अनोखा आईना: ये कांच नहीं, फिर भी इस शीशे में दिखता है सब कुछ साफ! जानें क्या है इसका रहस्य?

अनोखा आईना: ये कांच नहीं, फिर भी इस शीशे में दिखता है सब कुछ साफ! जानें क्या है इसका रहस्य?

Kerala Aranmula Mirror Making Process: केरल के पथानामथिट्टा जिले के अराणमुला (Aranmula) गांव में एक बहुत ही खास और अनोखा आईना बनता है, जिसे ‘अराणमुला कन्नाडी‘ (Aranmula Kannadi) कहा जाता है। यह कोई साधारण कांच का आईना नहीं है, बल्कि पूरी तरह से धातु (metal) से बना होता है। मतलब यह है कि इसमें कांच का इस्तेमाल नहीं होता। अपनी इसी खूबी और बनाने के तरीके के कारण इसे पूरी दुनिया में जाना जाता है और 2005 से इसे जीआई (GI) टैग भी मिला हुआ है।

अराणमुला आईने की खासियत (Specialty of the Aranmula Mirror)

आम आईनों में कांच के पीछे पारे या किसी और चीज की कोटिंग होती है, जिससे प्रतिबिंब यानी छवि  (reflection) थोड़ा अंदर बनता है और कभी-कभी छवि धुंधली या टेढ़ी हो सकती है। इसे ‘द्वितीयक परावर्तन (Secondary Reflection)’ कहते हैं।

वहीं, अराणमुला कन्नाडी में कांच का इस्तेमाल नहीं होता। जिससे इसमें लाइट सीधे धातु की चमकती हुई सतह से टकराकर वापस लौटती है, जिसे ‘प्राइमरी रिफ्लेक्शन’ कहते हैं। इसी वजह से इसमें जो भी दिखता है, वह बिल्कुल साफ और एकदम असली जैसा दिखाई देता है। 

यह आईना टिन, तांबा और निकल के एक खास मिश्रण से बनता है। इसे बनाने की कला 500 साल से भी पुरानी है, जो केवल कुछ चुनिंदा परिवारों तक ही सीमित है। आज केवल लगभग 19 पंजीकृत कारीगरों को ही इसे बनाने का लाइसेंस प्राप्त है। हर दर्पण को हाथ से बहुत मेहनत करके पॉलिश किया जाता है। एक दर्पण तैयार करने में 2-3 दिन लगते हैं और कारीगरों को 1200 डिग्री सेल्सियस की आग के पास काम करना पड़ता है।

बनाने की कला और चुनौतियां (The Art and Challenges of Making the Mirror)

इस आईने को बनाने की प्रोसेस बहुत ही सीक्रेट है, इसमें इस्तेमाल होने वाली धातुओं का सही अनुपात सिर्फ इसे बनाने वाले परिवार ही जानते हैं। हालांकि, अब इस कला पर संकट मंडरा रहे हैं। इसे बनाने के लिए पंबा नदी (Pamba River) के बेसिन की एक खास मिट्टी का इस्तेमाल सांचे (mould) बनाने में किया जाता है।

इतिहास और कारीगरों की कहानी (History and Stories of the Craftspeople)

माना जाता है कि अराणमुला के शिल्पकार पुराने समय में तमिलनाडु के तिरुनेलवेली से आकर बसे कांसा शिल्पकार थे। उन्हें राजा ने अराणमुला पार्थसारथी मंदिर के निर्माण के लिए बुलाया था। बाद में उन्होंने बर्तन, आभूषण और अन्य कलाकृतियां बनाना शुरू कर दिया।

इन आईनों को बनाने वालों का नाता द्रविड़ शैली के मंदिरों से भी है। पद्मनाभ स्वामी मंदिर और अराणमुला का पार्थसारथी मंदिर इन्हीं कारीगरों की अद्भुत देन है। इन कारीगरों की अगली पीढ़ियां आज भी इस प्राचीन कला को जीवित रखे हुए हैं। परंपरागत रूप से, अराणमुला कन्नाडी अंडाकार आकार की होती है, जिसे ‘वलकन्नाडी’ कहा जाता है।

इसे केरल में शुभ माना जाता है और शादी-ब्याह या मंदिर के खास मौकों पर इसे देवी मां के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल करना बहुत जरूरी माना जाता है। आज यह सिर्फ एक अनुष्ठान की वस्तु नहीं, बल्कि केरल की कला का एक बेशकीमती सजावटी सामान भी बन गया है।

अराणमुला कैसे पहुंचें (How to Reach Aranmula)

अराणमुला पहुंचना काफी आसान है। यहां का सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन ‘चेंगनूर’ है और सबसे नजदीकी हवाई अड्डा ‘तिरुवनंतपुरम’ है। आप इन जगहों से बस या टैक्सी करके आसानी से अराणमुला पहुंच सकते हैं।

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