‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ के 25 साल पूरे होने पर भावुक हुईं स्मृति ईरानी, बोलीं- घरेलू हिंसा पर बदला नजरिया

‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ के 25 साल पूरे होने पर भावुक हुईं स्मृति ईरानी, बोलीं- घरेलू हिंसा पर बदला नजरिया

Kyunki Saas Bhi Kabhi Bahu Thi completed 25 years: भारतीय टेलीविजन इतिहास के सबसे आइकॉनिक धारावाहिकों में से एक ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ के टेलीकास्ट को 25 साल पूरे हो गए हैं। इस खास मौके पर टीवी की सबसे लोकप्रिय बहू ‘तुलसी विरानी’ यानी पूर्व केंद्रीय मंत्री और अभिनेत्री स्मृति ईरानी (Smriti Irani) ने एक बेहद खास और भावुक संदेश शेयर किया है। उन्होंने न सिर्फ अपने किरदार के सामाजिक प्रभाव को याद किया, बल्कि शो की निर्माता एकता कपूर (Ekta Kapoor) को लेकर भी बयान दिया। साथ ही उन्होंने कहा कि इस शो ने समाज का नजरिया बदला।

स्मृति ईरानी ने शेयर किया वीडियो

स्मृति ईरानी ने अपने आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट पर हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्रियों द्वारा किए गए एक रिसर्च “द पावर ऑफ टीवी: केबल टेलीविजन एंड विमेन्स स्टेटस इन इंडिया” से जुड़ा एक वीडियो री-शेयर किया है।

इस पोस्ट के साथ शेयर किए गए भावुक कैप्शन में स्मृति ने लिखा, “पच्चीस साल पहले, तुलसी विरानी भारत के लिविंग रूम में आई थीं। उस समय हम दोनों में से किसी को भी यह अंदाजा नहीं था कि यह किरदार कितना लंबा सफर तय करेगा। उनके पीछे एक और युवा महिला खड़ी थी जो टीवी की दुनिया की सोच बदल रही थी— एकता कपूर। वह एक ऐसी विजनरी प्रोड्यूसर थीं, जिन्होंने अपनी सोच पर भरोसा किया, महिलाओं को प्राइम-टाइम टेलीविज़न के केंद्र में स्थापित किया और भारतीय मनोरंजन का पूरा ग्रामर ही बदलकर रख दिया।”

हार्वर्ड की रिसर्च: टीवी से बदला ग्रामीण भारत में महिलाओं का जीवन

स्मृति ईरानी ने ग्रामीण भारत में केबल टीवी के प्रसार पर हुए एकेडमिक रिसर्च पर रोशनी डालते हुए बताया कि कैसे एकता कपूर के धारावाहिकों ने जमीनी स्तर पर सामाजिक सोच को बदलने का काम किया। रिसर्च में पाया गया कि टेलीविजन के संपर्क में आने से ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की शिक्षा, उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और घरेलू हिंसा के खिलाफ उनकी सोच में पॉजिटिव बदलाव आया है।

स्मृति ईरानी ने बताई टीवी की ताकत

स्मृति ने आगे लिखा, “कहानियां सिर्फ समाज को नहीं दर्शातीं, बल्कि वह चुपके से समाज में जो संभव है उसका दायरा भी बढ़ाती हैं। एक काल्पनिक किरदार किसी सामाजिक सीमा पर सवाल उठा सकता है, इससे पहले कि कोई महिला अपनी असल जिंदगी में उस पर सवाल उठाने की हिम्मत जुटा पाए। टीवी देख रही किसी छोटी बच्ची को एक ऐसी संभावना का पता चल सकता है, जिसके बारे में उसने कभी सोचा भी नहीं था। आज तुलसी को देखने वाली महिलाएं अपनी बेटियों की परवरिश कर रही हैं। एपिसोड भले ही खत्म हो जाते हैं, लेकिन कहानियां हमेशा जारी रहती हैं।”

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