रामपुर में दिगंबर जैन समाज के पावन दशलक्षण पर्यूषण पर्व के अंतिम दिन शुक्रवार को श्रद्धा और भक्ति के साथ उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की आराधना की गई। दस दिनों तक चले इस आध्यात्मिक पर्व के दौरान श्रद्धालुओं ने उत्तम क्षमा से लेकर उत्तम ब्रह्मचर्य तक जैन धर्म के दस धर्मों के सिद्धांतों को समझने और उन्हें अपने जीवन में उतारने का प्रयास किया। अंतिम दिन श्रद्धालुओं को इंद्रियों के आकर्षण और विषय-विकारों से ऊपर उठकर आत्मा के वास्तविक स्वरूप की ओर बढ़ने का संदेश दिया गया। 84 कोस मथुरा से रामपुर आए शास्त्री नमन जैन ने कहा कि उत्तम ब्रह्मचर्य मनुष्य को बाहरी आकर्षणों से हटाकर अपने भीतर झांकने की प्रेरणा देता है। जब व्यक्ति अपनी इंद्रियों और इच्छाओं पर नियंत्रण प्राप्त करता है, तभी वह वास्तविक आत्मिक शांति की दिशा में आगे बढ़ सकता है। उन्होंने कहा कि ब्रह्मचर्य शरीर के संयम के साथ-साथ विचारों की पवित्रता, वाणी की मर्यादा और आचरण की शुद्धता का नाम है। वहीं शास्त्री आर्जव जैन ने कहा कि मनुष्य का सबसे बड़ा संघर्ष बाहरी परिस्थितियों से अधिक उसके अपने मन की चंचलता और इच्छाओं से होता है। उत्तम ब्रह्मचर्य व्यक्ति को इच्छाओं के पीछे भागने के बजाय आत्मा के स्वरूप को समझने की प्रेरणा देता है। संयमित विचार, शुद्ध भाव और मर्यादित आचरण ही ब्रह्मचर्य की वास्तविक पहचान हैं। दशलक्षण पर्व के अंतिम दिन श्रद्धालुओं ने भगवान जिनेंद्र देव की पूजा-अर्चना कर आत्मकल्याण की भावना के साथ उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म को जीवन में अपनाने का संकल्प लिया। दस दिनों की साधना का संदेश रहा कि धर्म केवल मंदिर में पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं, बल्कि विचारों और व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन लाने वाली साधना है। उत्तम क्षमा से शुरू हुआ दशलक्षण पर्व उत्तम ब्रह्मचर्य के संदेश के साथ संपन्न हुआ। इस अवसर पर दिनेश जैन खंडेलवाल, प्रमोद कुमार जैन, प्रदीप कुमार जैन, विशाल जैन, वर्षा जैन, आशीष जैन, दिनेश जैन सेठी, भारत भूषण जैन, मुकेश जैन सेठी, राकेश जैन, योगेश जैन खंडेलवाल, कस्तूर चंद जैन, पवन जैन आदि मौजूद रहे।

