बहादुरगढ़ में रोज पसीना बहा रहे दृष्टिबाधित हिमांशु नांदल:एशियन पैरा गेम्स में लगाएंगे पदक के लिए छलांग,पानी में रास्ता दिखाई नहीं देता, महसूस करते हैं

बहादुरगढ़ में रोज पसीना बहा रहे दृष्टिबाधित हिमांशु नांदल:एशियन पैरा गेम्स में लगाएंगे पदक के लिए छलांग,पानी में रास्ता दिखाई नहीं देता, महसूस करते हैं

कहते हैं, अगर हौसले बुलंद हों तो अंधेरे में भी रास्ते अपने आप बन जाते हैं। रोहतक के रहने वाले दृष्टिबाधित तैराक हिमांशु नांदल ने इसे सच साबित कर दिखाया है। जन्म से दृष्टिबाधित हिमांशु ने पानी की लहरों को अपनी दुनिया बनाया और आज वे देश के उभरते पैरा स्विमिंग खिलाड़ियों में शामिल हैं। अब उनकी नजरें जापान में होने वाले एशियन पैरा गेम्स में भारत के लिए पदक जीतने पर हैं। जूडो छोड़ 2021 में तैराकी शुरू की, पहली राष्ट्रीय प्रतियोगिता में ही गोल्ड हिमांशु ने वर्ष 2021 में जूडो से रुख बदलकर पैरा स्विमिंग में कदम रखा। एस-11 कैटेगरी में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। वर्ष 2022 की पहली राष्ट्रीय प्रतियोगिता में ही स्वर्ण पदक जीतने के साथ नेशनल रिकॉर्ड बनाकर उन्होंने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। इसके बाद वर्ष 2023 में चीन के हांगझोउ में आयोजित चौथे एशियन पैरा गेम्स में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया और फाइनलिस्ट बने। वर्ष 2024 में हिमांशु ने पेरिस पैरालंपिक के लिए मिनिमम क्वालिफिकेशन स्टैंडर्ड हासिल किया। वे ऐसा करने वाले पहले भारतीय ब्लाइंड तैराक बने। हालांकि कोटा सीमाओं के कारण पेरिस पैरालंपिक में उन्हें प्रतिस्पर्धा का मौका नहीं मिला। 2025 में तीन गोल्ड के साथ बेस्ट स्विमर का खिताब हिमांशु की मेहनत का सिलसिला इसके बाद भी जारी रहा। वर्ष 2025 में सिंगापुर में हुई वर्ल्ड पैरा स्विमिंग चैंपियनशिप में वे दो स्पर्धाओं के फाइनल में पहुंचे। इसके बाद हैदराबाद में आयोजित नेशनल पैरा स्विमिंग चैंपियनशिप में उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया। उन्होंने 50 मीटर फ्रीस्टाइल, 100 मीटर ब्रेस्टस्ट्रोक और 100 मीटर बैकस्ट्रोक में स्वर्ण पदक जीते। इस दौरान नेशनल रिकॉर्ड बनाने के साथ उन्हें बेस्ट स्विमर का खिताब भी मिला। पानी में रास्ता दिखाई नहीं देता, महसूस करते हैं दृष्टिबाधित तैराक के लिए पूल में सही दिशा बनाए रखना, टर्न लेना और रिदम कायम रखना बड़ी चुनौती होती है। हिमांशु के कोच रणबीर शर्मा ने एडाप्टिव तकनीकों के जरिए उनकी इन चुनौतियों को आसान बनाया। हिमांशु की कड़ी मेहनत और कोच के मार्गदर्शन ने मिलकर असंभव लगने वाली चुनौतियों को संभव कर दिखाया। हिमांशु स्पोर्ट्स मैनेजमेंट में करियर बनाना चाहते हैं। वे स्नातक की पढ़ाई पूरी कर चुके हैं और आगे पोस्ट ग्रेजुएशन करने की तैयारी में हैं। पिता पुलिस अधिकारी, व्यस्त ड्यूटी के बीच बेटे का हर कदम पर साथ हिमांशु के पिता बलवान हरियाणा के मुख्यमंत्री की सुरक्षा टीम में पुलिस अधिकारी हैं। व्यस्त ड्यूटी के बावजूद वे बेटे के साथ देश-विदेश में होने वाली प्रतियोगिताओं में उसका हौसला बढ़ाने पहुंचे हैं। उनका मानना है कि हर बच्चा भगवान की दी हुई विशेष योग्यता लेकर आता है और माता-पिता को हर परिस्थिति में अपने बच्चे के साथ खड़ा रहना चाहिए। हालांकि उनका कहना है कि हिमांशु को सरकार की ओर से अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। पेरिस पैरालंपिक का क्वालिफिकेशन मार्क हासिल करने के बावजूद उन्हें खिलाड़ियों की TOPS योजना में शामिल नहीं किया गया। उनका कहना है कि खिलाड़ियों की तैयारी के दौर में सरकार को आगे आकर सहयोग करना चाहिए। बहादुरगढ़ में रोज पसीना बहा रहे, 6 स्पर्धाओं पर नजर जापान में होने वाले एशियन पैरा गेम्स के लिए हिमांशु इन दिनों बहादुरगढ़ की एचएल सिटी स्थित चैंपियंस स्पोर्ट्स एकेडमी में रोजाना अभ्यास कर रहे हैं। हरियाणा ओलंपिक एसोसिएशन के उपाध्यक्ष और हरियाणा तैराकी संघ के महासचिव अनिल खत्री ने भी हिमांशु का हौसला बढ़ाया है। उनका कहना है कि हिमांशु सिर्फ हरियाणा की नहीं, बल्कि देश की धरोहर हैं और इस बार वे एशियन गेम्स में भारत के लिए पदक जरूर जीतकर लाएंगे। हिमांशु जापान में 50, 100 और 400 मीटर फ्रीस्टाइल, 100 मीटर बैकस्ट्रोक, 100 मीटर ब्रेस्टस्ट्रोक और 200 मीटर आईएम स्पर्धाओं में चुनौती पेश करेंगे। आंखों से नहीं, इरादों से देखी मंजिल हिमांशु की कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की सफलता की कहानी नहीं, बल्कि उस जज्बे की कहानी है जो किसी कमी को अपनी कमजोरी नहीं बनने देता। पानी में उतरते वक्त उन्हें रास्ता दिखाई नहीं देता, लेकिन वे उसे महसूस करते हैं। उनकी मेहनत, आत्मविश्वास और मजबूत इरादे ही उन्हें मंजिल तक पहुंचाने का रास्ता बनाते हैं। अब हिमांशु की नजर जापान के एशियन पैरा गेम्स के पदक पर है, जबकि उनका बड़ा सपना लॉस एंजिल्स 2028 पैरालंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करना है।

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