World Polio Day 2026: डर की बीमारी से आशा की किरण तक, WHO से जानिए पोलियो के खिलाफ वैश्विक संघर्ष की कहानी

World Polio Day 2026: डर की बीमारी से आशा की किरण तक, WHO से जानिए पोलियो के खिलाफ वैश्विक संघर्ष की कहानी

World Polio Day 2026: क्या आपने कभी सोचा है कि 1950 के दशक में जब गर्मियों का मौसम आता था, तो माता-पिता अपने बच्चों को बाहर खेलने भेजने से क्यों डरते थे? मेयो क्लिनिक के अनुसार, स्विमिंग पूल बंद कर दिए जाते थे, पार्क खाली हो जाते थे और हर मां-बाप के दिल में बस एक ही डर होता था उनका बच्चा कल सुबह अपने पैरों पर खड़ा हो पाएगा या नहीं। यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि पोलियो का वह खौफ था जिसने पूरी दुनिया को डराकर रखा था। लेकिन यह कहानी सिर्फ डर की नहीं है, यह इंसान के हौसले, जुनून और जीत की वह दास्तान है जिसे हर किसी को जानना चाहिए।

जब लोहे के सिलेंडर के भरोसे सांस लेती थी जिंदगी

पोलियो कोई आम बीमारी नहीं थी। यह एक ऐसा वायरस था जो चुपके से शरीर में घुसता था और बच्चों के नर्वस सिस्टम (तंत्रिका तंत्र) पर हमला कर देता था। इसका सबसे भयानक असर यह था कि बच्चा रात को सोता था और सुबह उसके पैर या सांस लेने वाली मांसपेशियां काम करना बंद कर देती थीं। उस दौर में जब बच्चों की सांस लेने की मांसपेशियां पंगु (paralysed) हो जाती थीं, तब उन्हें आयरन लंग (Iron Lung) नाम के एक विशाल लोहे के सिलेंडर में रखा जाता था। यह मशीन उनके लिए फेफड़ों की तरह सांस खींचने का काम करती थी। कई बच्चे इसमें महीनों और सालों तक रहे।

वह रिसर्च जिसने बदल दिया सबका नसीब

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, 1916 में न्यूयॉर्क शहर में हुए एक बड़े प्रकोप में 2000 से अधिक लोग मारे गए थे, और 1952 में अमेरिका में दर्ज किए गए सबसे भीषण प्रकोप में 3000 से अधिक लोगों की मौत हुई थी। इस डर के अंधेरे में आशा की किरण लेकर आए दो वैज्ञानिक डॉ. जोनास साल्क (Dr. Jonas Salk) और डॉ. अल्बर्ट साबिर (Dr. Albert Sabin)।

1.इंजेक्टेबल पोलियो वैक्सीन (डॉ. जोनास साल्क)- 1955 में डॉ. साल्क की पहली सुरक्षित पोलियो वैक्सीन को आधिकारिक मंजूरी मिली। जब उनसे पूछा गया कि इस वैक्सीन का पेटेंट किसके पास होगा, तो उनका जवाब इतिहास में अमर हो गया। उन्होंने कहा, क्या आप सूरज का पेटेंट करा सकते हैं? उन्होंने इस वैक्सीन से एक रुपया भी नहीं कमाया ताकि यह दुनिया के हर गरीब बच्चे तक पहुंच सके।

2. पोलियो ओरल वैक्सीन (डॉ. अल्बर्ट साबिन)- इसके बाद डॉ. साबिन ने वह मीठी दो बूंद बनाई जिसे हम ओरल पोलियो वैक्सीन (OPV) के नाम से जानते हैं। इसने घर-घर तक पहुंचना और भी आसान बना दिया।

भारत का प्रसिद्ध दो बूंद जिंदगी की स्लोगन से लेकर पोलियो मुक्ति तक का सफर

1990 के दशक में भारत को पोलियो का सबसे बड़ा गढ़ माना जाता था। यहां की विशाल आबादी और साफ-सफाई की चुनौतियों को देखकर दुनिया के एक्सपर्ट्स कहते थे कि भारत से पोलियो खत्म होना लगभग नामुमकिन है। लेकिन भारत ने इतिहास रच दिया, अमिताभ बच्चन का वह मशहूर स्लोगन दो बूंद जिंदगी की। हजारों आशा कार्यकर्ताओं और हेल्थकेयर टीमों का जुनून, जो बर्फबारी, बाढ़ और पहाड़ों को पार करके एक-एक बच्चे तक पहुंचे। रेलवे स्टेशनों, बस स्टैंडों और मेलों में चलाए गए टीकाकरण अभियान। 2014 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भारत को आधिकारिक तौर पर पोलियो-मुक्त (Polio-Free) घोषित कर दिया। यह आधुनिक मेडिकल इतिहास की सबसे बड़ी जीतों में से एक थी।

आज दुनिया से 99% पोलियो खत्म हो चुका है, लेकिन यह लड़ाई तब तक खत्म नहीं होगी जब तक यह आखिरी देश से भी मिट न जाए। आज भी अफगानिस्तान और पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में वाइल्ड पोलियो वायरस मिलता है। पोलियो की यह कहानी हमें सिखाती है कि जब पूरी दुनिया एक साथ आती है, साइंस पर भरोसा करती है और जमीन पर मेहनत करती है, तो किसी भी बड़ी से बड़ी बीमारी को हराया जा सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *