नदियों और तालाबों में स्नान कर पूर्वजों को जल अर्पित किया गया

नदियों और तालाबों में स्नान कर पूर्वजों को जल अर्पित किया गया

जिलेभर में शनिवार से 16 दिवसीय पितृपक्ष का शुभारंभ हुआ। पहले दिन श्रद्धालुओं ने नदियों और तालाबों में स्नान कर दिवंगत पूर्वजों को जल अर्पित किया और तर्पण किया। कई स्थानों पर पंडित-ब्राह्मणों ने विधि-विधान से अगस्त्य ऋषि को भी अर्घ्य दिलाया। पितृपक्ष के दौरान श्रद्धालु तिथि के अनुसार पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण करेंगे। पंडित संतोष चन्द्र प्रभाकर ने बताया कि भारतीय परंपरा में पितरों के प्रति श्रद्धा और सम्मान प्रकट करने के लिए श्राद्ध व तर्पण की परंपरा रही है। शास्त्रों में मनुष्य को देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण से जुड़ा बताया गया है। देव ऋण पूजन-अर्चन, ऋषि ऋण वेद-शास्त्रों के प्रचार-प्रसार और पितृ ऋण श्राद्ध व तर्पण के माध्यम से चुकाने की मान्यता है। उन्होंने बताया कि भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक चलने वाले इस पक्ष को महालय पक्ष भी कहा जाता है। मान्यता के अनुसार जल, तिल, चावल, जौ और कुश से पिंड अर्पित करने, गौ ग्रास निकालने और पितरों के निमित्त ब्राह्मणों को भोजन कराने की परंपरा है। श्राद्ध कर्म के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराने, यथोचित दक्षिणा देने और उनका आशीर्वाद लेने की भी परंपरा है। जिलेभर में शनिवार से 16 दिवसीय पितृपक्ष का शुभारंभ हुआ। पहले दिन श्रद्धालुओं ने नदियों और तालाबों में स्नान कर दिवंगत पूर्वजों को जल अर्पित किया और तर्पण किया। कई स्थानों पर पंडित-ब्राह्मणों ने विधि-विधान से अगस्त्य ऋषि को भी अर्घ्य दिलाया। पितृपक्ष के दौरान श्रद्धालु तिथि के अनुसार पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण करेंगे। पंडित संतोष चन्द्र प्रभाकर ने बताया कि भारतीय परंपरा में पितरों के प्रति श्रद्धा और सम्मान प्रकट करने के लिए श्राद्ध व तर्पण की परंपरा रही है। शास्त्रों में मनुष्य को देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण से जुड़ा बताया गया है। देव ऋण पूजन-अर्चन, ऋषि ऋण वेद-शास्त्रों के प्रचार-प्रसार और पितृ ऋण श्राद्ध व तर्पण के माध्यम से चुकाने की मान्यता है। उन्होंने बताया कि भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक चलने वाले इस पक्ष को महालय पक्ष भी कहा जाता है। मान्यता के अनुसार जल, तिल, चावल, जौ और कुश से पिंड अर्पित करने, गौ ग्रास निकालने और पितरों के निमित्त ब्राह्मणों को भोजन कराने की परंपरा है। श्राद्ध कर्म के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराने, यथोचित दक्षिणा देने और उनका आशीर्वाद लेने की भी परंपरा है।  

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