पति की लंबी उम्र के लिए की वट सावित्री पूजा:मिथिलांचल में महिलाओं ने अखंड सौभाग्य की कामना की, नवविवाहिताओं में दिखा उल्लास

पति की लंबी उम्र के लिए की वट सावित्री पूजा:मिथिलांचल में महिलाओं ने अखंड सौभाग्य की कामना की, नवविवाहिताओं में दिखा उल्लास

मिथिलांचल समेत पूरे उत्तर बिहार में सुहागिन महिलाओं का आस्था, श्रद्धा और समर्पण का महान पर्व वट सावित्री शनिवार को पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ हर्षोल्लासपूर्वक मनाया गया। पति की दीर्घायु, अखंड सौभाग्य और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना को लेकर विवाहित महिलाओं ने निर्जला एवं फलाहार व्रत रखकर वट वृक्ष की पूजा-अर्चना की। जिले के मंदिर परिसरों, गांवों के प्राचीन बरगद वृक्षों और सार्वजनिक पूजा स्थलों पर सुबह से ही महिलाओं की भीड़ उमड़ पड़ी। पारंपरिक लोकगीतों, मंगलगान और सावित्री-सत्यवान की कथा के पाठ से पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा। मिथिलांचल में यह पर्व लोक आस्था और सनातन परंपरा का प्रतीक माना जाता है। ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को मनाए जाने वाले इस व्रत में नवविवाहिताओं से लेकर 85 वर्ष तक की वृद्ध महिलाएं भी शामिल दिखीं। महिलाओं ने अपने-अपने पतियों के दीर्घायु होने की कामना करते हुए वट वृक्ष की पूजा की और पारंपरिक विधि से परिक्रमा कर रक्षा सूत्र बांधा। वट वृक्ष को माना गया अक्षय और अमरत्व का प्रतीक धार्मिक मान्यता के अनुसार वट वृक्ष में त्रिदेवों का वास होता है। पंडितों के अनुसार इसकी जड़ में भगवान ब्रह्मा, तने में भगवान विष्णु और शाखाओं में भगवान शिव का निवास माना गया है। इसी कारण वट वृक्ष को अक्षय, अमरत्व और जीवनदायिनी शक्ति का प्रतीक कहा जाता है। मान्यता है कि इसके नीचे बैठकर पूजा करने, कथा सुनने और व्रत रखने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं तथा वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है। आयुर्वेद और पर्यावरण की दृष्टि से भी बरगद का वृक्ष अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसकी छाया और वातावरण को स्वास्थ्य के लिए लाभकारी बताया गया है। महिलाएं वृक्ष के नीचे बैठकर पूजा-अर्चना करती रहीं और परिवार की मंगलकामना करती नजर आईं। सात फेरे और रक्षा सूत्र के साथ संपन्न हुई पूजा धार्मिक विधान के अनुसार महिलाओं ने प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण किया और व्रत का संकल्प लिया। पूजा की थाली में फल, फूल, अक्षत, रोली, भीगा चना, धूप, दीप और प्रसाद सजाकर वट वृक्ष के समक्ष पूजा की गई। महिलाओं ने बरगद के तने पर कच्चा सूत लपेटते हुए सात अथवा 108 बार परिक्रमा की। इस दौरान सावित्री-सत्यवान की कथा का श्रवण और पाठ किया गया। पूजन के बाद महिलाओं ने अपने पतियों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया और फिर व्रत खोला। कई स्थानों पर बांस से बने पारंपरिक पंखों से वट वृक्ष और पति को हवा देने की परंपरा भी निभाई गई, जिसे सेवा, समर्पण और सम्मान का प्रतीक माना जाता है। नवविवाहिताओं में दिखा विशेष उत्साह वट सावित्री को लेकर नवविवाहित महिलाओं में विशेष उत्साह देखने को मिला। महिलाएं लाल और पीले रंग की साड़ियों, पारंपरिक गहनों और ससुराल से मिले परिधानों में सजी-धजी नजर आईं। कई घरों में नवविवाहिताओं के लिए ‘भार-चंगेरा’ यानी सौगात, वस्त्र और पूजा सामग्री भेजने की परंपरा भी निभाई गई। पूजा के दौरान महिलाओं और युवतियों के बीच अंकुरित चना बांटने की परंपरा का भी पालन किया गया। महिलाओं ने सामूहिक रूप से लोकगीत गाते हुए पूजा की और एक-दूसरे को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद दिया। सावित्री-सत्यवान की कथा से जुड़ी है मान्यता पौराणिक मान्यता के अनुसार देवी सावित्री ने अपने तप, श्रद्धा और अटूट पतिव्रता धर्म के बल पर यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। उसी स्मृति में यह व्रत रखा जाता है। महिलाओं का विश्वास है कि श्रद्धा और