बिहार की राजनीति में बाढ़, गंगा और पानी का मुद्दा हमेशा से अहम रहा है। अब जनता दल यूनाइटेड (जदयू) ने फरक्का जल संधि को लेकर एक बार फिर बिहार के हितों का सवाल उठाया है। पार्टी ने शनिवार को बक्सर से ‘फरक्का जल संधि पर नीतीश संवाद’ अभियान की शुरुआत की। यह अभियान गंगा किनारे बसे बिहार के 12 जिलों में चलाया जाएगा और इसका समापन कटिहार में होगा। बिहार के हितों के खिलाफ बताई संधि जदयू फरक्का जल संधि को बिहार के हितों के खिलाफ बताते हुए इसके नवीनीकरण का विरोध करेगी। पार्टी नेताओं का कहना है कि फरक्का बराज और भारत-बांग्लादेश के बीच जल बंटवारे की व्यवस्था का असर बिहार में गंगा के जल प्रवाह पर पड़ता है। जदयू इसे बाढ़, सिंचाई, पेयजल, उद्योग और रोजगार जैसे मुद्दों से जोड़ रही है। बक्सर से कटिहार तक चलेगा संवाद बक्सर को अभियान की शुरुआत के लिए इसलिए चुना गया है क्योंकि गंगा इसी क्षेत्र से बिहार में प्रवेश करती है। पार्टी की योजना गंगा किनारे बसे जिलों में जाकर लोगों को फरक्का बराज और जल संधि से जुड़े प्रभावों के बारे में जानकारी देने की है। जदयू इसे जनजागरूकता अभियान के साथ-साथ बिहार के जल अधिकार की आवाज के रूप में पेश कर रही है। संजय झा बोले- 2050 की जरूरतों का हो ध्यान जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा ने 1996 में भारत और बांग्लादेश के बीच हुई फरक्का जल संधि को बिहार के हित में नहीं बताया। उन्होंने कहा कि भविष्य में यदि कोई नई व्यवस्था बनती है तो उसमें कम से कम वर्ष 2050 तक बिहार की पानी की जरूरतों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। गाद और बाढ़ को लेकर जदयू का तर्क प्रदेश अध्यक्ष उमेश सिंह कुशवाहा ने फरक्का बराज को गंगा में गाद जमा होने और नदी का तल ऊंचा होने से जोड़ा। उनका कहना है कि इसका असर बिहार में बार-बार आने वाली बाढ़ के रूप में दिखाई देता है। जदयू का दावा है कि अंतरराष्ट्रीय जल समझौते का बड़ा बोझ बिहार को उठाना पड़ रहा है। सवाल- अब इतनी मुखर क्यों हुई जदयू? इस अभियान ने राजनीतिक बहस भी तेज कर दी है। राजनीतिक जानकार सवाल उठा रहे हैं कि फरक्का जल संधि को बिहार के लिए नुकसानदेह बताने वाली जदयू अब इस मुद्दे पर इतनी मुखर क्यों हुई है। खासकर तब, जब पार्टी लंबे समय से बिहार की सत्ता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है। जदयू हालांकि इसे राजनीतिक अभियान मानने से इनकार कर रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि यह किसी दल या सरकार के खिलाफ नहीं, बल्कि बिहार के हक और भविष्य की जल जरूरतों का सवाल है। जदयू नेतृत्व इसे केंद्र के सामने बिहार की आवाज मजबूत करने की पहल बता रहा है। बाढ़ और जल प्रबंधन से जुड़ा बड़ा सवाल फरक्का का मुद्दा केवल भारत-बांग्लादेश के बीच पानी के बंटवारे तक सीमित नहीं है। इसका संबंध बिहार की बाढ़, सिंचाई, गाद प्रबंधन, नदी के प्रवाह और जल संसाधनों की दीर्घकालिक योजना से भी है। यही वजह है कि जदयू इस मुद्दे को गंगा किनारे बसे जिलों तक ले जाकर जनभावना से जोड़ने की कोशिश कर रही है। अभियान की असली परीक्षा आगे राजनीतिक तौर पर जदयू के अभियान के दो स्पष्ट लक्ष्य नजर आते हैं। पहला, बिहार की बाढ़ और जल संकट जैसे वास्तविक मुद्दों पर केंद्र से अधिक हस्तक्षेप और हिस्सेदारी की मांग करना। दूसरा, आगामी राजनीतिक विमर्श में ‘बिहार के हक’ को प्रमुख मुद्दा बनाना। अब देखना यह होगा कि बक्सर से शुरू हुआ यह संवाद केवल सभाओं और जनजागरूकता कार्यक्रमों तक सीमित रहता है या जदयू फरक्का बराज, गाद प्रबंधन, बाढ़ नियंत्रण और बिहार के जल अधिकार को लेकर केंद्र से कोई ठोस पहल भी हासिल कर पाती है। आखिर सवाल केवल फरक्का जल संधि के विरोध का नहीं, बल्कि बाढ़ और सूखे के बीच झूलते बिहार के लिए स्थायी जल प्रबंधन की व्यवस्था का