रविंद्र भाटी और यूनुस खान की सीक्रेट मीटिंग:BJP के बागियों का नया पावर सेंटर! क्या 2028 से पहले बनेगी नई पार्टी?

रविंद्र भाटी और यूनुस खान की सीक्रेट मीटिंग:BJP के बागियों का नया पावर सेंटर! क्या 2028 से पहले बनेगी नई पार्टी?

क्या राजस्थान में बीजेपी के ‘बागी’ 2028 के चुनाव से पहले तीसरा मोर्चा खड़ा करने की तैयारी में हैं? दो निर्दलीय विधायकों रविंद्र सिंह भार्टी और यूनुस खान की सीक्रेट मीटिंग से सियासी गलियारों में हलचल है। वसुंधरा राजे सरकार में कद्दावर मंत्री रहे यूनुस खान को भाजपा ने किनारे कर दिया था। फिर भी साल 2023 का विधानसभा चुनाव वे निर्दलीय जीते। वहीं, दूसरी तरफ रविंद्र सिंह भाटी भाजपा के बागी हैं, जिन्हें टिकट नहीं मिलने पर पार्टी से अलग होकर अपनी ताकत दिखाई और विधायक बने। भाटी की ‘EWS सरलीकरण यात्रा’ के दौरान डीडवाना में दोनों नेताओं की मुलाकात हुई। क्या यह मुलाकात एक सामान्य चर्चा थी या फिर अंदरखाने भाजपा से दरकिनार किए गए नेताओं के ‘नए पावर सेंटर’ की स्क्रिप्ट लिखी जा रही है? इसके सियासी मायने क्या हैं? यही जानेंगे आज के राजस्थान एक्सप्लेनर में… सवाल-1: इसे ‘सीक्रेट मीटिंग’ क्यों कहा जा रहा है? जवाब: तारीख – 8 अक्टूबर, जगह – डीडवाना का मिर्धा स्टेडियम। शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी अपनी EWS सरलीकरण यात्रा लेकर डीडवाना पहुंचे थे। शहर में रोड शो के बाद स्टेडियम में हुई सभा में मंच से संबोधित किया। लेकिन सभा खत्म होते ही सीन बदला। भाटी सीधे डीडवाना के निर्दलीय विधायक यूनुस खान के घर पहुंचे। इस मुलाकात की कोई आधिकारिक प्रेस रिलीज नहीं और कोई संयुक्त बयान नहीं, इसलिए इसे सीक्रेट मीटिंग कहा जा रहा है। इसके दो बड़े मायने हैं ‘बागी ब्रिगेड’ की नींव: रविंद्र सिंह भाटी और यूनुस खान दोनों ही भाजपा के बागी हैं। नेताओं के करीबी बताते हैं कि रैली के मुलाकात की जगह जानबूझकर यूनुस के घर चुनी गई। ताकि ये मैसेज जाए कि पश्चिमी राजस्थान का सबसे बड़ा युवा राजपूत चेहरा और मध्य राजस्थान का सबसे अनुभवी मुस्लिम चेहरा अब एक साथ हैं। ये आने वाले दिनों में एक अलग ब्लॉक बनाकर दबाव बनाने की तैयारी भी हो सकती है। EWS यात्रा का बहाना: भाटी की यात्रा का आधिकारिक मकसद EWS नियमों में सरलीकरण है, लेकिन डीडवाना में यूनुस खान से मिलना ये दिखाता है कि ये यात्रा सिर्फ आरक्षण की नहीं, बल्कि भाजपा से नाराज नेताओं को एक मंच पर लाने की भी है। सवाल-2: यूनुस खान और रविंद्र भाटी का बीजेपी से मोहभंग क्यों हुआ? जवाब: राजे सरकार में यूनुस खान को नंबर-2 मंत्री माना जाता था। 2018 में खान को डीडवाना की बजाय सचिन पायलट के खिलाफ टोंक से चुनाव लड़वाया, लेकिन हारे। 2023 में वो डीडवाना से बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन बीजेपी नेतृत्व ने उनकी जगह जितेंद्र सिंह जोधा को टिकट दे दिया। नतीजा – उन्होंने निर्दलीय जीतकर सबको चौंका दिया। कांग्रेस दूसरे और बीजेपी कैंडिडेट इस चुनाव में तीसरे नंबर पर रहे। जीत के बाद उन्होंने विधानसभा में संस्कृत में शपथ लेकर सबका दिल जीत लिया था। रविंद्र सिंह भाटी की कहानी इससे थोड़ी अलग है। वो मूल रूप से बाड़मेर के दूधोड़ा गांव के रहने वाले हैं। जय नारायण व्यास यूनिवर्सिटी जोधपुर में ABVP से जुड़े, टिकट नहीं मिला तो बागी होकर छात्रसंघ अध्यक्ष बने। अक्टूबर 2023 में भाजपा में शामिल हुए। शिव विधानसभा सीट से टिकट मांग रहे थे, लेकिन पार्टी ने टिकट नहीं दिया। सिर्फ 9 दिन बीजेपी में रहने के बाद बगावत कर दी। निर्दलीय लड़े और 79,495 वोट लेकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की। उनके सामने कांग्रेस के 84 साल के पूर्व मंत्री अमीन खान भी हार गए। बाद में 2024 लोकसभा चुनाव में बाड़मेर सीट से निर्दलीय लड़कर उन्होंने बीजेपी-कांग्रेस दोनों का गणित बिगाड़ दिया।

