इंदौर में 103 साल पुरानी परंपरा के तहत अनंत चतुर्दशी पर 25 सितंबर की शाम 6 बजे से झांकियों का कारवां शुरू होगा। खास बात यह कि इस बार भी 22 से ज्यादा झांकियां तैयार की जा रही हैं। मिल परिसरों में कलाकार और कारीगर दिन-रात जुटे हैं। कहीं अंतिम रंग-रोगन तो कहीं सजावट और रोशनी का काम चल रहा है। एक दिन पहले ही शहर में झांकियों को लेकर उत्सुकता बढ़ गई है। लोगों के बीच चर्चा है कि इस बार झांकियों में क्या नया देखने को मिलेगा। पुरानी परंपरा के साथ इस बार भी नए विषय, नई सजावट और नए प्रयोग देखने को मिलेंगे। परंपरा पुरानी… उत्साह नया, मुस्लिम बच्चियां पहुंची मिल परिसर इंदौर की अनंत चतुर्दशी सिर्फ झांकियों के निकलने का आयोजन नहीं, बल्कि शहर की सामूहिक स्मृतियों से जुड़ा उत्सव है। यही वजह है कि झांकियां निकलने से पहले ही इन्हें देखने का उत्साह मिल परिसरों तक पहुंच गया है। इस बार झांकियां तैयार होने के दौरान मुस्लिम बच्चियां भी मिल परिसर में इन्हें देखने पहुंचीं। तैयार हो रही झांकियां उनके लिए भी आकर्षण का केंद्र बनीं। यह दृश्य बताता है कि इंदौर की झांकी परंपरा को लेकर उत्सुकता अलग-अलग समुदायों के लोगों में भी दिखाई देती है। शाम 6 बजे पहली झांकी, पुराना क्रम रहेगा कायम 25 सितंबर को झांकियां शाम 6 बजे से निकलना शुरू होंगी। इस बार भी झांकियों का क्रम पूर्ववत रहेगा। सबसे पहले श्री खजराना गणेश मंदिर की झांकी निकलेगी। इसके बाद श्री शास्त्री कॉर्नर नवयुवक मंडल छोटा गणपति मंदिर चौराहा, इंदौर विकास प्राधिकरण, इंदौर नगर निगम, होप टेक्सटाइल (भंडारी मिल), कल्याण मिल, मालवा मिल, हुकुमचंद मिल, स्वदेशी मिल, राजकुमार मिल और स्पूतनिक ट्यूटोरियल एकेडमी की झांकियां निकलेंगी। पौराणिक कथाओं से सामाजिक संदेश तक की झलक इस बार झांकियों में पौराणिक कथाओं से लेकर सामाजिक संदेश तक कई रंग देखने को मिलेंगे। अलग-अलग मिलों ने अपनी झांकियों के लिए अलग-अलग कथाओं और विषयों को चुना है। कहीं भगवान गणेश से जुड़ी पौराणिक कथा दिखाई जाएगी तो कहीं नारी शक्ति और नशामुक्ति का संदेश दिया जाएगा। बच्चों के मनोरंजन के लिए भी खास झांकी तैयार की गई है। स्वदेशी मिल की 3 झांकियां 1. दुर्गा माता और महिषासुर वध पहली झांकी में देवी दुर्गा द्वारा महिषासुर के वध का प्रसंग दिखाया गया है। यह झांकी धार्मिक थीम पर आधारित है। 2. सती को लेकर जाते भगवान शंकर दूसरी झांकी भगवान शंकर द्वारा माता सती को ले जाने के प्रसंग पर आधारित है। इसे शिव पुराण से जुड़े प्रसंग के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। 3. नशामुक्ति का संदेश तीसरी झांकी धार्मिक कथाओं से अलग सामाजिक संदेश देती है। इसमें शराब के बहिष्कार और नशे से होने वाले नुकसान को दिखाया गया है। कल्याण मिल की 2 झांकियां 1. जगन्नाथ जी की पहली रथ यात्रा पहली झांकी भगवान जगन्नाथ की पहली रथ यात्रा के प्रसंग पर आधारित है। कथा के अनुसार सतयुग में जब मनुष्य भारी रथ को खींच नहीं पा रहे थे, तब जानवर आगे आए और रथ खींचने में सहायता की। झांकी में जानवरों के इस सहयोग और रथ यात्रा के उत्सव को दिखाया जाएगा। 2. नारी शक्ति दूसरी झांकी भारत की उन नारियों को समर्पित है, जिन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों में देश का गौरव बढ़ाया। इसमें भारतीय महिलाओं की उपलब्धियों और योगदान को प्रमुखता से दिखाया जाएगा। होप टेक्सटाइल मिल की 2 झांकियां 1. गणेशजी की आराधना पहली झांकी भगवान गणेश की आराधना पर आधारित है। इसकी खासियत यह है कि झांकी को गणेश पुराण में दिए गए वर्णन के आधार पर तैयार किया गया है। 