आरक्षण के मौजूदा प्रावधानों की समीक्षा हो या नहीं, इस पर बिहार में सियासी तकरार बढ़ गई है। चिराग पासवान और जीतन राम मांझी दलित कोटे में कोटा पर आमने-सामने हैं तो BJP के मंत्री लखेंद्र पासवान ने दोनों पर निशाना साधा है। वहीं, तेजस्वी यादव ने दोनों को जनरल सीट से चुनाव लड़ने का चैलेंज दे दिया है। जबकि, उनकी पार्टी RJD के बिहार अध्यक्ष मंगनीलाल मंडल ने रिजर्वेशन में रिव्यू की मांग की है। रिजर्वेशन पर बढ़ते तकरार के बीच आज बूझे की नाही में…जानिए, दलित और OBC के बनने और देश में रिजर्वेशन लागू होने की कहानी…। 7 अगस्त 1990। दोपहर का वक्त। लोकसभा में तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह (वीपी सिंह) अपना भाषण देने के लिए खड़ा हुए। उन्होंने भाषण की शुरुआत में ही अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए केंद्रीय नौकरियों में 27% आरक्षण लागू करने का ऐलान कर दिया। सीनियर जर्नलिस्ट नीरजा चौधरी की ‘हाउ प्राइम मिनिस्टर्स डिसाइड’ और रामचंद्र गुहा की ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ किताब के मुताबिक… ‘गोपालगंज टू रायसीना: माई पॉलिटिकल जर्नी’ में RJD सुप्रीमो लालू यादव ने लिखा है… संकर्षन ठाकुर अपनी किताब ‘Subaltern Saheb: Bihar and the Making of Laloo Yadav’ में लिखते हैं, ‘उस वक्त वीपी सिंह की सरकार में शरद यादव कपड़ा और कपड़ा प्रसंस्करण मंत्री तथा राम विलास पासवान श्रम एवं कल्याण मंत्री थे। दोनों लगातार सरकार पर मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करने का दबाव बना रहे थे। जब देवी लाल ने सरकार से अलग होकर रैली का ऐलान किया, तो दोनों नेताओं ने वीपी सिंह को यह अहसास कराया कि मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करने से उन्हें पिछड़े वर्गों का अटूट समर्थन मिलेगा, जिससे देवी लाल का दबदबा खत्म हो जाएगा।’ देशभर में हुआ विरोध, लेकिन नहीं झुकी सरकार 1989 लोकसभा चुनाव में मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू करने का वादा करके सत्ता में आए वीपी सिंह ने जैसे ही इसे लागू किया पूरे देश में इसका विरोध शुरू हो गया, लेकिन सरकार नहीं झुकी और 13 अगस्त को इसकी अधिसूचना भी जारी कर दी। इसके बाद पूरे देश में आरक्षण विरोधी आंदोलन और तेज हो गए। वीपी सिंह के लिए लगने वाले नारे, ‘राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है’ अब ‘राजा नहीं रंक है, देश का कलंक है’, में बदल चुके थे। एक विरोध प्रदर्शन में दिल्ली यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट राजीव गोस्वामी ने खुद को आग लगा ली। BJP उस वक्त सरकार को बाहर से समर्थन दे रही थी। 16 नवंबर 1992 को सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने सरकार के इस फैसले पर मुहर लगा दी, जिसके बाद इसे पूरी तरह से लागू कर दिया गया। दरअसल… पूर्व राष्ट्रपति अपनी किताब ‘द कोएलिशन इयर्स’ में लिखते हैं… मंडल कमीशन ने दिसंबर 1980 में अपनी रिपोर्ट पेश की। इसमें विभिन्न धर्मों से करीब साढ़े तीन हजार पिछड़े समूह चिह्नित किए गए। कमीशन ने सरकारी नौकरियों में इन्हें 27% आरक्षण देने की सिफारिश की। अभिनव चंद्रचूड़ अपनी किताब ‘दीज सीट्स आर रिजर्व्ड: कास्ट, कोट्स एंड द कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ इंडिया’ में लिखते