प्रयागराज शहर की अंजुमन रूहे अदब में जन संस्कृति मंच, परिवेश और कोरस के संयुक्त तत्वावधान में समता साहित्य उत्सव का आयोजन किया गया। इस उत्सव का उद्देश्य डॉ. अंबेडकर के विचारों पर चर्चा करना और सामाजिक न्याय के मुद्दों को उठाना था। कार्यक्रम की शुरुआत लोकप्रिय लोक गायक राजू रंजन के गीतों से हुई, जिसके बाद आइसा प्रदेश अध्यक्ष मनीष कुमार ने स्वागत वक्तव्य दिया। उत्सव के पहले व्याख्यान सत्र का विषय ‘मुक्ति का स्वप्न और डॉ. अंबेडकर का जीवन दर्शन’ था। इस सत्र में जेएनयू के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष और भाकपा (माले) के नेता कॉमरेड धनंजय, वरिष्ठ आलोचक प्रो. प्रणय कृष्ण, कवि लाल्टू और आलोचक डॉ. रामायण राम ने अपने विचार प्रस्तुत किए। सभी वक्ताओं ने समता, सामाजिक न्याय और लोकतंत्र के मूल सवालों पर विस्तार से चर्चा की। कॉमरेड धनंजय ने अपने संबोधन में कहा कि डॉ. अंबेडकर के अथक प्रयासों के बावजूद आज भी पिछड़े और दलित वर्ग को समाज में वास्तविक प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है। कवि लाल्टू ने शिक्षा व्यवस्था में अंबेडकर के विचारों की उपेक्षा पर चिंता व्यक्त की, हालांकि उन्होंने स्वीकार किया कि अब कुछ सुधार हुआ है, लेकिन संघर्ष अभी लंबा है। डॉ. रामायण राम ने इस बात पर जोर दिया कि अंबेडकर की मुख्य चिंता भारत में वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना थी, जिसके लिए उन्होंने जाति व्यवस्था को जड़ से खत्म करने पर बल दिया। अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रो. प्रणय कृष्ण ने डॉ. अंबेडकर के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी भी समाज की प्रगति महिलाओं की स्थिति पर निर्भर करती है। उन्होंने समता के मूल्यों को स्थापित करने के लिए जाति, वर्ग और लैंगिक असमानताओं पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता पर बल दिया। इस सत्र का संचालन कविता कादंबरी ने किया। कार्यक्रम के दूसरे सत्र में देशभर से आए कवियों ने अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं। इनमें लाल्टू, विहाग वैभव, पूनम वासम, अदनान कफील दरवेश, प्रिया वर्मा, पराग पावन, पूजा कुमारी, संध्या चौरसिया, केतन यादव, शिवांगी गोयल, वसुंधरा यादव और अजय दुर्जेय शामिल थे। इन कवियों ने समता और सामाजिक सरोकारों पर आधारित कविताओं का पाठ किया। समापन सत्र में आइसा इलाहाबाद विश्वविद्यालय की अध्यक्ष सोनाली ने सभी उपस्थित लोगों का धन्यवाद ज्ञापित किया। इस उत्सव में सैकड़ों छात्र-छात्राएं, साहित्यकार, शिक्षक, पत्रकार और नागरिक समाज के प्रतिनिधि मौजूद रहे। आयोजकों ने समता साहित्य उत्सव को प्रतिवर्ष आयोजित करने का संकल्प लिया, ताकि डॉ. अंबेडकर के विचारों और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर निरंतर चर्चा जारी रह सके।


