नारियल के जूट और POP से भगवान गणेश की मूर्ति बनाई जा रहीं हैं। राजस्थान के जोधपुर के 4 परिवार गाजियाबाद में हापुड़ चुंगी के पास पिछले 40 साल से देवी देवताओं की मूर्ति बनाने का काम कर रहे हैं। पहले जहां प्राकृतिक और चिकनी मिट्टी का प्रयोग मूर्ति बनाने में किया जाता है। लेकिन नारियल का जूट मिलाकर मूर्तियों को सांचे से तैयार किया जा रहा है। जिसके बाद उन्हें हल्की धूप में सुखाया जाता है। गाजियाबाद और आसपास के क्षेत्रों में गणेश चतुर्थी के लिए गणेश भगवान की मूर्ति ऑन डिमांड भी बनवाई गईं। तस्वीरों में देखिए मूर्ति… मूर्ति बनाने की पूरी प्रक्रिया जानिए…. मूर्ति बनाने वाले अजय बताते हैं कि छतों और लिंटर के नीचे जो पीपीओ से डिजाइन बनाए जाते हैं, सबसे पहले इस पीओपी को लेते हैं। उसके बाद नारियल का जूट यानी नारियल की घास को लाया जाता है। जहां पीओपी में पानी मिलाकर इसे 2 भागों में तैयार करते हैं। यदि मूर्ति 12 इंच से बड़े आकार में बनानी होती है तो पीओपी में नारियल की घास को मिलाते हैं, जिससे मूर्ति का जमीन पर रखने वाला हिस्सा और पीछे का भाग अधिक मजबूत हो। इससे मूर्ति टूटने का डर नहीं रहता है। जब एक जगह से दूसरी जगह ले जाते हैं तो नारियल के घास की बनी हुई मूर्ति बहुत मजबूत रहती है। छोटी मूर्ति 3 घंटे में तैयार पूनम बताती हैं कि मैं भी 8 साल की उम्र से मूर्ति बना रही हूं। गणेश चतुर्थी के 3 महीने से पहले ही हमारा त्योहारा आना शुरू हो जाता है। जितनी मूर्ति अधिक बनाएंगे उतनी ही अधिक बिक्री होगी। दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों में देवी देवताओं की मूर्ति की अधिक मांग रहती है। जैसी मूर्ति बनानी होती है उनके लिए रबड का सांचा रहता है। छोटी मूर्ति 3 घंटे में बना दी जाती है, लेकिन बड़े आकार की मूर्ति को 2 से 3 दिन लगते हैं, फिर उसे सुखाया जाता है। यह बारिश का मौसम है इसलिए उसे ऐसी जगहों पर रखा जाता है जहां बारिश से मूर्ति को नुकसान न करे। पूरी सूखने के बाद टीनशेड में रखकर कलर किया जाता है। बड़े आकार की एक मूर्ति को पीओपी गूंथने से लेकर कलर सूखने तक करीब 20 से 25 दिन लगते हैं। एक भी क्लास में नहीं गए सूरज सूरज भाटी ने बताया कि मैं एक भी क्लास में स्कूल नहीं गया। हमारा यह खानदानी काम है। लेकिन बचपन से ही मूर्ति बनाता हूं। एक एक मूर्ति आज 500 रुपये से लेकर 25 हजार रुपये तक की हैं। आज कैसी भी मूर्ति बनवा लो बना दूंगा। मूर्ति पर कलर करना भी एक कला है। जितना अच्छे रंग को किया जाता है उतनी ही मूर्ति अधिक पसंद की जाती है। छोटी छोटी जगह हाथ से कलर किया जाता है, कई जगहों पर छोटी प्रेशर मशीन का सहारा लिया जाता है। कलर मिक्स भी किए जाते हैं। गणेश भगवान की मूर्ति यहां विसर्जन करते हैं इसलिए इनमें कच्चे ही कलर लगाए जाते हैं। यह कलर धूप में हल्के पड़ जाते हैं। सूरज बताते हैं कि परिवार की महिलाओं ओर बच्चों को भी मूर्ति बनाना सिखाया जाता है। गणेश भगवान की मूर्ति में टाइम अधिक लगता है सूरज भाटी बताते हैं कि पहले चिकनी मिट्टी या चीनी मिट्टी का सहारा लिया जाता था। लेकिन आज पीपीओ सभी जगह आसानी से मिल जाती है। मिट्टी को पानी से अच्छी तरह गूंथकर चिकना किया जाता है, जिससे कहीं कोई गांठ या बुलबुला न बचे। सांचे से बनाया जाता है, लेकिन पेट का गोल आकार बनाया जाता है। जहां मिट्टी की पट्टियों से कान, दोनों हाथ, सूंड को एक्सपर्ट ही बनाते हैं। मूर्ति के एक हाथ में मोदक और दूसरा आशीर्वाद मुद्रा में और फिर पैर जोड़े जाते हैं। आंखों को तैयार करने में बहुत बारीकी है।

