शारदीय नवरात्र के छठे दिन अररिया शहर में मां दुर्गा की भक्ति और आस्था का अद्भुत नजारा देखने को मिल रहा है। शहर के रानीगंज मार्ग पर एनएच-327ई के किनारे अररिया कॉलेज के समीप स्थित श्री श्री 1008 सार्वजनिक नव दुर्गा कला मंदिर में मां दुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की पूजा-अर्चना को लेकर भक्तिमय माहौल बना हुआ है। खास बात यह है कि यहां मां दुर्गा की आराधना के साथ-साथ कृष्ण-सुदामा की मित्रता का संदेश भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। मंदिर परिसर में सुबह से ही श्रद्धालुओं की आवाजाही जारी है। हाथों में पूजा की थाली, मन में श्रद्धा और मां के दर्शन की अभिलाषा लिए भक्त दरबार पहुंच रहे हैं। मां कात्यायनी की आराधना में जुटे श्रद्धालु नवरात्र के छठे दिन मां कात्यायनी की विधि-विधान से पूजा की जाती है। मंदिर के पुजारी पंडित श्यामानंद झा के अनुसार, मां कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत दिव्य और कल्याणकारी है। उनकी चार भुजाएं हैं। दाहिनी ओर का ऊपरी हाथ अभय मुद्रा में और निचला हाथ वर मुद्रा में रहता है, जबकि बाईं ओर के ऊपरी हाथ में तलवार और निचले हाथ में कमल का फूल सुशोभित होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महर्षि कात्यायन की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति ने उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया था। इसी कारण देवी का नाम कात्यायनी पड़ा। इस दिन मां को लाल या पीले वस्त्र अर्पित करना शुभ माना जाता है। वहीं, शहद अथवा शहद से बनी मिठाइयों का भोग लगाने और लाल गुलाब या गुड़हल के फूल चढ़ाने की परंपरा है। जिले के मुख्यालय से लेकर विभिन्न प्रखंडों तक मंदिरों में मां कात्यायनी की पूजा-अर्चना को लेकर उत्साह देखा जा रहा है। 1977 से जारी है मां दुर्गा की पूजा की परंपरा सार्वजनिक नव दुर्गा कला मंदिर की पहचान केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे वर्षों पुराना संघर्ष, समर्पण और मित्रता की कहानी भी जुड़ी हुई है। इस मंदिर में वर्ष 1977 से नवरात्र के दौरान मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना की जा रही है। स्थानीय लोगों के सहयोग से शुरू हुई यह परंपरा आज भी पूरे उत्साह के साथ जारी है। मंदिर की स्थापना की कहानी अररिया कॉलेज में लैब बॉय के पद पर कार्यरत रहे उमाशंकर चौधरी से जुड़ी है। मां दुर्गा के अनन्य भक्त माने जाने वाले उमाशंकर चौधरी के अनुसार, वर्ष 1977 के आसपास इस इलाके में आबादी काफी कम थी और अररिया कॉलेज के आसपास बड़े पैमाने पर जंगल फैला हुआ था। इसी दौरान उन्होंने कॉलेज के मुख्य द्वार से करीब 100 मीटर दूर जंगल की सफाई शुरू की। इसी क्रम में उनकी मुलाकात जोहरी ऋषि देव नामक एक दृष्टिबाधित तांत्रिक से हुई, जो वहां मां दुर्गा की तस्वीर स्थापित कर पूजा-अर्चना किया करते थे। धीरे-धीरे दोनों के बीच मित्रता गहरी होती गई और मां दुर्गा के प्रति साझा श्रद्धा ने उन्हें एक उद्देश्य से जोड़ दिया। मित्रता की वह कहानी, जिसने मंदिर निर्माण की नींव रखी उमाशंकर चौधरी बताते हैं कि अररिया कॉलेज से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने अपने गांव समस्तीपुर जाने की तैयारी की थी। समस्तीपुर के दलसिंहसराय स्थित नगरगामा गांव में वर्ष 1968 में मां दुर्गा का भव्य मंदिर बनवाने से भी उनका जुड़ाव रहा था। लेकिन उनके मित्र जोहरी ऋषि देव ने उन्हें अररिया छोड़कर जाने से रोक लिया। जोहरी ऋषि देव ने उनसे कहा कि अगले वर्ष उनकी मृत्यु हो सकती है, लेकिन मां दुर्गा का भव्य मंदिर अररिया में उन्हें ही बनाना होगा। उमाशंकर चौधरी के मुताबिक, उस रात उनके मित्र ने देर तक मां दुर्गा का स्मरण किया और उन्हें मां के साक्षात दर्शन होने का अनुभव कराया। इस घटना ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला। इसके