Rajasthan Politics : 4 बार के विधायक बाबूलाल बैरवा का जयपुर में निधन, जानें निर्दलीय से लेकर कांग्रेस-BJP तक कैसा रहा उनका रोमांचक सफर?

Rajasthan Politics : 4 बार के विधायक बाबूलाल बैरवा का जयपुर में निधन, जानें निर्दलीय से लेकर कांग्रेस-BJP तक कैसा रहा उनका रोमांचक सफर?

राजस्थान की सियासत के एक मजबूत स्तंभ और अलवर की कठूमर सीट पर दशकों तक राज करने वाले पूर्व विधायक बाबूलाल बैरवा का रविवार सुबह जयपुर के SMS अस्पताल में निधन हो गया। 73 वर्षीय बैरवा पिछले 20 अप्रैल से अस्पताल में भर्ती थे और गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। उनके जाने से न केवल कठूमर, बल्कि पूरे राजस्थान के दलित और वंचित समाज ने अपना एक प्रखर नेता खो दिया है।

SMS अस्पताल में ली अंतिम सांस

बाबूलाल बैरवा का स्वास्थ्य पिछले काफी समय से खराब चल रहा था। चिकित्सकों के अथक प्रयासों के बावजूद 3 मई की सुबह उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। उनके निधन की खबर मिलते ही जयपुर से लेकर अलवर तक राजनीतिक गलियारों में शोक की लहर दौड़ गई।

एक ‘किंगमेकर’ का सफर: निर्दलीय से कांग्रेस तक

बाबूलाल बैरवा की राजनीति किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं थी। उन्होंने साबित किया कि अगर जनता का साथ हो, तो पार्टी का सिंबल मायने नहीं रखता।

  • चार बार का प्रतिनिधित्व: वे कठूमर विधानसभा क्षेत्र से चार बार विधायक चुने गए, जो उनकी अदम्य लोकप्रियता का प्रमाण है।
  • दलों से ऊपर राजनीति: अपने लंबे करियर में उन्होंने निर्दलीय, कांग्रेस और भाजपा जैसे प्रमुख दलों का प्रतिनिधित्व किया। इसके अलावा उन्होंने इनेलो और राजपा (राजपा) के साथ भी काम किया।
  • 2018 की ऐतिहासिक जीत: उनकी राजनीतिक पकड़ का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 2018 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर शानदार जीत दर्ज की थी।

महाराजा कॉलेज से विधानसभा तक

5 नवंबर 1953 को अलवर के रोनीजाथान (कठूमर) में जन्मे बाबूलाल बैरवा ने अपनी शुरुआती शिक्षा के बाद जयपुर के प्रसिद्ध महाराजा कॉलेज से स्नातक पूर्व (B.Sc. प्रथम वर्ष) की पढ़ाई की। उनकी जमीनी समझ ने उन्हें बहुत कम उम्र में ही राजनीति की ओर आकर्षित कर लिया था। उनके परिवार में पत्नी श्रीमती राजन्ती देवी, तीन पुत्र और एक पुत्री हैं।

कठूमर में विकास का पर्याय थे बैरवा

बाबूलाल बैरवा केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि कठूमर के लोगों के लिए एक अभिभावक की तरह थे। सड़क, पानी और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए उन्होंने विधानसभा में कई बार प्रमुखता से आवाज उठाई। जिला कांग्रेस कमेटी ने उनके सम्मान में आज के सभी कार्यक्रम स्थगित कर दिए हैं, जो उनकी संगठनात्मक शक्ति को दर्शाता है。

अब कौन संभालेगा बैरवा की राजनीतिक विरासत?

बाबूलाल बैरवा के निधन के साथ ही कठूमर की राजनीति में एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है। उन्होंने जिस तरह से विभिन्न विचारधाराओं के साथ तालमेल बिठाकर क्षेत्र का विकास किया, वह अब आने वाले नेताओं के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। क्या उनके परिवार से कोई इस विरासत को आगे बढ़ाएगा या कठूमर में नई राजनीति का उदय होगा? यह आने वाला वक्त बताएगा।

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