है। बिहार की राजनीति में बाढ़, गंगा और पानी का मुद्दा हमेशा से अहम रहा है। अब जनता दल यूनाइटेड (जदयू) ने फरक्का जल संधि को लेकर एक बार फिर बिहार के हितों का सवाल उठाया है। पार्टी ने शनिवार को बक्सर से ‘फरक्का जल संधि पर नीतीश संवाद’ अभियान की शुरुआत की। यह अभियान गंगा किनारे बसे बिहार के 12 जिलों में चलाया जाएगा और इसका समापन कटिहार में होगा। बिहार के हितों के खिलाफ बताई संधि जदयू फरक्का जल संधि को बिहार के हितों के खिलाफ बताते हुए इसके नवीनीकरण का विरोध करेगी। पार्टी नेताओं का कहना है कि फरक्का बराज और भारत-बांग्लादेश के बीच जल बंटवारे की व्यवस्था का असर बिहार में गंगा के जल प्रवाह पर पड़ता है। जदयू इसे बाढ़, सिंचाई, पेयजल, उद्योग और रोजगार जैसे मुद्दों से जोड़ रही है। बक्सर से कटिहार तक चलेगा संवाद बक्सर को अभियान की शुरुआत के लिए इसलिए चुना गया है क्योंकि गंगा इसी क्षेत्र से बिहार में प्रवेश करती है। पार्टी की योजना गंगा किनारे बसे जिलों में जाकर लोगों को फरक्का बराज और जल संधि से जुड़े प्रभावों के बारे में जानकारी देने की है। जदयू इसे जनजागरूकता अभियान के साथ-साथ बिहार के जल अधिकार की आवाज के रूप में पेश कर रही है। संजय झा बोले- 2050 की जरूरतों का हो ध्यान जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा ने 1996 में भारत और बांग्लादेश के बीच हुई फरक्का जल संधि को बिहार के हित में नहीं बताया। उन्होंने कहा कि भविष्य में यदि कोई नई व्यवस्था बनती है तो उसमें कम से कम वर्ष 2050 तक बिहार की पानी की जरूरतों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। गाद और बाढ़ को लेकर जदयू का तर्क प्रदेश अध्यक्ष उमेश सिंह कुशवाहा ने फरक्का बराज को गंगा में गाद जमा होने और नदी का तल ऊंचा होने से जोड़ा। उनका कहना है कि इसका असर बिहार में बार-बार आने वाली बाढ़ के रूप में दिखाई देता है। जदयू का दावा है कि अंतरराष्ट्रीय जल समझौते का बड़ा बोझ बिहार को उठाना पड़ रहा है। सवाल- अब इतनी मुखर क्यों हुई जदयू? इस अभियान ने राजनीतिक बहस भी तेज कर दी है। राजनीतिक जानकार सवाल उठा रहे हैं कि फरक्का जल संधि को बिहार के लिए नुकसानदेह बताने वाली जदयू अब इस मुद्दे पर इतनी मुखर क्यों हुई है। खासकर तब, जब पार्टी लंबे समय से बिहार की सत्ता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है। जदयू हालांकि इसे राजनीतिक अभियान मानने से इनकार कर रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि यह किसी दल या सरकार के खिलाफ नहीं, बल्कि बिहार के हक और भविष्य की जल जरूरतों का सवाल है। जदयू नेतृत्व इसे केंद्र के सामने बिहार की आवाज मजबूत करने की पहल बता रहा है। बाढ़ और जल प्रबंधन से जुड़ा बड़ा सवाल फरक्का का मुद्दा केवल भारत-बांग्लादेश के बीच पानी के बंटवारे तक सीमित नहीं है। इसका संबंध बिहार की बाढ़, सिंचाई, गाद प्रबंधन, नदी के प्रवाह और जल संसाधनों की दीर्घकालिक योजना से भी है। यही वजह है कि जदयू इस मुद्दे को गंगा किनारे बसे जिलों तक ले जाकर जनभावना से जोड़ने की कोशिश कर रही है। अभियान की असली परीक्षा आगे राजनीतिक तौर पर जदयू के अभियान के दो स्पष्ट लक्ष्य नजर आते हैं। पहला, बिहार की बाढ़ और जल संकट जैसे वास्तविक मुद्दों पर केंद्र से अधिक हस्तक्षेप और हिस्सेदारी की मांग करना। दूसरा, आगामी राजनीतिक विमर्श में ‘बिहार के हक’ को प्रमुख मुद्दा बनाना। अब देखना यह होगा कि बक्सर से शुरू हुआ यह संवाद केवल सभाओं और जनजागरूकता कार्यक्रमों तक सीमित रहता है या जदयू फरक्का बराज, गाद प्रबंधन, बाढ़ नियंत्रण और बिहार के जल अधिकार को लेकर केंद्र से कोई ठोस पहल भी हासिल कर पाती है। आखिर सवाल केवल फरक्का जल संधि के विरोध का नहीं, बल्कि बाढ़ और सूखे के बीच झूलते बिहार के लिए स्थायी जल प्रबंधन की व्यवस्था का है।

