राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बुधवार को सुबह-सुबह 8 बजे एक लंबी सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए प्रदेश की भजनलाल सरकार की घेराबंदी की। गहलोत ने आरोप लगाया कि राजस्थान में पिछले एक साल से अधिक समय से पंचायतों और नगरीय निकायों के चुनाव नहीं कराए गए हैं, जो सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 243E, 243U और 243K का उल्लंघन है। उन्होंने इसे प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था पर ‘सुनियोजित प्रहार’ बताया है।
‘चुनाव सरकार की इच्छा का विषय नहीं‘
अशोक गहलोत ने संवैधानिक बारीकियों को समझाते हुए कहा कि अनुच्छेद 243E और 243U के तहत पंचायतों और निकायों का कार्यकाल 5 वर्ष निश्चित है और समय पर चुनाव कराना अनिवार्य है।
गहलोत ने स्पष्ट किया कि राज्य निर्वाचन आयोग एक स्वतंत्र संस्था है और चुनाव कराना सरकार की मर्जी पर निर्भर नहीं है, बल्कि यह एक संवैधानिक दायित्व है। एक साल से अधिक समय तक प्रशासकों की नियुक्ति रखना जनता के मताधिकार को कुचलने जैसा है।
‘‘वन स्टेट-वन इलेक्शन’ महज बहाना‘
पूर्व मुख्यमंत्री ने सरकार पर तंज कसते हुए कहा कि परिसीमन, पुनर्गठन और ‘वन स्टेट-वन इलेक्शन’ जैसे तर्क केवल चुनाव टालने के बहाने हैं।
उन्होंने Vikas Kishanrao Gawali (2021) मामले का हवाला दिया, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि ऐसे प्रशासनिक कारण चुनाव टालने का वैध आधार नहीं हो सकते।
‘हाईकोर्ट के आदेशों की अनदेखी’
गहलोत ने याद दिलाया कि राजस्थान उच्च न्यायालय ने फरवरी, मार्च और नवंबर 2025 में बार-बार चुनाव कराने के निर्देश दिए, लेकिन सरकार ने हर बार इन्हें नजरअंदाज किया। न्यायालय ने 439 याचिकाओं पर निर्णय देते हुए 15 अप्रैल 2026 की अंतिम समयसीमा (Deadline) तय की है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सरकार की एसएलपी (SLP) खारिज किए जाने के बाद भी सरकार की ‘गंभीरता’ पर गहलोत ने सवाल उठाए हैं।

‘यह स्पष्ट संवैधानिक विघटन है‘
गहलोत ने अपने पोस्ट में सबसे कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि जब कोई सरकार बार-बार संविधान की मूल भावना और न्यायालय के निर्देशों की अवहेलना करती है, तो वह ‘Constitutional Breakdown’ की स्थिति होती है। उन्होंने 73वें और 74वें संविधान संशोधनों (विकेंद्रीकरण और स्थानीय स्वशासन) को कुचलने का आरोप भाजपा पर लगाया।
‘राजस्थान की जनता चुप नहीं बैठेगी’
पोस्ट के अंत में गहलोत ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि राजस्थान की जनता अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन को चुपचाप स्वीकार नहीं करेगी। भाजपा सरकार को संविधान के प्रति अपनी जवाबदेही समझनी होगी। गहलोत के इस बयान के बाद प्रदेश के राजनीतिक हलकों में खलबली मच गई है, क्योंकि 15 अप्रैल की डेडलाइन अब बेहद करीब है।


