम का हानिकारक रसायन मिलने के बाद 11 बच्चों की मौत हुई थी। इस घटना के बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के निर्देश पर 6 अक्टूबर 2025 को तत्कालीन ड्रग कंट्रोलर दिनेश मौर्य को पद से हटा दिया गया था। जवाबदेही तय करने के लिए क्या कार्रवाई हुई? ड्रग इंस्पेक्टरों और उप संचालकों को निलंबित किया गया। वहीं, दिनेश मौर्य को मंत्रालय में सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) का अपर सचिव बनाया गया। नई पोस्टिंग और जवाबदेही की स्थिति मंत्रालय में कुछ महीने रहने के बाद 11 सितंबर 2026 के आदेश से दिनेश मौर्य को अपर आयुक्त (राजस्व), जबलपुर संभाग नियुक्त किया गया। 11 बच्चों की मौत के मामले में उनकी व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय नहीं हो सकी। 3. आदित्य सिंह (2014 बैच): जमीन नामांतरण में 3 करोड़ की रिश्वत की शिकायत, अब बालाघाट के कलेक्टर 15 अप्रैल 2025 को अशोकनगर कलेक्टर बने आदित्य सिंह के कार्यकाल में आनंदपुर धाम ट्रस्ट की जमीन के नामांतरण को लेकर विवाद हुआ था। इस मामले में नामांतरण के बदले कथित तौर पर 3 करोड़ रुपए रिश्वत मांगने की शिकायत राज्य सरकार और प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंची थी। शिकायत के बाद क्या कार्रवाई हुई? शिकायत के बाद 21 जनवरी 2026 को आदित्य सिंह को अशोकनगर कलेक्टर पद से हटाया गया। इसके बाद उन्हें भोपाल स्थित गैस त्रासदी राहत एवं पुनर्वास विभाग में उप सचिव/संचालक बनाया गया। अब तक मामले की क्या स्थिति है? आदित्य सिंह ने आरोपों की जानकारी से इनकार किया था। शिकायत पर आगे की कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट नहीं है। 13 अक्टूबर के तबादला आदेश में उन्हें बालाघाट का कलेक्टर नियुक्त किया गया। विपक्ष का आरोप: पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदनहीनता तीनों अफसरों की नई पोस्टिंग पर विपक्ष ने सवाल उठाए हैं। इंदौर शहर कांग्रेस अध्यक्ष चिंटू चौकसे ने कहा, जिस अधिकारी की लापरवाही पर न्यायिक आयोग ने सवाल उठाए, उसे कलेक्टर बनाना शर्मनाक है। यह पीड़ित परिवारों के प्रति सरकार के संवेदनहीन रवैये को दर्शाता है। कांग्रेस नेता केके मिश्रा ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर सरकार की नीयत और नैतिकता पर सवाल उठाए। एक्सपर्ट बोले: फील्ड पोस्टिंग से जवाबदेही पर उठते हैं सवाल वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक दिनेश गुप्ता के मुताबिक, विवादित कार्यकाल या लापरवाही के आरोपों के बाद अफसरों को दोबारा फील्ड पोस्टिंग देने से प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल उठते हैं। उनका कहना है कि फील्ड पोस्टिंग संवेदनशील होती है। इंदौर में दूषित पानी से मौतों जैसे गंभीर मामले के बाद संबंधित अधिकारी को कलेक्टर की जिम्मेदारी देना सरकार की ओर से क्लीन चिट दिए जाने का संदेश दे सकता है। इससे दूसरे अधिकारियों के मनोबल पर भी असर पड़ सकता है। गुप्ता के अनुसार, गंभीर मामलों में हटाए गए अफसरों को दोबारा फील्ड में भेजने से बचने की प्रशासनिक परंपरा रही है। उनके मुताबिक, दूषित पानी और कफ सिरप जैसे मामलों ने सरकार की छवि प्रभावित की है। ऐसे में इन अधिकारियों की नई पोस्टिंग को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। उन्होंने यह भी कहा कि इन नियुक्तियों को प्रशासनिक के बजाय राजनीतिक फैसले के रूप में देखा जा रहा है।

