संदीप पुरोहित
भाजपा और कांग्रेस 44-44 के आंकड़े पर आमने-सामने हैं। एक सीट पर आज पुनर्मतदान होना है। अब असली खेल निर्दलीयों के इर्द-गिर्द है। दोनों ही दलों ने बहुमत जुटाने के लिए बिसात बिछा दी है। सत्ता के खेल में निर्दलीयों की बैसाखी से वैतरणी पार करना आसान काम नहीं होगा। दोनों ही दलों में बहुमत का आंकड़ा हासिल करने से पहले ही आंतरिक सत्ता संघर्ष शुरू हो चुका है। बोर्ड किसका बनेगा, यह सवाल जितना महत्वपूर्ण है, उससे कम महत्वपूर्ण यह भी नहीं है कि मेयर की कुर्सी पर कौन बैठेगा? दावेदारी और ताजपोशी के बीच निर्दलीय, क्रॉस वोङ्क्षटग और आंतरिक सत्ता संघर्ष सहित कई पेचीदा समीकरण है।
बहुमत के लिए 51 पार्षद चाहिए। दोनों दल जोड़तोड़ करके ही यह आंकड़ा जुटा सकते हैं। कांग्रेस के पास बागियों की संख्या ज्यादा बताई जा रही है। यह उसका एक तरह का एडवांटेज है। दूसरी तरफ भाजपा सत्ता में है। सरकार और शासन की ताकत उसके साथ है। जोड़तोड़ के खेल में भी वह कांग्रेस से पीछे नहीं आगे ही हैं, लेकिन बहुमत जुटाना ही पूरी कहानी नहीं है। असली चिंता उसके बाद शुरू होगी क्रॉस वोटिंग की। जिस दल के पास 51 का आंकड़ा होगा, उसे यह भरोसा भी चाहिए कि उसके पार्षद आखिरी क्षण तक उसके साथ खड़े रहें। पार्षदों की खरीद-फरोख्त की चर्चाओं का बाजार गर्म है। नैतिकता और आदर्श अब सियासी शब्दकोश से बाहर हो चुके हैं।
भाजपा और कांग्रेस दोनों में आधा-आधा दर्जन मेयर के दावेदार सामने आ चुके हैं। किसी एक के नाम पर मुहर लगती है तो दूसरे खेमे को साथ रखना पार्टी नेतृत्व के लिए बड़ी चुनौती होगी। कौन गारंटी ले सकता है कि क्रॉस वोटिंग नहीं कराएंगे। पुराने अनुभव के आधार पर कहा जा सकता है कि इसकी संभावना कांग्रेस में अधिक है, पर राजनीति में कुछ भी हो सकता है। भाजपा का घर भी कोई अभेद्य किला नहीं है। इस पूरे खेल में कांग्रेस के अंदर एक और खेल चल रहा है। चर्चा यह भी है कि हाइब्रिड व्यवस्था से एक ऐसे शख्स को मेयर के लिए लाया जाए, जिसके नाम पर निर्दलीय अल्पसंख्यक और मूल ओबीसी के पार्षद सहर्ष तैयार हो जाएं।
कांग्रेस को बहुमत जुटाने में आसानी हो जाए। पर यह फार्मूला निर्वाचित पार्षदों को रास आएगा यानी मेयर की कुर्सी पर दावेदारों की सूची जितनी दिखाई दे रही है, पर्दे के पीछे उससे कहीं बड़ी है। भाजपा भी जातिगत फार्मूले पर काम कर रही है। साथ ही ऐसे उम्मीदवार को मैदान उतारना चाह रही है, जो इस परिस्थिति में साम-दाम-दंड से निबटने में सक्षम हो। सवाल यही नहीं है कि मेयर कौन बनेगा, इससे भी बड़ा एक सवाल एक और है कि सत्ता के इस बाजार में लोकतांत्रिक मूल्य कहां है? निर्दलीयों के भाव, पार्षदों की निष्ठा, खेमेबाजी और क्रॉस वोङ्क्षटग की आशंका गर्म है। क्रॉस वोटिंग या एबसेंट रहने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।
निरीह जनता खड़ी हुई सब देख रही है। जनता ने पार्षद चुने हैं, ताकि शहर का विकास हो, न कि उनकी निष्ठाओं की नीलामी हो। सत्ता के लिए जोड़-तोड़ राजनीति का हिस्सा हो सकती है, लेकिन लोकतंत्र की मर्यादा उससे बड़ी है। साधन और साध्य दोनों पवित्र रहें, यही लोकतंत्र की असली कसौटी है। मेयर किसी का भी हो कोई फर्क नहीं पड़ता जनता तो बस यही चाहती है कि मेयर की कुर्सी तक पहुंचने का रास्ता लोकतांत्रिक मूल्यों और नैतिक मर्यादाओं से होकर जाए। कुर्सी कोई भी जीते, लोकतंत्र नहीं हारना चाहिए।
sandeep.purohit@in.patrika.com x/@sandeeppurohit