बाद उन्होंने अपने मित्र के संकल्प को पूरा करने और अररिया में मां दुर्गा के भव्य मंदिर की स्थापना के लिए प्रयास जारी रखा। यह कहानी बताती है कि आस्था के साथ सच्ची मित्रता और समर्पण किस तरह किसी बड़े धार्मिक एवं सामाजिक कार्य की प्रेरणा बन सकते हैं। स्थानीय लोगों के सहयोग से भव्य मंदिर का निर्माण मंदिर के अध्यक्ष फूलचंद ऋषि देव और सचिव शशि प्रकाश वर्मा के अनुसार, स्थानीय लोगों के सहयोग से मंदिर निर्माण का कार्य आगे बढ़ाया जा रहा है। इसके लिए 56 गुणा 56 आकार में भव्य मंदिर के निर्माण की प्रक्रिया शुरू की गई है। इस पुनीत कार्य में कई स्थानीय लोगों का योगदान बताया गया है। स्थानीय वार्ड पार्षद श्याम कुमार मंडल ने बताया कि वर्ष 1977 से यहां हर साल नवरात्र के अवसर पर मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर विधि-विधान से पूजा की जाती है। इस वर्ष भी भव्य पंडाल में मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की गई है। सुबह और शाम बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचकर पूजा-अर्चना कर रहे हैं। आस्था के साथ सामाजिक एकता का संदेश अररिया का सार्वजनिक नव दुर्गा कला मंदिर आज नवरात्र की पूजा का प्रमुख आकर्षण बनने के साथ-साथ स्थानीय लोगों की सामूहिक आस्था और सहयोग का प्रतीक भी है। मां कात्यायनी की आराधना, मंदिर स्थापना की ऐतिहासिक कहानी और कृष्ण-सुदामा की मित्रता का संदेश इस आयोजन को विशेष बनाते हैं। वर्षों से चली आ रही पूजा परंपरा यह दर्शाती है कि धार्मिक आयोजन केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहते, बल्कि लोगों को एकजुट करने और सामाजिक संबंधों को मजबूत बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मां दुर्गा के जयकारों और श्रद्धालुओं की उमड़ती भीड़ के बीच अररिया का यह मंदिर नवरात्र में भक्ति, समर्पण, मित्रता और सामुदायिक एकता की अनूठी मिसाल पेश कर रहा है। शारदीय नवरात्र के छठे दिन अररिया शहर में मां दुर्गा की भक्ति और आस्था का अद्भुत नजारा देखने को मिल रहा है। शहर के रानीगंज मार्ग पर एनएच-327ई के किनारे अररिया कॉलेज के समीप स्थित श्री श्री 1008 सार्वजनिक नव दुर्गा कला मंदिर में मां दुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की पूजा-अर्चना को लेकर भक्तिमय माहौल बना हुआ है। खास बात यह है कि यहां मां दुर्गा की आराधना के साथ-साथ कृष्ण-सुदामा की मित्रता का संदेश भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। मंदिर परिसर में सुबह से ही श्रद्धालुओं की आवाजाही जारी है। हाथों में पूजा की थाली, मन में श्रद्धा और मां के दर्शन की अभिलाषा लिए भक्त दरबार पहुंच रहे हैं। मां कात्यायनी की आराधना में जुटे श्रद्धालु नवरात्र के छठे दिन मां कात्यायनी की विधि-विधान से पूजा की जाती है। मंदिर के पुजारी पंडित श्यामानंद झा के अनुसार, मां कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत दिव्य और कल्याणकारी है। उनकी चार भुजाएं हैं। दाहिनी ओर का ऊपरी हाथ अभय मुद्रा में और निचला हाथ वर मुद्रा में रहता है, जबकि बाईं ओर के ऊपरी हाथ में तलवार और निचले हाथ में कमल का फूल सुशोभित होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महर्षि कात्यायन की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति ने उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया था। इसी कारण देवी का नाम कात्यायनी पड़ा। इस दिन मां को लाल या पीले वस्त्र अर्पित करना शुभ माना जाता है। वहीं, शहद अथवा शहद से बनी मिठाइयों का भोग लगाने और लाल गुलाब या गुड़हल के फूल चढ़ाने की परंपरा है। जिले के मुख्यालय से लेकर विभिन्न प्रखंडों तक मंदिरों में मां कात्यायनी की पूजा-अर्चना को लेकर उत्साह देखा जा रहा है। 