आज अष्टमी तिथि है और बंगाली पद्धति से आज कन्या पूजन होगा। नवरात्र के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दौरान कन्या पूजन का विशेष महत्व है। सनातन परंपरा में महानवमी के दिन हवन के बाद नौ कन्याओं की पूजा की जाती है। वहीं, बंगाली समाज में कुंवारी पूजा की अलग परंपरा है। बांग्ला पद्धति से पूजा करने वाले श्रद्धालु अष्टमी तिथि को एक कुंवारी कन्या की पूजा करते हैं। इसके लिए कन्या का चयन सालभर पहले ही कर लिया जाता है। कुंवारी को सिंहासन पर बैठाकर की जाती है पूजा बंगाली अखाड़ा लंगरटोली के वाइस प्रेसिडेंट समीर राय ने बताया, ‘अष्टमी के दिन ही कन्या की कुंवारी पूजा की जाती है। कन्या किसी भी जाति से हो, उससे फर्क नहीं पड़ता है। कुंवारी को सिंहासन पर बिठाकर मां का रूप दिया जाता है। उसे साड़ी, रजनीगंधा फूल की माला, हाथ में रजनीगंधा फूल की चूड़ी, सर पर मुकुट, पैर में आलता लगाकर सजाया जाता है और साक्षात देवी का स्वरूप दिया जाता है। कुंवारी पूजन के लिए दो ब्राह्मण की जरूरत होती है, एक पूजा करवाते हैं और दूसरा मंत्रोच्चारण करते हैं।’ पांव छूने के लिए लगती होड़ कुंवारी पूजन के बाद सभी लोग मां के पांव छूने के लिए होड़ में लग जाते है। सभी लोग उसे गोद में लेते है। अपनी इच्छानुसार लोग कन्या को रूपया, कपड़ा, आदि उपहार भेंट करते है। समीर राय ने बताया कि जबतक कन्या मिट्टी में पैर नहीं रखेगी, तब तक वह मां का रूप है। बंगाली पद्धति के अनुसार किसी भी कन्या का जीवन में एक ही बार कुंवारी पूजन होता है। कुंवारी पूजन के लिए कन्या की उम्र 5 से 8 वर्ष तक होनी चाहिए। मां को चढ़ाए जाएंगे 108 कमल के फूल कुंवारी पूजा के बाद संधी पूजा होती है। संधी पूजा अष्टमी और नवमी का मिलन होता है। संधी पूजा के दिन सुहागन महिलाएं 108 दिए जलाती हैं, जिससे मां की आरती की जाती है। फिर मां को 108 कमल के फूल, 108 बेलपत्र की माला, 108 उड़हुल फूल की माला मां को चढ़ाया जाता है और इसके बाद मां का जागरण किया जाता है। वहीं, पुष्पांजलि के दिन भक्त उपवास करके मां की आराधना करते हैं। फिर मंत्र उच्चारण होता है और पुष्पांजलि का फूल मां को अर्पित करके प्रसाद ग्रहण किया जाता है। भागलपुरी कतरनी चावल से लगेगा पुलाव का भोग बंगाली अखाड़ा में सप्तमी, अष्टमी और नवमी को अलग-अलग भोग लगता है। सप्तमी और अष्टमी को खिचड़ी का भोग, वहीं नवमी के दिन पुलाव और मटर पनीर का भोग लगता है। देहरादूनी चावल से खिचड़ी बनेगी और भागलपुरी कतरनी चावल से पुलाव बनाया जाएगा। इन तीनों दिन खीर ,पूरी, सब्जी, खीर, हलवा, दनौरी, पापड़, चटनी सहित 11 पकवानों का भोग लगता है। दसवीं को दही-चूड़ा का भोग लगेगा। कूपन सिस्टम से मिलेगा प्रसाद हर दिन अलग-अलग किस्म की सब्जी रहेगी। सप्तमी को आलू गोभी, अष्टमी को आलू परवल और नवमी को आलू कश्मीरी सहित पनीर की सब्जी रहेगी। भोग के पकवान को मिथिलांचल के रसोईया बनाएंगे। मां के भोग का वितरण कूपन सिस्टम से होता है। यह भोग मिट्टी के बर्तन में दिया जाता है। सप्तमी और अष्टमी को 400 रुपए का कूपन रहता है। वहीं, नवमी को 500 रुपए का कूपन रहता है। आज