हैं… कमेटी ने किसी जाति को पिछड़े वर्ग से हटाने की भी व्यवस्था दी। इसके लिए पिछड़ा वर्ग बोर्ड बनाने के लिए 3 शर्तें रखी गईं.. बॉम्बे सरकार ने मई 1933 में कमेटी की सिफारिशें लागू कर दीं। पिछड़े वर्ग को 1945-46 तक मुख्यतः 4 लाभ दिए गए… साल 1934 में संबंधित विभाग की सालाना रिपोर्ट में शोषित वर्ग के लिए पहली बार ‘अनुसूचित वर्ग’ शब्द का इस्तेमाल किया गया। इसके बाद भारत सरकार अधिनियम, 1935 में ‘शोषित (अछूत) वर्ग’ को ‘अनुसूचित जाति’ कहा गया। साथ ही अनुसूचित जातियों के लिए प्रांतीय विधान परिषदों में कुल 151 सीटें (पूना समझौते से तीन अधिक) और केंद्रीय विधायिका की 25 सीटें आरक्षित कर दी गईं। सरकारी नौकरियों में मुसलमानों के लिए 25% सीटें पहले से ही आरक्षित थीं। ऐसे में योग्यता के आधार पर अनुसूचित जातियों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण भी तय हुआ। दलितों पर भिड़े गांधी और अंबेडकर ब्रिटिश सरकार ने 16 अगस्त 1932 को दलितों को लिए अलग निर्वाचन मंडल की घोषणा की थी। इसके विरोध में महात्मा गांधी ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमसे मैक्डोनाल्ड को लिखी चिट्टी में कहा कि वे अपनी जान देकर भी इसका विरोध करेंगे। आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की मांग बड़ी लंबी रही है। मंडल आयोग ने भी इसकी अनुशंसा की थी। 2019 में आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू होने से पहले 21 बार प्राइवेट मेंबर बिल लाया जा चुका था। नरसिम्हा राव सरकार ने भी 1992 में इसके लिए नोटिफिकेशन जारी किया था, लेकिन संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण का प्रावधान न होने से सुप्रीम कोर्ट ने इसे निरस्त कर दिया था। मोदी सरकार ने इसके लिए 2019 में 103वां संविधान संशोधन किया। इससे संविधान में आर्टिकल 15(6) जोड़कर राज्य को आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए कानून बनाने का अधिकार दिया गया। वहीं, आर्टिकल 16 (6) जोड़कर EWS को 10% आरक्षण देने का प्रावधान किया गया। सरकार के इस फैसले के खिलाफ भी सुप्रीम कोर्ट में 40 से अधिक याचिकाएं दाखिल हुईं। दलील दी गई कि EWS आरक्षण संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ है, लेकिन नवंबर 2022 में फैसला सुनाते हुए संविधान पीठ ने इसे वैध घोषित कर दिया। 1947 में देश की आजादी के बाद भी आरक्षण की कहानी जारी रही। संविधान सभा में सवाल उठा कि आजादी के बाद आरक्षण की जरूरत क्या है? सभी देशवासी मिलकर देश चलाएंगे। आरक्षण के विरोध में उठते स्वरों को देख एक सलाहकार समिति गठित की गई। समिति ने विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों को आरक्षण दिए जाने की सिफारिश की। चर्चा के दौरान मद्रास से निर्वाचित एस. नागप्पा ने कहा, ‘मैं आरक्षण खत्म के लिए तैयार हूं, बशर्ते हरिजन परिवारों को 10 एकड़ दलदली और 20 एकड़ सूखी जमीन मिले। हरिजन बच्चों को यूनिवर्सिटी स्तर तक की शिक्षा फ्री हो। सिविल और सेना में प्रमुख पदों का पांचवां हिस्सा उन्हें दिया जाए।’ संविधान सभा में आरक्षण देने के आधार पर भी बहस हुई। केएम मुंशी ने शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों को इसमें शामिल करने की मांग की। इन सबके बाद भी लंबी बहस चली और अंत में तय हुआ कि आर्थिक आधार पर आरक्षण देना ठीक नहीं है क्योंकि इसका उद्देश्य गरीबी हटाना नहीं बल्कि छुआछूत जैसे भेदभाव को खत्म करना है। संविधान सभा में तय हुआ कि जातियों को उनके सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण दिया जाएगा। अब सवाल था कि आरक्षण कब तक दिया जाना चाहिए? इस पर संविधान सभा के सदस्य हृदयनाथ कुंजरू ने कहा कि संविधान लागू होने के बाद 10 साल तक आरक्षण देने में कोई बाधा नहीं होगी, लेकिन ये प्रावधान हमेशा के लिए नहीं लागू होने चाहिए। समय-समय पर इसकी जांच होनी चाहिए कि पिछड़े तबके की स्थिति में बदलाव आ रहा है या नहीं। कुछ अन्य सदस्यों ने इस पर सहमति जताई। साथ ही राय दी कि जरूरत पड़ने पर इस अवधि को आगे बढ़ाने का भी प्रावधान हो। वहीं, कुछ सदस्यों का मत था कि आरक्षण हमेशा के लिए लागू किया जाए। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इस पर अपना पक्ष रखते हुए कहा, ‘मुसलमानों को 1892 से और ईसाईयों को 1920 से सुविधाएं मिली हुई हैं। अनुसूचित जाति को 1937 से ही कुछ लाभ मिल रहे हैं। इसलिए उन्हें ज्यादा लंबे वक्त सुविधाएं दी जानी चाहिए। चूंकि एक बार में 10 साल तक के लिए रिजर्वेशन का प्रस्ताव पास हो चुका है, तो मैं इसे स्वीकार करता हूं। हालांकि इसे बढ़ाने का ऑप्शन हमेशा रहना चाहिए।’ इस तरह तय हुआ कि हर 10 साल बाद रिजर्वेशन की समीक्षा होगी और तय होगा कि इसे आगे जारी रखना है या नहीं। गौरतलब है कि 10 साल की यह व्यवस्था सिर्फ राजनीतिक आरक्षण यानी संसद और विधानसभा सीटों के लिए निर्धारित की गई है नौकरी और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण की समय सीमा का उल्लेख संविधान में नहीं है। आरक्षण के मौजूदा प्रावधानों की समीक्षा हो या नहीं, इस पर बिहार में सियासी तकरार बढ़ गई है। चिराग पासवान और जीतन राम मांझी दलित कोटे में कोटा पर आमने-सामने हैं तो BJP के मंत्री लखेंद्र पासवान ने दोनों पर निशाना साधा है। वहीं, तेजस्वी यादव ने दोनों को जनरल सीट से चुनाव लड़ने का चैलेंज दे दिया है। जबकि, उनकी पार्टी RJD के बिहार अध्यक्ष मंगनीलाल मंडल ने रिजर्वेशन में रिव्यू की मांग की है। रिजर्वेशन पर बढ़ते तकरार के बीच आज बूझे की नाही में…जानिए, दलित और OBC के बनने और देश में रिजर्वेशन लागू होने की कहानी…। 7 अगस्त 1990। दोपहर का वक्त। लोकसभा में तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह (वीपी सिंह) अपना भाषण देने के लिए खड़ा हुए। उन्होंने भाषण की शुरुआत में ही अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए केंद्रीय नौकरियों में 27% आरक्षण लागू करने का ऐलान कर दिया। सीनियर जर्नलिस्ट नीरजा चौधरी की ‘हाउ प्राइम मिनिस्टर्स डिसाइड’ और रामचंद्र गुहा की ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ किताब के मुताबिक… ‘गोपालगंज टू रायसीना: माई पॉलिटिकल जर्नी’ में RJD सुप्रीमो लालू यादव ने लिखा है… संकर्षन ठाकुर अपनी किताब ‘Subaltern Saheb: Bihar and the Making of Laloo Yadav’ में लिखते हैं, ‘उस वक्त वीपी सिंह की सरकार में शरद यादव कपड़ा और कपड़ा प्रसंस्करण मंत्री तथा राम विलास पासवान श्रम एवं कल्याण मंत्री थे। दोनों लगातार सरकार पर मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करने का दबाव बना रहे थे। जब देवी लाल ने सरकार से अलग होकर रैली का ऐलान किया, तो दोनों नेताओं ने वीपी सिंह को यह अहसास कराया कि मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करने से उन्हें पिछड़े वर्गों का अटूट समर्थन मिलेगा, जिससे देवी लाल का दबदबा खत्म हो जाएगा।’ देशभर में हुआ विरोध, लेकिन नहीं झुकी सरकार 1989 लोकसभा चुनाव में मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू करने का वादा करके सत्ता में आए वीपी सिंह ने जैसे ही इसे लागू किया पूरे देश में इसका विरोध शुरू हो गया, लेकिन सरकार नहीं झुकी और 13 अगस्त को इसकी अधिसूचना भी जारी कर दी। इसके बाद पूरे देश में आरक्षण विरोधी आंदोलन और तेज हो गए। वीपी सिंह के लिए लगने वाले नारे, ‘राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है’ अब ‘राजा नहीं रंक है, देश का कलंक है’, में बदल चुके थे। एक विरोध प्रदर्शन में दिल्ली यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट राजीव गोस्वामी ने खुद को आग लगा ली। BJP उस वक्त सरकार को बाहर से समर्थन दे रही थी। 16 नवंबर 1992 को सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने सरकार के इस फैसले पर मुहर लगा दी, जिसके बाद इसे पूरी तरह से लागू कर दिया गया। दरअसल… पूर्व राष्ट्रपति अपनी किताब ‘द कोएलिशन इयर्स’ में लिखते हैं… मंडल कमीशन ने दिसंबर 1980 में अपनी रिपोर्ट पेश की। इसमें विभिन्न धर्मों से करीब साढ़े तीन हजार पिछड़े समूह चिह्नित किए गए। कमीशन ने सरकारी नौकरियों में इन्हें 27% आरक्षण देने की सिफारिश की। अभिनव चंद्रचूड़ अपनी किताब ‘दीज सीट्स आर रिजर्व्ड: कास्ट, कोट्स एंड द कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ इंडिया’ में लिखते हैं… कमेटी ने किसी जाति को पिछड़े वर्ग से हटाने की भी व्यवस्था दी। इसके लिए पिछड़ा वर्ग बोर्ड बनाने के लिए 3 शर्तें रखी गईं.. बॉम्बे सरकार ने मई 1933 में कमेटी की सिफारिशें लागू कर दीं। पिछड़े वर्ग को 1945-46 तक मुख्यतः 4 लाभ दिए गए… साल 1934 में संबंधित विभाग की सालाना रिपोर्ट में शोषित वर्ग के लिए पहली बार ‘अनुसूचित वर्ग’ शब्द का इस्तेमाल किया गया। इसके बाद भारत सरकार अधिनियम, 1935 में ‘शोषित (अछूत) वर्ग’ को ‘अनुसूचित जाति’ कहा गया। साथ ही अनुसूचित जातियों के लिए प्रांतीय विधान परिषदों में कुल 151 सीटें (पूना समझौते से तीन अधिक) और केंद्रीय विधायिका की 25 सीटें आरक्षित कर दी गईं। सरकारी नौकरियों में मुसलमानों के लिए 25% सीटें पहले से ही आरक्षित थीं। ऐसे में योग्यता के आधार पर अनुसूचित जातियों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण भी तय हुआ। दलितों पर भिड़े गांधी और अंबेडकर ब्रिटिश सरकार ने 16 अगस्त 1932 को दलितों को लिए अलग निर्वाचन मंडल की घोषणा की थी। इसके विरोध में महात्मा गांधी ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमसे मैक्डोनाल्ड को लिखी चिट्टी में कहा कि वे अपनी जान देकर भी इसका विरोध करेंगे। आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की मांग बड़ी लंबी रही है। मंडल आयोग ने भी इसकी अनुशंसा की थी। 