खेती में नवाचार हो तो यह घाटे का सौदा नहीं बन सकती। जयपुर जिले में सांभरलेक निवासी छीतरमल कुमावत (55) ने इसे साबित कर दिखाया। खारे पानी में बेर की खेती कर वे सालाना 3 लाख रुपए कमा रहे हैं। शाकंभरी माता मंदिर रोड पर उनका 9 बीघा का खेत है। खारे पानी की सांभर झील खेत के पास ही है। उन्होंने 8-10 साल पहले पारंपरिक खेती की बजाय नवाचार किया। हर पेड़ से 50 KG बेर मिल रहे छीतरमल कुमावत ने खारे पानी में उगने वाली फसलें तलाशी। चार बीघा खेत में 20-20 फीट दूर देसी बेर की झाड़ियां लगाईं। इससे गेहूं की परंपरागत खेती भी प्रभावित नहीं हुई। कुछ ही साल में बेर आने लगे। बाद में ग्राफ्टेड बेर की खेती सीखे। छह साल पहले देसी झाड़ियों को ही उमरान, केतून, जोधपुरी गोला किस्म के बेर से ग्राफ्टेड करवा दिया। अब प्रत्येक झाड़ी सालभर में 20 से 50 किलो बेर दे रही है। बेर की झाड़ियों के बीच छूटी जगह में हर साल गेहूं भी बो कर दोहरा लाभ ले रहे हैं। पहले मजदूरी करते थे अब काम दे रहे छीतरमल बताते हैं कि गेहूं की पिलाई में लगने वाला पानी ही बेर में भी काम आ जाता है। खेत के पास हाइवे है। एक-एक किलो की पैकिंग में आते-जाते वाहन चालकों को रोजाना 50-60 किलो बेर बेच देते हैं। बाकी बेर मंडी में जाते हैं। कुमावत बरसों तक निर्माण स्थलों पर मजदूरी करते रहे। खेती में नवाचार किया तो अब कुछ मजदूरों को काम दे रहे हैं।
पोटाश देकर क्षमता बढ़ाते हैं बेर की खेती का आइडिया खेत की मिट्टी-पानी की जांच करवाने के बाद आया। वे बताते हैं कि हर साल अप्रैल अंत में झाड़ियों की छंगाई करते हैं। इसी दौरान जड़ों में 250 ग्राम डीएपी, 250 ग्राम एमओपी (पोटाश) में 15 किलो मींगणी का खाद मिलाकर डालते हैं। इससे झाड़ी की फल देने की क्षमता बढ़ जाती है। जनवरी से मार्च तक बेर पर फल आते हैं। छंगाई के बाद फल देने की अवस्था में आते-आते झाड़ी वापस बड़ी हो जाती है। अन्य फसलें भी उगाई बेर में ज्यादा रोग नहीं लगता। बारिश में रोगोपचार जरूरी होता है। लट-गींगली (कीट) का प्रकोप रोकने के लिए बारिश के दिनों में स्प्रे करना होता है। बारिश वाले दिनों में दो बार व दो बार ही फल की शुरुआत में स्प्रे होता है। खेत पर वे सालभर एक से दो लोगों को मजदूरी भी दे रहे हैं। वे बताते हैं कि खेत में बील (बिल्व पत्र का पेड़) भी बोकर देखे, लेकिन पानी खारा होने से ये चल नहीं पाए। मेड़ पर नीम, लेसवा बो रखा है।


