झुंझुनूं जिला प्रमुख का पद ‘अनारक्षित महिला’ वर्ग के लिए आरक्षित हुआ है। पिछली बार यह पद ओबीसी महिला वर्ग के लिए आरक्षित था। आरक्षण में इस बदलाव के साथ ही भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों में संभावित महिला चेहरों को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। आरक्षण सूची जारी होते ही राजनीतिक दलों के भीतर टिकट के दावेदार सक्रिय हो गए हैं। अब तक जहां मुकाबला सीमित दायरे में था। अब अनारक्षित महिला सीट होने से राजनीतिक संभावनाओं का दायरा काफी बढ़ गया है। आरक्षण बदला, बदला चुनावी गणित आरक्षण में बदलाव का सीधा असर संभावित उम्मीदवारों की संख्या और राजनीतिक समीकरणों पर पड़ा है। अब केवल किसी एक वर्ग तक सीमित रहने के बजाय सभी वर्गों की महिलाएं नियमानुसार चुनाव लड़ सकती हैं। इससे भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने उम्मीदवार चयन पहले से अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है। दावेदारी का दायरा बढ़ा, कई नए चेहरे चर्चा में पिछले चुनाव में ओबीसी महिला आरक्षण होने के कारण दावेदारी सीमित थी, लेकिन अब सामान्य, ओबीसी, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग की महिलाएं भी इस सीट पर दावेदारी कर सकेंगी। इससे कई नेता सक्रिय हो गए है, जो पहले आरक्षण की वजह से चुनाव दौड़ से बाहर थे। भाजपा के सामने साख बचाने की चुनौती वर्तमान में जिला परिषद पर भाजपा का कब्जा है। ऐसे में पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने प्रदर्शन के आधार पर जिला प्रमुख की कुर्सी बरकरार रखने की होगी। भाजपा संगठन ऐसा चेहरा तलाशेगा जो ग्रामीण क्षेत्रों में मजबूत पकड़ रखता हो और जिला परिषद सदस्यों के बीच स्वीकार्य भी हो। पार्टी के लिए केवल चुनाव जीतना ही नहीं, बल्कि संगठनात्मक संतुलन बनाए रखना भी बड़ी चुनौती होगी, क्योंकि सीट बदलने के बाद कई नए दावेदार सामने आएंगे। टिकट वितरण होगा सबसे कठिन इस बार दोनों प्रमुख दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती टिकट वितरण होगी। आरक्षण का दायरा बढ़ने के कारण दावेदारों की संख्या भी बढ़ेगी। टिकट नहीं मिलने की स्थिति में बगावत या निर्दलीय उम्मीदवारों के मैदान में उतरने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। अब नजर जिला परिषद वार्डों के आरक्षण पर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जिला प्रमुख पद का आरक्षण तय होने के बाद अब सबसे अधिक नजर जिला परिषद वार्डों के परिसीमन और वार्ड वार आरक्षण सूची पर रहेगी। असली चुनावी तस्वीर तब साफ होगी। जब यह स्पष्ट होगा कि कौन-कौन से प्रमुख नेता या उनके समर्थक किन वार्डों से चुनाव लड़ पाएंगे। वार्डों के आरक्षण के बाद ही यह तय होगा कि जिला परिषद में किस दल की स्थिति मजबूत बन सकती है और जिला प्रमुख पद की वास्तविक लड़ाई किन चेहरों के बीच सिमटेगी।


