जयपुर। हाईकोर्ट ने जर्जर स्कूल भवनों की स्थिति में सुधार के लिए कम बजट मिलने पर नाराजगी जताते हुए मौखिक टिप्पणी की कि बच्चे हमारे, सरकार कह दे कि स्कूल मुहैया नहीं करवा सकते। स्कूलों के बाहर यह भी बोर्ड लगवा दे कि बच्चे अपनी रिस्क पर आ रहे, उनको शिक्षा का अधिकार नहीं। स्कूलों को 20 हजार करोड़ चाहिए, बजट में 2 हजार करोड़ रुपए भी नहीं दिए।
राजस्थान सरकार की ओर से कागज पेश करने के अलावा कुछ नहीं हो रहा, फाइल में 1540 पेज हो गए हैं। कोर्ट ने तल्खी दिखाते हुए कहा कि क्या अस्पताल जैसे कार्यों को छोड़कर अन्य टेंडर रोक दें। कोर्ट ने 5 मार्च तक सुनवाई टालते हुए चेताया कि आखिरी मौका है, आगे मौका नहीं देंगे।
न्यायाधीश महेन्द्र कुमार गोयल व न्यायाधीश अशोक कुमार जैन की खंडपीठ ने झालावाड स्कूल हादसे के बाद जर्जर स्कूल भवनों को लेकर स्वप्रेरणा से दर्ज जनहित याचिका पर सोमवार को सुनवाई। इस दौरान राज्य सरकार की ओर से बताया कि जर्जर स्कूल भवनों व कमरों की मरम्मत के लिए 550 करोड़ रुपए बजट दिया।
स्कूलों की मरम्मत के लिए 20 हजार करोड़ की जरूरत
उधर, शिक्षा विभाग यह पहले ही बता चुका कि स्कूलों की मरम्मत के लिए 20 हजार करोड़ की आवश्यकता है। इस पर कोर्ट ने मौखिक रूप से यह भी कहा कि स्कूलों को दी गई राशि कुछ भी नहीं है, ऊंट के मुंह में जीरा है। स्कूलों के लिए जारी राशि के खर्च की कमेटी से मॉनिटरिंग करवा देते हैं। कमेटी में कौन हो और अतिरिक्त फंड की व्यवस्था किस तरह हो, इस पर सभी पक्ष सुझाव दें। कमेटी के मुद्दे पर महाधिवक्ता राजेंद्र प्रसाद ने कहा कि कोर्ट यह नहीं कर सकता, जिसके जवाब में कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि आप प्रस्ताव ले आओ उसे हम तय कर देंगे।
कोर्ट के सहयोग के लिए दो और न्यायमित्र
कोर्ट ने इस मामले पर सुनवाई के दौरान सहयोग के लिए अधिवक्ता आलोक गर्ग और अधिवक्ता सुनील समदड़िया को न्यायमित्र नियुक्त किया।
सांवरिया सेठ को 600 करोड़ चढ़ावा, आपको दानदाता नहीं
कोर्ट ने मौखिक रूप से यह भी कहा कि सरकार को सीएसआर-भामाशाहों से सहयोग लेना चाहिए। दानदाता भरे पडे हैं, सांवरिया सेठ को हर साल 600 करोड़ चढ़ावा आता है। आपको इनका सहयोग नहीं मिलता, मतलब विश्वास नहीं है।
आधे स्कूल-कॉलेज में भी महिला टॉयलेट नहीं
कोर्ट ने मौखिक रूप से यह भी कहा कि सभी सरकारी-निजी शिक्षण संस्थानों का चार्टर्ड इंजीनियर से निरीक्षण करवा लेते हैं। आधी जगह भी शिक्षिकाओं-बालिकाओं के लिए टॉयलेट नहीं है। पहले जयपुर के स्कूल-कॉलेजों का ही निरीक्षण करवा लेते हैं। इस मुद्दे को गंभीरता से लिया जाएगा। बेटियां कंधे से कंधा मिलाकर चलती हैं, उनको टॉयलेट नहीं है। हम कुछ नहीं कर रहे। आजकल तो यह विज्ञापन देना पड़ रहा है कि म्हारै छोरे, क्या छोरियों से कम हैं। इस पर महाधिवक्ता ने कहा कि बेटे-बेटियों की तुलना का मामला नहीं है।


