बिहार शरीफ बना ‘एशियन ओपनबिल’ का नया ठिकाना:दलदल और झीलों में रहा करते थे ये पक्षी, जलवायु परिवर्तन का इनपर असर

बिहार शरीफ बना ‘एशियन ओपनबिल’ का नया ठिकाना:दलदल और झीलों में रहा करते थे ये पक्षी, जलवायु परिवर्तन का इनपर असर

प्रकृति-जलवायु में बदलाव का असर अब वन्यजीवों और जलीय पक्षियों के जीवन पर साफ नजर आने लगा है। सारस परिवार का बेहद खास और बड़ा जलीय पक्षी ‘एशियन ओपनबिल’ जिसे स्थानीय भाषा में ‘घोंघिल’ कहा जाता है, अपने अस्तित्व और सुरक्षा के लिए अब मानवीय बस्तियों की ओर रुख कर रहा है। कभी शांत दलदल और झीलों में रहने वाले ये पक्षी अब नालंदा जिले के शहरी-अर्ध-शहरी इलाकों में अपने बसेरे बना रहे हैं। घोंघिल मुख्य रूप से भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण-पूर्व एशिया में पाया जाता है। भोजन के रूप में इसका मुख्य आहार पानी में पाए जाने वाले घोंघे होते हैं, जिस कारण इसका नाम ‘घोंघिल’ पड़ा। सामान्य रंग धूसर-सफेद होता है इस पक्षी की सबसे बड़ी शारीरिक पहचान इसकी विचित्र और विशेष बनावट वाली चोंच है। वयस्क घोंघिल की ऊपरी और निचली चोंच के बीच एक स्पष्ट खाली गैप होता है। यह गैप घोंघे के बेहद सख्त बाहरी आवरण को पकड़ने और उसके अंदर से नरम मांस को आसानी से बाहर निकालने में एक प्राकृतिक उपकरण की तरह काम करता है। दिलचस्प बात यह है कि नवजात चूजों की चोंच में यह गैप नहीं होता, बल्कि उम्र बढ़ने के साथ धीरे-धीरे यह आकार लेता है।
शारीरिक रूप से यह पक्षी लगभग 68 से 81 सेंटीमीटर लंबा होता है। इसका सामान्य रंग धूसर-सफेद होता है और पूंछ चमकदार काले रंग की होती है। हालांकि, प्रजनन काल के दौरान इनके पंखों की रंगत में गहरा धूसरपन आ जाता है।
मानसून में प्रजनन घोंघिल स्थानीय मौसमी प्रवास के लिए जाने जाते हैं। ये उथले दलदलों, झीलों और जलमग्न खेतों जैसी आर्द्रभूमि के पास रहना पसंद करते हैं। मानसून का समय इनके प्रजनन के लिए सबसे अनुकूल होता है। ये खुले स्थानों पर अकेले रहने के बजाय पेड़ों पर बड़े-बड़े झुंडों में सामूहिक घोंसले बनाते हैं, जिसे पक्षी विज्ञान में ‘हीरोनरी’ कहा जाता है। मादा घोंघिल एक प्रजनन चक्र में 2 से 5 अंडे देती है। पर्यावरणविद और गौरैया बिहग फाउंडेशन के निदेशक राजीव रंजन पाण्डेय के अनुसार, प्राकृतिक आर्द्रभूमियों के सिकुड़ने, प्रदूषण और मानवीय दखल ने घोंघिल के जीवन चक्र और इनकी आबादी पर गहरा प्रतिकूल प्रभाव डाला है। प्राकृतिक आवासों में असुरक्षा के चलते पिछले कुछ दशकों से इन पक्षियों के व्यवहार में बड़ा बदलाव देखा गया है। अब ये पक्षी सुरक्षा की तलाश में बिहार शरीफ के सघन इलाकों जैसे छावनी क्षेत्र, नालंदा कॉलेज परिसर, बिहार शरीफ कोर्ट और बिहार थाना परिसर के ऊंचे पेड़ों पर अपनी कॉलोनी बनाकर रहने लगे हैं। प्रकृति-जलवायु में बदलाव का असर अब वन्यजीवों और जलीय पक्षियों के जीवन पर साफ नजर आने लगा है। सारस परिवार का बेहद खास और बड़ा जलीय पक्षी ‘एशियन ओपनबिल’ जिसे स्थानीय भाषा में ‘घोंघिल’ कहा जाता है, अपने अस्तित्व और सुरक्षा के लिए अब मानवीय बस्तियों की ओर रुख कर रहा है। कभी शांत दलदल और झीलों में रहने वाले ये पक्षी अब नालंदा जिले के शहरी-अर्ध-शहरी इलाकों में अपने बसेरे बना रहे हैं। घोंघिल मुख्य रूप से भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण-पूर्व एशिया में पाया जाता है। भोजन के रूप में इसका मुख्य आहार पानी में पाए जाने वाले घोंघे होते हैं, जिस कारण इसका नाम ‘घोंघिल’ पड़ा। सामान्य रंग धूसर-सफेद होता है इस पक्षी की सबसे बड़ी शारीरिक पहचान इसकी विचित्र और विशेष बनावट वाली चोंच है। वयस्क घोंघिल की ऊपरी और निचली चोंच के बीच एक स्पष्ट खाली गैप होता है। यह गैप घोंघे के बेहद सख्त बाहरी आवरण को पकड़ने और उसके अंदर से नरम मांस को आसानी से बाहर निकालने में एक प्राकृतिक उपकरण की तरह काम करता है। दिलचस्प बात यह है कि नवजात चूजों की चोंच में यह गैप नहीं होता, बल्कि उम्र बढ़ने के साथ धीरे-धीरे यह आकार लेता है।
शारीरिक रूप से यह पक्षी लगभग 68 से 81 सेंटीमीटर लंबा होता है। इसका सामान्य रंग धूसर-सफेद होता है और पूंछ चमकदार काले रंग की होती है। हालांकि, प्रजनन काल के दौरान इनके पंखों की रंगत में गहरा धूसरपन आ जाता है।
मानसून में प्रजनन घोंघिल स्थानीय मौसमी प्रवास के लिए जाने जाते हैं। ये उथले दलदलों, झीलों और जलमग्न खेतों जैसी आर्द्रभूमि के पास रहना पसंद करते हैं। मानसून का समय इनके प्रजनन के लिए सबसे अनुकूल होता है। ये खुले स्थानों पर अकेले रहने के बजाय पेड़ों पर बड़े-बड़े झुंडों में सामूहिक घोंसले बनाते हैं, जिसे पक्षी विज्ञान में ‘हीरोनरी’ कहा जाता है। मादा घोंघिल एक प्रजनन चक्र में 2 से 5 अंडे देती है। पर्यावरणविद और गौरैया बिहग फाउंडेशन के निदेशक राजीव रंजन पाण्डेय के अनुसार, प्राकृतिक आर्द्रभूमियों के सिकुड़ने, प्रदूषण और मानवीय दखल ने घोंघिल के जीवन चक्र और इनकी आबादी पर गहरा प्रतिकूल प्रभाव डाला है। प्राकृतिक आवासों में असुरक्षा के चलते पिछले कुछ दशकों से इन पक्षियों के व्यवहार में बड़ा बदलाव देखा गया है। अब ये पक्षी सुरक्षा की तलाश में बिहार शरीफ के सघन इलाकों जैसे छावनी क्षेत्र, नालंदा कॉलेज परिसर, बिहार शरीफ कोर्ट और बिहार थाना परिसर के ऊंचे पेड़ों पर अपनी कॉलोनी बनाकर रहने लगे हैं।  

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