2. भगवान शिव की बारात दूसरी झांकी भगवान शिव की बारात को दर्शाती है। इसे शिव महापुराण में वर्णित प्रसंग के आधार पर तैयार किया गया है। मालवा मिल की 3 झांकियां 1. बच्चों के लिए ‘मछली जल की रानी है’ पहली झांकी खास तौर पर बच्चों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। इसमें ‘मछली जल की रानी है’ थीम दिखाई जाएगी। झांकी में बड़ी संख्या में मछलियों के साथ जलपरी भी आकर्षण का केंद्र रहेगी। 2. चंद्रमा और रोहिणी का विवाह दूसरी झांकी चंद्रमा और रोहिणी के विवाह के प्रसंग पर आधारित है। इसमें पौराणिक कथा को दृश्य रूप में प्रस्तुत किया जाएगा। 3. भोलेनाथ की बारात तीसरी झांकी भगवान भोलेनाथ की बारात पर आधारित है। इसमें देवताओं के साथ भूतों की टोली भी नाचती हुई नजर आएगी। राजकुमार मिल की 2 झांकियां 1. ‘मेरी ये नैया है अब तो तेरे हवाले’ पहली झांकी भगवान जगन्नाथ से जुड़े भजन ‘मेरी ये नैया है अब तो तेरे हवाले’ की थीम पर आधारित है। भजन के भाव को झांकी के माध्यम से प्रस्तुत किया जाएगा। 2. मधु-कैटभ वध—80 फीट की ट्रॉली पर तैयार दूसरी झांकी मधु और कैटभ के वध की पौराणिक कथा पर आधारित है। इसके पीछे की कथा के अनुसार मधु और कैटभ नामक दो असुरों को इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था। इसके बाद वे भगवान विष्णु का वध करने निकले। कथा में आगे देवी की सहायता से दोनों असुरों के वध का प्रसंग आता है। इस झांकी की खासियत इसका विशाल आकार है। इसे करीब 80 फीट की ट्रॉली पर तैयार किया गया है। आकार बड़ा होने के कारण झांकी को पहले दो अलग-अलग हिस्सों में बनाया गया और बाद में दोनों हिस्सों को जोड़कर तैयार किया गया। नगर निगम की 4 झांकियां विकास कामों की झांकी पहली झांकी में निगम के विकास कार्यों को दर्शाया गया है। इसमें सौर ऊर्जा प्लांट, वाटर रिचार्जिंग, 24 घंटे जल आपूर्ति, पौधरोपण, मेट्रो, सड़क निर्माण, सीवरेज ट्रीटमेंट और स्वच्छता-यातायात में किए जा रहे नवाचार दिखेंगे। जेनजी : युवा संगम, रोजगार, उच्च शिक्षा, कौशल विकास दूसरी झांकी में जेनजी को केंद्र में रखते हुए शिक्षा, कौशल विकास, रोजगार और स्वरोजगार के अवसरों को दिखाया गया है। युवा संगम, रोजगार, उच्च शिक्षा, कौशल विकास और मुद्रा ऋण से जुड़े आंकड़े भी प्रदर्शित होंगे। मोदी के सुशासन के 25 वर्षों की थीम तीसरी झांकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सुशासन के 25 वर्षों की थीम पर आधारित है। इसमें जनकल्याणकारी योजनाएं, महिला उद्यमिता, आयुष्मान भारत, जनजातीय क्षेत्रों का विकास, हरित ऊर्जा और हर घर स्वच्छ जल जैसे विषय शामिल हैं। कृष्ण-सुदामा मिलन चौथी झांकी कृष्ण-सुदामा के मिलन पर आधारित है। इसके जरिए सच्ची मित्रता में ईमानदारी, त्याग, सम्मान और हर परिस्थिति में साथ निभाने का संदेश दिया जाएगा। कभी झांकियां देखने 3 दिन पहले आ जाते थे मेहमान इंदौर की अनंत चतुर्दशी का उत्साह आज का नहीं है। करीब 103 साल पुरानी इस परंपरा की यादें आज भी बुजुर्गों के पास सुरक्षित हैं। एक दौर ऐसा था, जब झांकियां देखने के लिए लोग तीन-तीन दिन पहले इंदौर पहुंच जाते थे। मालवा के आसपास के गांवों और कस्बों से पूरा परिवार लेकर लोग शहर आते थे। बड़ा बांगड़दा, छोटा बांगड़दा, देपालपुर, हातोद, राऊ, बिजलपुर, उज्जैन, महू और आसपास के इलाकों से लोग झांकियां देखने पहुंचते थे। कई परिवारों के लिए यह सालाना मिलन जैसा अवसर होता था। ओटले पहले से बुक होते, शाम होते ही दरियां बिछ जातीं पुराने इंदौर को याद करते हुए शेखर गिरी बताते हैं कि अनंत चतुर्दशी के दिन घर में मेहमानों के आने का सिलसिला कई दिन पहले शुरू हो जाता था। रिश्तेदारों के