बड़वानी। नागपंचमी के अवसर पर बड़वानी शहर की सीमा खत्म होते ही धार जिले की सीमा से करीब तीन किलोमीटर पहले नवलपुरा रोड पर स्थित करीब सौ वर्ष पुराना बाबा भिलट देव मंदिर आस्था का प्रमुख केंद्र बना रहा। सोमवार सुबह से ही मंदिर परिसर में हजारों श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। तड़के करीब पांच बजे से ही बाबा भिलट देव के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का पहुंचना शुरू हो गया था। दिन चढ़ने के साथ भीड़ लगातार बढ़ती गई। आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के साथ ही दूर-दराज से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचकर बाबा के दर्शन और पूजा-अर्चना कर रहे हैं। क्या है मंदिर की मान्यता मंदिर से जुड़ी एक खास और वर्षों पुरानी मान्यता आज भी श्रद्धालुओं के बीच चर्चा का विषय है। मंदिर के भक्त शोभाराम कुशवाह के अनुसार, करीब सौ वर्ष पहले यह पूरा क्षेत्र घने जंगल से घिरा हुआ था, जहां उनके पूर्वज खेती करते थे। मान्यता के अनुसार, एक रात बाबा भिलट देव उनके परदादा के सपने में आए और उन्हें गांव से बाहर ले जाने का निर्देश दिया। इसके बाद बाबा भिलट देव की प्रतिमा को बैलगाड़ी में रखकर दूसरे स्थान पर ले जाने का प्रयास किया गया। परिवार के लोग प्रतिमा को लेकर आगे बढ़ रहे थे, लेकिन जैसे ही बैलगाड़ी आज के मंदिर वाले स्थान पर पहुंची, उसके पहिए अचानक थम गए। परिवार ने बैलगाड़ी को आगे बढ़ाने के लिए काफी प्रयास किए, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद वह टस से मस नहीं हुई। परिवार ने इसे बाबा भिलट देव की इच्छा और संकेत माना। इसके बाद उसी स्थान को बाबा का पवित्र स्थान मानकर वहां प्रतिमा स्थापित कर दी गई। धीरे-धीरे इस स्थान के प्रति लोगों की आस्था बढ़ती गई और आगे चलकर यहां भव्य मंदिर का निर्माण हुआ। आस्था का प्रमुख केंद्र आज यह मंदिर क्षेत्र के श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र बन चुका है। मंदिर के गर्भगृह में आज भी मिट्टी से बनी बाबा भिलट देव की मुख्य प्रतिमा विराजमान है। मुख्य प्रतिमा के साथ चार छोटी प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। श्रद्धालु यहां पहुंचकर अपनी मनोकामनाओं के लिए प्रार्थना करते हैं। मंदिर के सामने स्थित करीब सौ वर्ष पुरानी बावड़ी आज भी इस स्थान के पुराने इतिहास की गवाही देती है। वहीं मंदिर के पास मौजूद विशाल बरगद का पेड़ भी लोगों की आस्था से जुड़ा हुआ है। श्रद्धालु यहां कुछ समय रुककर पूजा-पाठ करते हैं और बाबा भिलट देव से सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। बाबा भिलट देव मंदिर में नागपंचमी का उत्सव एक दिन पहले से ही शुरू हो जाता है। मंदिर परिसर में विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक गतिविधियां होती हैं।
मंदिर परिसर में मौजूद प्राचीन धरोहरें भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र हैं। नागपंचमी के दिन सुबह से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगने लगती हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक हर वर्ष नागपंचमी के अवसर पर 15 हजार से अधिक श्रद्धालु बाबा भिलट देव के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। श्रद्धालुओं के लिए की जाती हैं व्यवस्थाएं श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए मंदिर समिति और पुलिस प्रशासन द्वारा भी विशेष व्यवस्थाएं की जाती हैं। मंदिर परिसर में महिला और पुरुष श्रद्धालुओं के लिए अलग-अलग कतारें बनाई गईं। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए बैरिकेडिंग की गई, ताकि श्रद्धालुओं को दर्शन के दौरान किसी तरह की परेशानी न हो। नागपंचमी के मौके पर उमड़ने वाली भारी भीड़ को देखते हुए पुलिस प्रशासन भी पूरी तरह मुस्तैद रहा। मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्र में पुलिस जवानों की तैनाती की गई। श्रद्धालुओं की आवाजाही को व्यवस्थित करने के साथ ही यातायात व्यवस्था संभालने के लिए भी जवान तैनात किए गए।
सुबह से ही मंदिर की ओर जाने वाले मार्ग पर श्रद्धालुओं और वाहनों की आवाजाही बढ़ने लगी। पुलिस और मंदिर समिति के कार्यकर्ताओं ने मिलकर भीड़ को नियंत्रित किया और श्रद्धालुओं को कतारबद्ध तरीके से दर्शन करवाए। आस्था, परंपरा और वर्षों पुरानी मान्यता बड़वानी शहर से कुछ ही दूरी पर स्थित बाबा भिलट देव का यह प्राचीन मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थान ही नहीं, बल्कि स्थानीय लोक आस्था, परंपरा और वर्षों पुरानी मान्यताओं का केंद्र भी है। जंगल के बीच बैलगाड़ी के पहिए थमने से जुड़ी बाबा की कथा आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों तक पहुंच रही है।
करीब सौ वर्ष पुराना मंदिर, प्राचीन बावड़ी, विशाल बरगद का पेड़ और मिट्टी से बनी बाबा की प्रतिमा इस धार्मिक स्थल को अपनी अलग पहचान देते हैं। नागपंचमी के अवसर पर हजारों श्रद्धालुओं की मौजूदगी इस बात का प्रमाण है कि समय के साथ इस स्थान के प्रति लोगों की आस्था और विश्वास लगातार मजबूत होता जा रहा है।
नागपंचमी पर बाबा भिलट देव के दरबार में उमड़ता यह आस्था का सैलाब बड़वानी की धार्मिक और लोक-सांस्कृतिक परंपरा की एक अनूठी तस्वीर पेश करता है।