सवाल-3: क्या ये नेता भाजपा और कांग्रेस के सामने तीसरा मोर्चा खड़ा कर सकते हैं? जवाब: इस संभावना को हल्के में नहीं लिया जा सकता। कई समीकरण हैं जो इस ओर इशारा करते हैं… 1. वोटबैंक का नया गणित: यूनुस खान के साथ मुस्लिम + वसुंधरा राजे समर्थक पुराना बीजेपी कैडर है, तो भाटी के साथ राजपूत + युवा वोटबैंक है। इसके अलावा EWS सरलीकरण यात्रा को मिल रहे समर्थन के जरिए भी प्रदेश के अन्य इलाकों में इसे सीधे लोगों से जुड़ाव की तरह देखा जा रहा है। अगर ये दोनों नेता साथ आते हैं तो पश्चिमी राजस्थान (बाड़मेर, जैसलमेर, जोधपुर) और मध्य राजस्थान (नागौर, डीडवाना, अजमेर) में एक नया राजपूत-मुस्लिम-जाट (युवा) कॉम्बिनेशन बना सकते हैं। 2. बागियों का पावर सेंटर: राजस्थान में 08 निर्दलीय विधायक हैं। इनमें से ज्यादातर बीजेपी या कांग्रेस से बागी होकर जीते हैं। यूनुस और भाटी अगर एक मंच पर आए तो ये बागी एक ‘थर्ड फ्रंट’ के तौर पर 2028 से पहले दबाव समूह बन सकते हैं। 3. साल 2028 की तैयारी: बीजेपी के भीतर वसुंधरा राजे गुट अभी शांत है। यूनुस खान उस गुट के सबसे मुखर चेहरे हैं। भाटी का EWS आंदोलन सवर्ण वोटबैंक को टारगेट करता है, जो बीजेपी का कोर वोटर है। अगर दोनों ने हाथ मिलाया तो ये बीजेपी के लिए अंदरूनी घेराबंदी हो सकती है। सवाल-4: EWS आंदोलन के बहाने दबाव बनाने की यह रणनीति सरकार और संगठन के लिए कितनी बड़ी सिरदर्द है? जवाब: बहुत बड़ी, क्योंकि EWS का मुद्दा बीजेपी के अपने बनाए हुए जाल में ही उसे फंसाता नजर आ रहा है। EWS है क्या और पेच कहां है: साल 2019 में केंद्र की मोदी सरकार सामान्य वर्ग के गरीबों के लिए 10% EWS आरक्षण लाई थी। केंद्र के नियमों में 5 शर्तें हैं – 8 लाख से कम सालाना आय, 5 एकड़ से कम जमीन, गांव में 200 वर्ग गज से कम प्लॉट, शहर में 100 वर्ग गज से कम प्लॉट और 1000 वर्ग फीट से कम मकान। भाटी का तर्क है कि पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर-जैसलमेर जैसे बंजर इलाकों में जमीन बड़ी है लेकिन कीमत और पैदावार जीरो है, इसलिए गरीब किसान भी 5 एकड़ वाली शर्त के कारण EWS से बाहर हो जाता है। राजस्थान मॉडल vs केंद्र मॉडल: इसी विरोध के बाद राजस्थान सरकार ने अक्टूबर 2019 में राज्य की नौकरियों और कॉलेजों के लिए EWS में संपत्ति वाली शर्तें हटा दी थीं। इसके लिए सिर्फ 8 लाख आय को ही आधार बनाया था। लेकिन ये छूट केंद्रीय नौकरियों और UPSC, रेलवे, बैंक जैसी भर्तियों पर लागू नहीं होती। अब भाटी की मांग है कि राजस्थान मॉडल को केंद्र में भी मान्यता मिले। सरकार के लिए सिरदर्द: अगर सरकार केंद्र से मांग नहीं मनवाती तो सवर्ण युवा नाराज हो सकता है, जो बीजेपी का कोर वोटर भी माना जाता है। अगर मांग का समर्थन करती है तो ये मानना पड़ेगा कि केंद्र का नियम गलत रहा। सबसे बड़ी बात – EWS आंदोलन के बहाने भाटी सरीखे नेता रोजाना भीड़ जुटा रहे हैं, जो बीजेपी संगठन के लिए सीधी चुनौती है। सवाल-5: क्या 2028 के चुनाव से पहले पार्टी बनाने की तैयारी में हैं भाटी? जवाब: प्रदेश में तीसरे मोर्चे की आहट पर जब भाटी से सवाल पूछा गया तो कहा- आगे क्या होगा, यह जनता का आदेश और ईश्वर की मंजूरी तय करेगी। भाटी ने सीधे तौर पर तो इसे स्वीकार नहीं किया, लेकिन जानकारों का दावा है इस यात्रा के जरिए वे 2028 के चुनाव से पहले वोटर्स की नब्ज टटोलने में जुटे हुए हैं। वहीं, यूनुस खान का कहना है कि, उनके घर पर रविंद्र सिंह भाटी से किसी तरह की कोई राजनीतिक बातचीत नहीं हुई। वे छोटे भाई की तरह हैं। यात्रा के दौरान डीडवाना पहुंचने पर उनका फोन आया था। इसके बाद वे खुद ही अपने स्टाफ के कुछ साथियों के साथ घर आ गए थे।

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