डुमरी में ‘जबर करम अखड़ा’ आयोजित:विधायक जयराम महतो मंदर की थाप पर थिरके, बोले- करमा पर्व नारी सशक्तिकरण का प्रतीक

डुमरी में ‘जबर करम अखड़ा’ आयोजित:विधायक जयराम महतो मंदर की थाप पर थिरके, बोले- करमा पर्व नारी सशक्तिकरण का प्रतीक

गिरिडीह जिले के डुमरी स्थित एसएसकेबी हाई स्कूल मैदान में रविवार को झारखंडी भाषा-खतियान संघर्ष समिति की ओर से ‘जबर करम अखड़ा’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में डुमरी विधायक जयराम कुमार महतो मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए, जबकि मोतीलाल महतो विशिष्ट अतिथि के तौर पर मौजूद रहे। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों ने हिस्सा लिया। करमा महोत्सव के दौरान पारंपरिक गीत-संगीत, नृत्य और मंदर की थाप से पूरा परिसर गूंजता रहा। कार्यक्रम में झारखंडी संस्कृति और करमा पर्व की पारंपरिक झलक देखने को मिली। इस दौरान विधायक जयराम कुमार महतो भी मंदर की थाप पर लोगों के साथ पारंपरिक नृत्य करते नजर आए। उनके नृत्य में शामिल होने पर मौजूद लोगों ने उत्साह के साथ उनका स्वागत किया। प्रकृति, नारी शक्ति और सामुदायिक एकजुटता का प्रतीक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए विधायक जयराम कुमार महतो ने कहा कि करमा पर्व नारी सशक्तिकरण और प्रकृति से जुड़ी झारखंडी संस्कृति का प्रतीक है। यह पर्व केवल धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान, भाईचारे, सामाजिक समरसता और सामुदायिक एकजुटता का संदेश भी देता है। उन्होंने कहा कि करमा पर्व की परंपराओं में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। महिलाओं की सक्रिय भागीदारी समाज में उनके सम्मान और नारी शक्ति को प्रदर्शित करती है। विधायक ने कहा कि झारखंड की पहचान यहां की भाषा, संस्कृति, परंपरा और सामुदायिक जीवन से जुड़ी हुई है। ऐसे आयोजनों के माध्यम से समृद्ध संस्कृति और परंपराओं को जीवंत रखने के साथ नई पीढ़ी को भी अपनी जड़ों से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। गीत-संगीत और नृत्य से सजी शाम कार्यक्रम के दौरान पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ करमा पर्व मनाया गया। लोगों ने पारंपरिक गीत-संगीत और नृत्य के माध्यम से झारखंड की लोक संस्कृति की झलक पेश की। मंदर की थाप और लोकगीतों के बीच लोगों ने उत्साह के साथ पर्व मनाया। आयोजन स्थल पर मौजूद लोगों में पूरे कार्यक्रम को लेकर खासा उत्साह देखने को मिला। आयोजकों ने कहा कि झारखंडी भाषा, संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण के लिए इस तरह के कार्यक्रम आगे भी आयोजित किए जाते रहेंगे। ऐसे आयोजनों के माध्यम से स्थानीय लोक परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने और लोगों को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का प्रयास जारी रहेगा। गिरिडीह जिले के डुमरी स्थित एसएसकेबी हाई स्कूल मैदान में रविवार को झारखंडी भाषा-खतियान संघर्ष समिति की ओर से ‘जबर करम अखड़ा’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में डुमरी विधायक जयराम कुमार महतो मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए, जबकि मोतीलाल महतो विशिष्ट अतिथि के तौर पर मौजूद रहे। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों ने हिस्सा लिया। करमा महोत्सव के दौरान पारंपरिक गीत-संगीत, नृत्य और मंदर की थाप से पूरा परिसर गूंजता रहा। कार्यक्रम में झारखंडी संस्कृति और करमा पर्व की पारंपरिक झलक देखने को मिली। इस दौरान विधायक जयराम कुमार महतो भी मंदर की थाप पर लोगों के साथ पारंपरिक नृत्य करते नजर आए। उनके नृत्य में शामिल होने पर मौजूद लोगों ने उत्साह के साथ उनका स्वागत किया। प्रकृति, नारी शक्ति और सामुदायिक एकजुटता का प्रतीक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए विधायक जयराम कुमार महतो ने कहा कि करमा पर्व नारी सशक्तिकरण और प्रकृति से जुड़ी झारखंडी संस्कृति का प्रतीक है। यह पर्व केवल धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान, भाईचारे, सामाजिक समरसता और सामुदायिक एकजुटता का संदेश भी देता है। उन्होंने कहा कि करमा पर्व की परंपराओं में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। महिलाओं की सक्रिय भागीदारी समाज में उनके सम्मान और नारी शक्ति को प्रदर्शित करती है। विधायक ने कहा कि झारखंड की पहचान यहां की भाषा, संस्कृति, परंपरा और सामुदायिक जीवन से जुड़ी हुई है। ऐसे आयोजनों के माध्यम से समृद्ध संस्कृति और परंपराओं को जीवंत रखने के साथ नई पीढ़ी को भी अपनी जड़ों से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। गीत-संगीत और नृत्य से सजी शाम कार्यक्रम के दौरान पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ करमा पर्व मनाया गया। लोगों ने पारंपरिक गीत-संगीत और नृत्य के माध्यम से झारखंड की लोक संस्कृति की झलक पेश की। मंदर की थाप और लोकगीतों के बीच लोगों ने उत्साह के साथ पर्व मनाया। आयोजन स्थल पर मौजूद लोगों में पूरे कार्यक्रम को लेकर खासा उत्साह देखने को मिला। आयोजकों ने कहा कि झारखंडी भाषा, संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण के लिए इस तरह के कार्यक्रम आगे भी आयोजित किए जाते रहेंगे। ऐसे आयोजनों के माध्यम से स्थानीय लोक परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने और लोगों को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का प्रयास जारी रहेगा।  

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