अष्टमी तिथि है और बंगाली पद्धति से आज कन्या पूजन होगा। नवरात्र के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दौरान कन्या पूजन का विशेष महत्व है। सनातन परंपरा में महानवमी के दिन हवन के बाद नौ कन्याओं की पूजा की जाती है। वहीं, बंगाली समाज में कुंवारी पूजा की अलग परंपरा है। बांग्ला पद्धति से पूजा करने वाले श्रद्धालु अष्टमी तिथि को एक कुंवारी कन्या की पूजा करते हैं। इसके लिए कन्या का चयन सालभर पहले ही कर लिया जाता है। कुंवारी को सिंहासन पर बैठाकर की जाती है पूजा बंगाली अखाड़ा लंगरटोली के वाइस प्रेसिडेंट समीर राय ने बताया, ‘अष्टमी के दिन ही कन्या की कुंवारी पूजा की जाती है। कन्या किसी भी जाति से हो, उससे फर्क नहीं पड़ता है। कुंवारी को सिंहासन पर बिठाकर मां का रूप दिया जाता है। उसे साड़ी, रजनीगंधा फूल की माला, हाथ में रजनीगंधा फूल की चूड़ी, सर पर मुकुट, पैर में आलता लगाकर सजाया जाता है और साक्षात देवी का स्वरूप दिया जाता है। कुंवारी पूजन के लिए दो ब्राह्मण की जरूरत होती है, एक पूजा करवाते हैं और दूसरा मंत्रोच्चारण करते हैं।’ पांव छूने के लिए लगती होड़ कुंवारी पूजन के बाद सभी लोग मां के पांव छूने के लिए होड़ में लग जाते है। सभी लोग उसे गोद में लेते है। अपनी इच्छानुसार लोग कन्या को रूपया, कपड़ा, आदि उपहार भेंट करते है। समीर राय ने बताया कि जबतक कन्या मिट्टी में पैर नहीं रखेगी, तब तक वह मां का रूप है। बंगाली पद्धति के अनुसार किसी भी कन्या का जीवन में एक ही बार कुंवारी पूजन होता है। कुंवारी पूजन के लिए कन्या की उम्र 5 से 8 वर्ष तक होनी चाहिए। मां को चढ़ाए जाएंगे 108 कमल के फूल कुंवारी पूजा के बाद संधी पूजा होती है। संधी पूजा अष्टमी और नवमी का मिलन होता है। संधी पूजा के दिन सुहागन महिलाएं 108 दिए जलाती हैं, जिससे मां की आरती की जाती है। फिर मां को 108 कमल के फूल, 108 बेलपत्र की माला, 108 उड़हुल फूल की माला मां को चढ़ाया जाता है और इसके बाद मां का जागरण किया जाता है। वहीं, पुष्पांजलि के दिन भक्त उपवास करके मां की आराधना करते हैं। फिर मंत्र उच्चारण होता है और पुष्पांजलि का फूल मां को अर्पित करके प्रसाद ग्रहण किया जाता है। भागलपुरी कतरनी चावल से लगेगा पुलाव का भोग बंगाली अखाड़ा में सप्तमी, अष्टमी और नवमी को अलग-अलग भोग लगता है। सप्तमी और अष्टमी को खिचड़ी का भोग, वहीं नवमी के दिन पुलाव और मटर पनीर का भोग लगता है। देहरादूनी चावल से खिचड़ी बनेगी और भागलपुरी कतरनी चावल से पुलाव बनाया जाएगा। इन तीनों दिन खीर ,पूरी, सब्जी, खीर, हलवा, दनौरी, पापड़, चटनी सहित 11 पकवानों का भोग लगता है। दसवीं को दही-चूड़ा का भोग लगेगा। कूपन सिस्टम से मिलेगा प्रसाद हर दिन अलग-अलग किस्म की सब्जी रहेगी। सप्तमी को आलू गोभी, अष्टमी को आलू परवल और नवमी को आलू कश्मीरी सहित पनीर की सब्जी रहेगी। भोग के पकवान को मिथिलांचल के रसोईया बनाएंगे। मां के भोग का वितरण कूपन सिस्टम से होता है। यह भोग मिट्टी के बर्तन में दिया जाता है। सप्तमी और अष्टमी को 400 रुपए का कूपन रहता है। वहीं, नवमी को 500 रुपए का कूपन रहता है।