विधि-विधान से वट सावित्री व्रत करने से पति की आयु लंबी होती है और वैवाहिक जीवन सुखमय बना रहता है। मिथिलांचल समेत पूरे उत्तर बिहार में सुहागिन महिलाओं का आस्था, श्रद्धा और समर्पण का महान पर्व वट सावित्री शनिवार को पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ हर्षोल्लासपूर्वक मनाया गया। पति की दीर्घायु, अखंड सौभाग्य और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना को लेकर विवाहित महिलाओं ने निर्जला एवं फलाहार व्रत रखकर वट वृक्ष की पूजा-अर्चना की। जिले के मंदिर परिसरों, गांवों के प्राचीन बरगद वृक्षों और सार्वजनिक पूजा स्थलों पर सुबह से ही महिलाओं की भीड़ उमड़ पड़ी। पारंपरिक लोकगीतों, मंगलगान और सावित्री-सत्यवान की कथा के पाठ से पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा। मिथिलांचल में यह पर्व लोक आस्था और सनातन परंपरा का प्रतीक माना जाता है। ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को मनाए जाने वाले इस व्रत में नवविवाहिताओं से लेकर 85 वर्ष तक की वृद्ध महिलाएं भी शामिल दिखीं। महिलाओं ने अपने-अपने पतियों के दीर्घायु होने की कामना करते हुए वट वृक्ष की पूजा की और पारंपरिक विधि से परिक्रमा कर रक्षा सूत्र बांधा। वट वृक्ष को माना गया अक्षय और अमरत्व का प्रतीक धार्मिक मान्यता के अनुसार वट वृक्ष में त्रिदेवों का वास होता है। पंडितों के अनुसार इसकी जड़ में भगवान ब्रह्मा, तने में भगवान विष्णु और शाखाओं में भगवान शिव का निवास माना गया है। इसी कारण वट वृक्ष को अक्षय, अमरत्व और जीवनदायिनी शक्ति का प्रतीक कहा जाता है। मान्यता है कि इसके नीचे बैठकर पूजा करने, कथा सुनने और व्रत रखने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं तथा वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है। आयुर्वेद और पर्यावरण की दृष्टि से भी बरगद का वृक्ष अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसकी छाया और वातावरण को स्वास्थ्य के लिए लाभकारी बताया गया है। महिलाएं वृक्ष के नीचे बैठकर पूजा-अर्चना करती रहीं और परिवार की मंगलकामना करती नजर आईं। सात फेरे और रक्षा सूत्र के साथ संपन्न हुई पूजा धार्मिक विधान के अनुसार महिलाओं ने प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण किया और व्रत का संकल्प लिया। पूजा की थाली में फल, फूल, अक्षत, रोली, भीगा चना, धूप, दीप और प्रसाद सजाकर वट वृक्ष के समक्ष पूजा की गई। महिलाओं ने बरगद के तने पर कच्चा सूत लपेटते हुए सात अथवा 108 बार परिक्रमा की। इस दौरान सावित्री-सत्यवान की कथा का श्रवण और पाठ किया गया। पूजन के बाद महिलाओं ने अपने पतियों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया और फिर व्रत खोला। कई स्थानों पर बांस से बने पारंपरिक पंखों से वट वृक्ष और पति को हवा देने की परंपरा भी निभाई गई, जिसे सेवा, समर्पण और सम्मान का प्रतीक माना जाता है। नवविवाहिताओं में दिखा विशेष उत्साह वट सावित्री को लेकर नवविवाहित महिलाओं में विशेष उत्साह देखने को मिला। महिलाएं लाल और पीले रंग की साड़ियों, पारंपरिक गहनों और ससुराल से मिले परिधानों में सजी-धजी नजर आईं। कई घरों में नवविवाहिताओं के लिए ‘भार-चंगेरा’ यानी सौगात, वस्त्र और पूजा सामग्री भेजने की परंपरा भी निभाई गई। पूजा के दौरान महिलाओं और युवतियों के बीच अंकुरित चना बांटने की परंपरा का भी पालन किया गया। महिलाओं ने सामूहिक रूप से लोकगीत गाते हुए पूजा की और एक-दूसरे को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद दिया। सावित्री-सत्यवान की कथा से जुड़ी है मान्यता पौराणिक मान्यता के अनुसार देवी सावित्री ने अपने तप, श्रद्धा और अटूट पतिव्रता धर्म के बल पर यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। उसी स्मृति में यह व्रत रखा जाता है। महिलाओं का विश्वास है कि श्रद्धा और विधि-विधान से वट सावित्री व्रत करने से पति की आयु लंबी होती है और वैवाहिक जीवन सुखमय बना रहता है।  

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