2019 में आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू होने से पहले 21 बार प्राइवेट मेंबर बिल लाया जा चुका था। नरसिम्हा राव सरकार ने भी 1992 में इसके लिए नोटिफिकेशन जारी किया था, लेकिन संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण का प्रावधान न होने से सुप्रीम कोर्ट ने इसे निरस्त कर दिया था। मोदी सरकार ने इसके लिए 2019 में 103वां संविधान संशोधन किया। इससे संविधान में आर्टिकल 15(6) जोड़कर राज्य को आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए कानून बनाने का अधिकार दिया गया। वहीं, आर्टिकल 16 (6) जोड़कर EWS को 10% आरक्षण देने का प्रावधान किया गया। सरकार के इस फैसले के खिलाफ भी सुप्रीम कोर्ट में 40 से अधिक याचिकाएं दाखिल हुईं। दलील दी गई कि EWS आरक्षण संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ है, लेकिन नवंबर 2022 में फैसला सुनाते हुए संविधान पीठ ने इसे वैध घोषित कर दिया। 1947 में देश की आजादी के बाद भी आरक्षण की कहानी जारी रही। संविधान सभा में सवाल उठा कि आजादी के बाद आरक्षण की जरूरत क्या है? सभी देशवासी मिलकर देश चलाएंगे। आरक्षण के विरोध में उठते स्वरों को देख एक सलाहकार समिति गठित की गई। समिति ने विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों को आरक्षण दिए जाने की सिफारिश की। चर्चा के दौरान मद्रास से निर्वाचित एस. नागप्पा ने कहा, ‘मैं आरक्षण खत्म के लिए तैयार हूं, बशर्ते हरिजन परिवारों को 10 एकड़ दलदली और 20 एकड़ सूखी जमीन मिले। हरिजन बच्चों को यूनिवर्सिटी स्तर तक की शिक्षा फ्री हो। सिविल और सेना में प्रमुख पदों का पांचवां हिस्सा उन्हें दिया जाए।’ संविधान सभा में आरक्षण देने के आधार पर भी बहस हुई। केएम मुंशी ने शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों को इसमें शामिल करने की मांग की। इन सबके बाद भी लंबी बहस चली और अंत में तय हुआ कि आर्थिक आधार पर आरक्षण देना ठीक नहीं है क्योंकि इसका उद्देश्य गरीबी हटाना नहीं बल्कि छुआछूत जैसे भेदभाव को खत्म करना है। संविधान सभा में तय हुआ कि जातियों को उनके सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण दिया जाएगा। अब सवाल था कि आरक्षण कब तक दिया जाना चाहिए? इस पर संविधान सभा के सदस्य हृदयनाथ कुंजरू ने कहा कि संविधान लागू होने के बाद 10 साल तक आरक्षण देने में कोई बाधा नहीं होगी, लेकिन ये प्रावधान हमेशा के लिए नहीं लागू होने चाहिए। समय-समय पर इसकी जांच होनी चाहिए कि पिछड़े तबके की स्थिति में बदलाव आ रहा है या नहीं। कुछ अन्य सदस्यों ने इस पर सहमति जताई। साथ ही राय दी कि जरूरत पड़ने पर इस अवधि को आगे बढ़ाने का भी प्रावधान हो। वहीं, कुछ सदस्यों का मत था कि आरक्षण हमेशा के लिए लागू किया जाए। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इस पर अपना पक्ष रखते हुए कहा, ‘मुसलमानों को 1892 से और ईसाईयों को 1920 से सुविधाएं मिली हुई हैं। अनुसूचित जाति को 1937 से ही कुछ लाभ मिल रहे हैं। इसलिए उन्हें ज्यादा लंबे वक्त सुविधाएं दी जानी चाहिए। चूंकि एक बार में 10 साल तक के लिए रिजर्वेशन का प्रस्ताव पास हो चुका है, तो मैं इसे स्वीकार करता हूं। हालांकि इसे बढ़ाने का ऑप्शन हमेशा रहना चाहिए।’ इस तरह तय हुआ कि हर 10 साल बाद रिजर्वेशन की समीक्षा होगी और तय होगा कि इसे आगे जारी रखना है या नहीं। गौरतलब है कि 10 साल की यह व्यवस्था सिर्फ राजनीतिक आरक्षण यानी संसद और विधानसभा सीटों के लिए निर्धारित की गई है नौकरी और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण की समय सीमा का उल्लेख संविधान में नहीं है।