1977 से जारी है मां दुर्गा की पूजा की परंपरा सार्वजनिक नव दुर्गा कला मंदिर की पहचान केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे वर्षों पुराना संघर्ष, समर्पण और मित्रता की कहानी भी जुड़ी हुई है। इस मंदिर में वर्ष 1977 से नवरात्र के दौरान मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना की जा रही है। स्थानीय लोगों के सहयोग से शुरू हुई यह परंपरा आज भी पूरे उत्साह के साथ जारी है। मंदिर की स्थापना की कहानी अररिया कॉलेज में लैब बॉय के पद पर कार्यरत रहे उमाशंकर चौधरी से जुड़ी है। मां दुर्गा के अनन्य भक्त माने जाने वाले उमाशंकर चौधरी के अनुसार, वर्ष 1977 के आसपास इस इलाके में आबादी काफी कम थी और अररिया कॉलेज के आसपास बड़े पैमाने पर जंगल फैला हुआ था। इसी दौरान उन्होंने कॉलेज के मुख्य द्वार से करीब 100 मीटर दूर जंगल की सफाई शुरू की। इसी क्रम में उनकी मुलाकात जोहरी ऋषि देव नामक एक दृष्टिबाधित तांत्रिक से हुई, जो वहां मां दुर्गा की तस्वीर स्थापित कर पूजा-अर्चना किया करते थे। धीरे-धीरे दोनों के बीच मित्रता गहरी होती गई और मां दुर्गा के प्रति साझा श्रद्धा ने उन्हें एक उद्देश्य से जोड़ दिया। मित्रता की वह कहानी, जिसने मंदिर निर्माण की नींव रखी उमाशंकर चौधरी बताते हैं कि अररिया कॉलेज से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने अपने गांव समस्तीपुर जाने की तैयारी की थी। समस्तीपुर के दलसिंहसराय स्थित नगरगामा गांव में वर्ष 1968 में मां दुर्गा का भव्य मंदिर बनवाने से भी उनका जुड़ाव रहा था। लेकिन उनके मित्र जोहरी ऋषि देव ने उन्हें अररिया छोड़कर जाने से रोक लिया। जोहरी ऋषि देव ने उनसे कहा कि अगले वर्ष उनकी मृत्यु हो सकती है, लेकिन मां दुर्गा का भव्य मंदिर अररिया में उन्हें ही बनाना होगा। उमाशंकर चौधरी के मुताबिक, उस रात उनके मित्र ने देर तक मां दुर्गा का स्मरण किया और उन्हें मां के साक्षात दर्शन होने का अनुभव कराया। इस घटना ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला। इसके बाद उन्होंने अपने मित्र के संकल्प को पूरा करने और अररिया में मां दुर्गा के भव्य मंदिर की स्थापना के लिए प्रयास जारी रखा। यह कहानी बताती है कि आस्था के साथ सच्ची मित्रता और समर्पण किस तरह किसी बड़े धार्मिक एवं सामाजिक कार्य की प्रेरणा बन सकते हैं। स्थानीय लोगों के सहयोग से भव्य मंदिर का निर्माण मंदिर के अध्यक्ष फूलचंद ऋषि देव और सचिव शशि प्रकाश वर्मा के अनुसार, स्थानीय लोगों के सहयोग से मंदिर निर्माण का कार्य आगे बढ़ाया जा रहा है। इसके लिए 56 गुणा 56 आकार में भव्य मंदिर के निर्माण की प्रक्रिया शुरू की गई है। इस पुनीत कार्य में कई स्थानीय लोगों का योगदान बताया गया है। स्थानीय वार्ड पार्षद श्याम कुमार मंडल ने बताया कि वर्ष 1977 से यहां हर साल नवरात्र के अवसर पर मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर विधि-विधान से पूजा की जाती है। इस वर्ष भी भव्य पंडाल में मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की गई है। सुबह और शाम बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचकर पूजा-अर्चना कर रहे हैं। आस्था के साथ सामाजिक एकता का संदेश अररिया का सार्वजनिक नव दुर्गा कला मंदिर आज नवरात्र की पूजा का प्रमुख आकर्षण बनने के साथ-साथ स्थानीय लोगों की सामूहिक आस्था और सहयोग का प्रतीक भी है। मां कात्यायनी की आराधना, मंदिर स्थापना की ऐतिहासिक कहानी और कृष्ण-सुदामा की मित्रता का संदेश इस आयोजन को विशेष बनाते हैं। वर्षों से चली आ रही पूजा परंपरा यह दर्शाती है कि धार्मिक आयोजन केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहते, बल्कि लोगों को एकजुट करने और सामाजिक संबंधों को मजबूत बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मां दुर्गा के जयकारों और श्रद्धालुओं की उमड़ती भीड़ के बीच अररिया का यह मंदिर नवरात्र में भक्ति, समर्पण, मित्रता और सामुदायिक एकता की अनूठी मिसाल पेश कर रहा है।

