Bombay High Court: ऑपरेशन सिंदूर को लेकर इंस्टाग्राम पर विवादित पोस्ट दोबारा साझा करने के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने 20 वर्षीय इंजीनियरिंग छात्रा के खिलाफ दर्ज FIR रद्द कर दी है। न्यायमूर्ति मिलिंद जाधव की एकल पीठ ने मामले पर सुनवाई करते हुए कहा कि छात्रा की उम्र, उसकी भूमिका और घटना के बाद उसके व्यवहार को ध्यान में रखना जरूरी है।
अदालत ने यह भी माना कि छात्रा ने मूल पोस्ट तैयार नहीं की थी। उसने सोशल मीडिया पर पहले से मौजूद सामग्री को केवल दोबारा शेयर किया था। कोर्ट के मुताबिक, पोस्ट विवादित थी और उससे लोगों की भावनाएं आहत होने की आशंका थी, लेकिन इस आधार पर ही किसी के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाना उचित नहीं है।
दो घंटे के अंदर हटाई पोस्ट, जताया अफसोस
मामले में छात्रा ने 7 मई 2025 को इंस्टाग्राम पर ‘रिफॉर्मिस्तान’ नाम के अकाउंट से एक पोस्ट दोबारा साझा की थी। इसमें भारत सरकार की पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई और युद्ध से जुड़े मुद्दों की आलोचना की गई थी। पोस्ट सामने आने के बाद छात्रा को धमकियां मिलने लगी। छात्रा ने करीब दो घंटे के भीतर पोस्ट हटा दी। उसने सार्वजनिक रूप से खेद जताते हुए सामग्री दोबारा साझा करने के लिए माफी भी मांगी। हाईकोर्ट ने इस बात पर गौर किया कि पोस्ट हटाने का फैसला छात्रा ने खुद लिया था, न कि जांच एजेंसी के निर्देश पर।
‘युवा छात्रा को एक मौका देना जरूरी’
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति मिलिंद जाधव ने कहा कि याचिकाकर्ता एक युवा इंजीनियरिंग छात्रा है और उसे अपनी गलती सुधारने का अवसर दिया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि छात्रा पहले ही हिरासत में रह चुकी है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि इस तरह की गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई किसी युवा छात्र के लिए ऐसा अनुभव हो सकती है, जिसका असर लंबे समय तक रहे। अदालत के अनुसार, इस मामले में पोस्ट दोबारा साझा करने की घटना अलग-थलग थी। इसके बाद छात्रा ने उसे हटा दिया और पछतावा भी जताया।
धार्मिक भावनाओं से जुड़ी पोस्ट पर कोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में माना कि संबंधित पोस्ट विवादित थी और उसमें धार्मिक भावनाओं को भड़काने की क्षमता हो सकती थी। ऐसे मामलों में संवेदनशीलता और जिम्मेदारी से काम लेना जरूरी है, क्योंकि भारत में अलग-अलग धर्मों के लोग रहते हैं।हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी सामग्री से असहमति या नाराजगी पैदा होने की संभावना मात्र आपराधिक मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त नहीं है। आपराधिक कानून तभी लागू किया जाना चाहिए, जब संबंधित कृत्य कानून के तहत अपराध की श्रेणी में आता हो।
कोर्ट ने छात्रा की भूमिका को भी अहम माना। वह मूल पोस्ट की लेखक या निर्माता नहीं थी। उसकी भूमिका पहले से उपलब्ध सामग्री को दोबारा साझा करने तक सीमित थी। अदालत को ऐसा कोई ठोस आधार नहीं मिला, जिससे यह साबित हो कि छात्रा ने जानबूझकर धार्मिक समुदायों के बीच दुश्मनी बढ़ाने की कोशिश की थी।
कॉलेज से निष्कासन को भी दी थी चुनौती
छात्रा पुणे के एक निजी इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ती थी। विवादित पोस्ट के बाद उसे संस्थान से निष्कासित किए जाने की कार्रवाई का भी सामना करना पड़ा। उसने इस फैसले को मनमाना और गैरकानूनी बताते हुए चुनौती दी थी। इसके साथ ही उसने अपने खिलाफ दर्ज FIR रद्द करने की मांग की थी। छात्रा को 9 मई 2025 को गिरफ्तार किया गया था। उसी महीने बॉम्बे हाईकोर्ट ने उसकी गिरफ्तारी पर सवाल उठाते हुए उसे तत्काल रिहा करने का आदेश दिया था। अब अदालत ने उसके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को भी रद्द कर दिया है।

