गुरुग्राम में नगर निगम को सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद ₹25,000 करोड़ मूल्य की 272 एकड़ प्राइम लैंड का मालिकाना हक मिल गया है। राजस्व रिकॉर्ड में यह जमीन गैर मुमकिन पहाड़, नाले और जोहड़ के रूप में दर्ज है। अब अधिकारी करीब 700 एकड़ अन्य बेशकीमती जमीनों को अपने कब्जे में लेने मास्टरप्लान तैयार किया है। इन जमीनों की कुल अनुमानित बाजार कीमत लगभग ₹2 लाख करोड़ आंकी जा रही है। निगम के रडार पर सबसे बड़ा हिस्सा बजघेड़ा, घाटा, ग्वाल पहाड़ी, हरसरू, पावला खुसपुर, बाबूपुर, टिकरी, नाथूपुर, और बादशाहपुर गांव की जमीन है। इनमें अकेले बजघेड़ा गांव में करीब 225 एकड़ जमीन मौजूद है, जिसकी वर्तमान मार्केट वैल्यू ₹1 लाख करोड़ से भी ज्यादा है। यह पूरी जमीन पहले ग्राम पंचायत के स्वामित्व में थी। करीब इतनी ही जमीन ग्वाल पहाड़ी गांव की भी है। दरअसल, नगर निगम की सीमा विस्तार के बाद यह क्षेत्र निगम के अधीन आ गया, लेकिन लंबे समय से इस पर स्थानीय भू-माफियाओं और लोगों ने अवैध कब्जे कर रखे हैं। निगम अब राजस्व रिकॉर्ड दुरुस्त कर इस पूरी जमीन को कब्जामुक्त कराने की रणनीति पर काम कर रहा है। लैंड बैंक बनाकर सुरक्षित की जाएगी जमीन 272 एकड़ जमीन हासिल करने के बाद, निगम की योजना कुल 700 एकड़ अतिरिक्त जमीन पर अपना दावा मजबूत करने की है। शहर के अन्य हिस्सों में भी लगभग 700 एकड़ ऐसी सरकारी जमीनें चिह्नित की गई हैं जो पंचायत काल से चली आ रही हैं या जिन पर अवैध निर्माण हो चुके हैं। इन सभी को मिलाकर निगम विशाल लैंड बैंक तैयार करने जा रहा है। एमसीजी होगी मालामाल, विकास कार्यों को मिलेगी नई रफ्तार अधिकारियों का कहना है कि इतनी बड़ी और मूल्यवान संपत्ति खाते में आने से नगर निगम का फाइनेंशियल इन्फ्रास्ट्रक्चर पूरी तरह बदल जाएगा। वर्तमान में निगम द्वारा विकास परियोजनाओं के लिए बजट को ध्यान में रखकर प्लानिंग की जाती है। बेशकीमती प्रॉपर्टी मिलने के बाद निगम का खजाना पूरी तरह भर जाएगा। इन जमीनों का उपयोग शहर में विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचे, नए पार्कों, कमर्शियल हब और जन-सुविधाओं को विकसित करने के लिए किया जाएगा। जानिए बेचिराग गांव की बेशकीमती जमीन की कहानी… एक ऐसा गांव जहां आबादी नहीं, लेकिन मुकदमों की भरमार हैदरपुर में कोई आबादी नहीं थी और न ही इसकी अलग पंचायत थी। जमीन के दावेदार इसी आधार पर इसे पंचायत की जमीन मानने से इनकार करते रहे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के सामने रखे दस्तावेजों से पता चला कि हैदरपुर को शुरू से ही वजीराबाद के साथ एक ही ग्राम सभा और ग्राम पंचायत का हिस्सा माना गया था। इसका रिकॉर्ड 1983 की हरियाणा सरकार की अधिसूचना और उससे पहले 1939 के पंजाब ग्राम पंचायत अधिनियम तक मिलता है। सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला साल 2007 में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने निजी खरीदारों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा था कि पंचायत यह साबित नहीं कर पाई कि इस जमीन का इस्तेमाल ग्रामीणों के साझा काम के लिए होता था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने हाई कोर्ट के आदेश को खारिज कर दिया। शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की कि “जमीन आज के समय का ‘नया सोना’ बन चुकी है”। कोर्ट ने साफ किया कि सिर्फ राजस्व रिकॉर्ड में पुराने नाम होने से कोई सार्वजनिक जमीन निजी नहीं हो जाती और 70 साल पुराना हक बहाल करते हुए इसे नगर निगम गुरुग्राम को सौंप दिया।