लिए घर में जगह बनाई जाती और झांकियां देखने के लिए सड़क किनारे जगह भी पहले से तय कर ली जाती थी। उस समय दुकानों और मकानों के ओटले झांकियां देखने की सबसे खास जगह माने जाते थे। सीतलामाता बाजार, नंदलालपुरा चौराहा और झांकी मार्ग के दूसरे हिस्सों में दुकानदारों के ओटले पहले से तय हो जाते थे। शाम होते ही परिवार वहां दरियां बिछाकर बैठ जाते और फिर शुरू होता था झांकियों का इंतजार। गांवों से पूरा टोला आता था, खाना भी साथ लाते थे आसपास के गांवों से लोग बच्चों समेत पूरा परिवार लेकर आते थे। महिलाएं और बच्चे भी बड़ी संख्या में शामिल होते। कई परिवार घर से खाना बनाकर साथ लाते थे। एक झांकी निकलने के बाद दूसरी झांकी आने में काफी समय लगता था। इस लंबे इंतजार के दौरान बच्चे सो जाते। फिर अगली झांकी आने की सूचना मिलते ही माता-पिता उन्हें उठाते और पूरा परिवार दोबारा झांकी देखने में जुट जाता। यानी उस समय झांकी देखना ही अनंत चतुर्दशी का सबसे बड़ा कार्यक्रम हुआ करता था। अखाड़ों की टक्कर और करतब भी थे बड़ा आकर्षण झांकियों के बीच निकलने वाले अखाड़े भी लोगों के आकर्षण का केंद्र होते थे। उस्ताद, खलीफा और पहलवान पारंपरिक करतब दिखाते थे। ढोल की आवाज के बीच मलखंभ, पट्टा और दूसरे पारंपरिक करतब देखने के लिए लोग सड़क किनारे घंटों खड़े रहते थे। कई बार प्रदर्शन के दौरान प्रतिस्पर्धा का माहौल भी बनता था। रामायण से फिल्मों तक, हर दौर की कहानी झांकियों में पुरानी झांकियां केवल सजावट का माध्यम नहीं थीं। वे अपने समय की कहानी भी कहती थीं। कभी रामायण के प्रसंग झांकियों में दिखाई देते, कभी हनुमानजी और सीता से जुड़े प्रसंग सामने आते। धार्मिक विषयों के साथ फिल्मों और उस समय लोकप्रिय कहानियों को भी झांकियों का विषय बनाया जाता था। इस तरह झांकियां उस दौर के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की झलक भी दिखाती थीं। दोपहर में निकालने की कोशिश हुई, लोग रात के इंतजार में रहे बुजुर्ग बताते हैं कि एक समय प्रशासन की ओर से झांकियों को जल्दी निकालने की कोशिश भी हुई थी। लेकिन लोगों की आदत रात में झांकियां देखने की थी। देर रात तक लोग झांकी मार्ग पर अपनी जगह बनाए रखते। कहीं से आवाज आती कि झांकी आने वाली है तो लोग आगे बढ़ जाते। झांकी का इंतजार भी उत्सव का हिस्सा हुआ करता था। 53 साल से एक ही जगह बैठकर झांकियां देख रहे कमल जैन पुराने इंदौर की झांकी परंपरा को करीब से देखने वालों में कमल जैन भी हैं। वे बताते हैं कि करीब 53 साल से वे इसी जगह बैठकर झांकियां देखते आ रहे हैं। तब सड़क ही स्क्रीन थी, अब मोबाइल पर भी दिखती हैं झांकियां समय के साथ झांकियां देखने का तरीका बदला है। पहले सड़क ही सबसे बड़ी स्क्रीन हुआ करती थी। लोग घंटों परिवार के साथ बैठकर सामने से गुजरने वाली हर झांकी देखते थे। अब टीवी, मोबाइल और ऑनलाइन प्रसारण के जरिए झांकियां घर बैठे भी देखी जा सकती हैं। इसके बावजूद अनंत चतुर्दशी की रात शहर की सड़कों पर उमड़ने वाली भीड़ बताती है कि झांकियों को सामने से देखने का आकर्षण अब भी कायम है। इंदौर की दो परंपराएं, जो लोगों को घर से सड़क पर लाती हैं बुजुर्गों की नजर में इंदौर की खासियत उसकी उन परंपराओं में है, जिनमें लोग घरों से निकलकर सड़क पर एक साथ आते हैं। इनमें अनंत चतुर्दशी की झांकियां और रंगपंचमी की गेर प्रमुख हैं। 103 साल बाद भी 25 सितंबर की रात जब झांकियां शहर की सड़कों से गुजरेंगी, तो उनके साथ सिर्फ रोशनी और साज-सज्जा नहीं होगी। उनके साथ पुराने इंदौर की यादें, मिलों का दौर, अखाड़ों की परंपरा, परिवारों का साथ और शहर की सामूहिक स्मृतियां भी दिखाई देंगी।

